जब कांग्रेस ने ब्राह्मणों से बदला लिया
   दिनांक 31-जुलाई-2019
 
 
ये 'हिंदू आतंकवादी' वाली सोच क्या है? ये 'हुआ तो हुआ' सोच है क्या? 'बड़ा बरगद गिरता है तो धरती तो हिलती ही है' ये सोच है क्या? आपको लगता है कि इस सोच की शुरुआत 1984 के सिख विरोधी दंगों से हुई है तो आप गलत हैं। ये सोच तो 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के 6 घंटे बाद ही सामने आ गई थी। आज गोडसे की आड़ में हिंदू धर्म को निशाने पर लिया जा रहा है, लेकिन 1948 में तो गोडसे के गुनाह के बदले 8 हजार मासूम लोगों की जान तक ले ली गई थी। 1984 के सिख विरोधी दंगों के रिकॉर्ड तो मौजूद हैं, लेकिन 1948 के 'पाप' के निशान तो इतिहास के पन्नों से ही मिटा दिए गए। दरअसल 'हुआ तो हुआ' सोच वालों की मानसिकता है बेअंत सिंह और गोडसे जैसों के गुनाह का बदला पूरे समाज से लो। यह बदला कभी विचारों से लिया जाता है तो कभी खून-खराबे से।
30 जनवरी, 1948 को हुआ क्या था? यह किसी को नहीं पता। गांधी जी की हत्या के बाद देर रात तक पूरे भारत में यह खबर फैल गई कि उनके हत्यारे का नाम नाथूराम गोडसे है और वह 'चितपावन ब्राह्मण' है। देखते-देखते बापू को मानने वाले 'अहिंसा के पुजारियों' ने पूरे महाराष्ट्र में कत्लेआम शुरू कर दिया। 1984 की तरह कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के निशाने पर थे महाराष्ट्र के चितपावन ब्राह्मण। सबसे पहले दंगा मुंबई में शुरू हुआ। उसी रात 15 लोग मारे गए और पुणे में 50 लोगों का कत्ल हुआ। भारत में खबर छपी या नहीं, पता नहीं, लेकिन अमेरिकी अखबार वाशिंगटन पोस्ट ने इस कत्लेआम को अपनी हेडलाइन बनाया। सबसे दुखद अंजाम हुआ स्वतंत्रता सेनानी डॉ. नारायण सावरकर का, जो वीर सावरकर के सबसे छोटे भाई थे। गांधी जी की हत्या के एक दिन बाद पहले भीड़ ने रात में वीर सावरकर के घर पर हमला किया। जब वहां बहुत सफलता नहीं मिली तो शिवाजी पार्क में ही रहने वाले उनके छोटे भाई डॉ. नारायण सावरकर के घर पर हमला बोल दिया। उन्हें खींचकर बाहर निकाला और भीड़ तब तक उन्हें पत्थरों से लहूलुहान करती रही, जब तक वे मौत के मुहाने तक नहीं पहुंच गए। अंतत: कुछ महीनों बाद उनका निधन हो गया। आप ही बताइए कि आजादी का ये सिपाही, क्या ऐसी दर्दनाक मौत का हकदार था? पहले निशाने पर सिर्फ चितपावन थे, पर बापू के 'अहिंसा के पुजारियों' ने महाराष्ट्र के सभी ब्राह्मणों को निशाना बनाना शुरू कर दिया। मुंबई, पुणे, सांगली, नागपुर, नासिक, सतारा, कोल्हापुर, बेलगाम (वर्तमान में कर्नाटक) में जबरदस्त कत्लेआम मचाया गया। सतारा में 1,000 से ज्यादा मराठी ब्राह्मणों के घरों को जला दिया गया। एक परिवार के तीन पुरुषों को सिर्फ इसलिए जला दिया गया, क्योंकि उनका 'सरनेम' गोडसे था। उस कत्लेआम के दौर में जिसके भी नाम के आगे आप्टे, गोखले, जोशी, रानाडे, कुलकर्णी, देशपांडे जैसे सरनेम लगे थे, भीड़ उनकी जान की प्यासी हो गई। मराठी साहित्यकार और तरुण भारत के संपादक गजानंद त्र्यंबक माडखोलकर की किताब 'एका निर्वासिताची कहाणी' (एक शरणार्थी की कहानी) के मुताबिक कथित गांधीवादियों की इस हिंसा में करीब 8 हजार मराठी ब्राह्मण मारे गए। 31 जनवरी को माडखोलकर के घर पर भी हमला हुआ था। उन्हें महाराष्ट्र के बाहर शरण लेनी पड़ी थी और अपने इसी अनुभव पर उन्होंने यह किताब लिखी थी। भारत में आज तक जितने भी दंगे हुए हैं, उसकी सूची में आपको ,  1948 का जिक्र तो मिलेगा, लेकिन उसमें मारे गए लोगों का जिक्र नहीं मिलेगा। आखिर क्यों इतिहास के इस काले पन्ने को मिटा दिया गया? वजह सिर्फ एक है- आने वाली पीढ़ी को ये कभी पता नहीं चलना चाहिए कि गांधी टोपी पहनने वाले 'अहिंसा के पुजारियों' ने कैसा खूनी खेल खेला था।
20 जनवरी को गांधी जी पर पहले हमले के बाद ही पता चल जाना चाहिए था कि उनकी जान को किससे खतरा है। पहले 10 दिन तक पुलिस गोडसे तक नहीं पहुंच पाई, पर बापू की हत्या के महज 6 घंटे के अंदर उसकी पहचान, धर्म, जाति और वह कौन सा ब्राह्मण है ये सब जानकारी महाराष्ट्र के उन्मादी कांग्रेसी गांधीवादियों को मिल गई। वो भी उस दौर में जब सोशल मीडिया तो छोडि़ये फोन भी नहीं होते थे। क्या तब भी 'बड़ा बरगद गिरता है तो धरती तो हिलती ही है' वाली सोच काम कर रही थी? दरअसल, यह सोच आज भी जिंदा है। एक आदमी पाप करे और सजा उसके पूरे समाज से लो। कभी गोडसे के समाज के लोग शिकार बने तो कभी बेअंत के पंथ के लोग मारे गए। 
 
 
(प्रखर श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से साभार)