मीडिया में मची झूठ फैलाने की होड़
   दिनांक 31-जुलाई-2019
 खबर झूठी निकलने पर अब कोई नहीं लेता जिम्मेदारी, बल्कि अगले झूठ की तैयारी में जुट जाता है मीडिया
एक जमाना था जब किसी अखबार की कोई खबर गलत निकलती थी तो संवाददाता से लेकर संपादक तक उस चूक की जिम्मेदारी लेते थे। अब परिस्थितियां अलग हैं। अब मानो होड़ है कि कौन कितना झूठ फैलाएगा। कोई झूठ पकड़ा जाता है तो उसे स्वीकार करने के बजाय अगले झूठ की तैयारी शुरू हो जाती है। मुख्यधारा मीडिया में यह चलन बहुत पुराना नहीं है।
2014 के बाद से कई अखबार और चैनल मानो अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। उनका एकमात्र उद्देश्य है कि किसी तरह मृतप्राय हो चुकी कांग्रेस में जान फूंकी जाए। तभी सोनभद्र हत्याकांड पर जब प्रियंका गांधी वाड्रा अपनी राजनीति चमकाने पहुंचीं तो मीडिया उनका मददगार बना। चैनलों ने ब्रेकिंग न्यूज चलाई कि प्रियंका को उत्तर प्रदेश पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। डीजीपी ने सफाई दी कि उन्हें न तो गिरफ्तार किया गया और न ही हिरासत में लिया गया है। धारा 144 लागू होने के कारण उन्हें जिले की सीमा से पहले रोका गया है। तमाम चैनल और वेबसाइट देर शाम तक वही झूठ चलाते रहे जिसका आदेश उन्हें 'ऊपर' से मिला था। सोनभद्र की घटना का मुख्य आरोपी सपा का बड़ा नेता है। यह बात शुरू से ही सब जानते थे, लेकिन किसी तथाकथित राष्ट्रीय अखबार या चैनल ने यह बात नहीं बताई। जब मुख्यमंत्री योगी ने अपने बयान में यह बात कही तब भी ज्यादातर चैनलों ने बयान के उस हिस्से को काट दिया।
भगवान राम के नाम पर जो सोचा-समझा षड्यंत्र कुछ समय पहले शुरू हुआ था वह भी जारी रहा। महाराष्ट्र के औरंगाबाद में एक मुसलमान लड़के ने इंजीनियरिंग के छात्रों पर जबरन जय श्रीराम बुलवाने का आरोप लगाया। देखते-देखते यह बात राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियों में थी। ज्यादातर ने इसे ऐसे छापा मानो उनके संवाददाता ने खुद ऐसा होते हुए देखा है। जांच में पता चला कि आरोप झूठा था। जिस मीडिया ने इस समाचार को इतना महत्व दिया, वह तब मौन हो गई जब खबर झूठी निकली। कुछ स्थानीय मराठी अखबारों के अलावा किसी चैनल या अखबार ने इस समाचार को जगह नहीं दी। बिहार के छपरा में बकरी चोरी के आरोप में अनुसूचित जाति के कुछ ग्रामीणों ने 3 लोगों को मार दिया। इनमें दो अनुसूचित जाति के ही हिंदू थे, जबकि एक मुसलमान। ज्यादातर चैनलों व अखबारों ने खबर ऐसे दिखाई मानो पीडि़त मुसलमान हों। बीबीसी की हिंदी वेबसाइट ने तो इस घटना के सहारे एक रिपोर्ट छापी जिसका शीर्षक था कि 'क्या मुसलमानों को इस देश में रहने का अधिकार नहीं?'
भीड़ की हिंसा के ढेरों मामलों में पीडि़त हिंदू हैं। कई आरोप फर्जी पाए गए, लेकिन केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने जब यही बात कह दी तो मीडिया के इस जाने-पहचाने वर्ग ने उसे 'विवादित' ठप्पे के साथ दिखाया। किसी भी बयान को 'विवादित' बना देने के इस खेल का शिकार जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक और सांसद साध्वी प्रज्ञा भी हुईं। इन दोनों की बातों का पूरा वीडियो इंटरनेट पर उपलब्ध है। इसे सुनकर समझा जा सकता है कि वास्तव में वे क्या कह रहे थे और क्या बना दिया गया। चैनलों ने उनके बयानों का एक खास हिस्सा ही दिखाया, ताकि भ्रम फैलाया जा सके। वहीं, जमीन पर कब्जे के मामले में आजम खां के खिलाफ कार्रवाई को कई चैनलों ने राजनीतिक बदले की तरह दिखाया। आजतक चैनल ने सवाल उठाया कि आजम के विरुद्ध कार्रवाई में इतनी जल्दीबाजी क्यों हो रही है? किसी चैनल ने यह पड़ताल करने की जरूरत नहीं समझी कि पूरा मामला क्या है और मामले में शिकायतकर्ता मुसलमान ही हैं।
आजतक चैनल भगोड़े आतंकी दाऊद इब्राहिम का महिमामंडन करने के लिए जाना जाता रहा है। वसूली के मामले में उसका भतीजा गिरफ्तार हुआ। इसी बहाने चैनल ने आधे घंटे का कार्यक्रम दिखाया जो एक दुर्दांत आतंकी के बारे में कम, एक 'सर्वशक्तिशाली व्यक्ति' के बारे में अधिक दिख रहा था। आतंकियों के महिमामंडन का मीडिया का यह खेल पुराना है। इसी हफ्ते खबर आई कि नक्सली गौतम नवलखा के कश्मीरी आतंकी संगठनों के साथ संपर्क में होने के सबूत मिले हैं। पुणे पुलिस ने इसकी पूरी जानकारी बाम्बे उच्च न्यायालय को दी है। अब याद कीजिए कि कैसे उसकी गिरफ्तारी के समय मीडिया का एक बड़ा वर्ग गौतम नवलखा के पक्ष में लामबंद हो गया था। कई बड़े-बड़े संपादकों ने उसके पक्ष में संपादकीय लिखे थे। अब जबकि सच सामने आ रहा है तो वे चुप क्यों हैं?