परमार्थ निकेतन चला रहा शिक्षा, स्वास्थ्य और स्वच्छता का अभियान
   दिनांक 31-जुलाई-2019
ऋषिकेश में गंगा किनारे स्वामी चिदानंद सरस्वती द्वारा स्थापित परमार्थ निकेतन शिक्षा, स्वास्थ्य और स्वच्छता का अभियान चला रहा है। खास तौर से महिलाएं इस अभियान को जन-जन तक पहुंचा रही हैं। आश्रम ऐसे स्थानों पर स्वास्थ्य शिविर लगाता है, जहां स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध नहीं हैं।आश्रम के सेवा कार्यों से प्रभावित होकर लोग स्वत: इन अभियानों का हिस्सा बन रहे
वृक्ष कबहुं न फल भखै, नदी न संचै नीर।
परमारथ के कारने, साधुन धरा शरीर॥
अर्थात् वृक्ष कभी अपने फल नहीं खाते और न ही नदी कभी अपना जल संचित करती है। वह लोक कल्याण के लिए बहती रहती है। इसी तरह, जो अपने सुख-दुख और कष्टों की चिंता किए बिना मन से दूसरों के कल्याण का भाव रखे, वही सच्चा संत है। कबीर ने एक सच्चे संत की यही व्याख्या की है। ऋषि-मुनियों, साधु-संतों, योगियों-जोगियों, तपस्वियों-मनस्वियों की धरती भारत में इनके त्याग, समर्पण के प्रसंगों से इतिहास भरा हुआ है। जिन्होंने अपना 'स्व' यानी स्वार्थ छोड़कर समाज और देश के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर किया। व्यक्ति, समाज और राष्ट्र का निर्माण किया। समाज को धर्म, न्याय, परोपकार ज्ञान की राह दिखाई।
भारत देवताओं और ऋषियों की भूमि है। आज के आधुनिक युग में भी ऋषियों-संतों की यह परंपरा निर्बाध चली आ रही है। लेकिन समय के साथ इसका स्वरूप बदल गया है। समाज के साथ साधु-संतों के कामकाज के तरीके भी बदले हैं। उन्होंने अध्यात्म के साथ उन मुद्दों को अपना ध्येय बना लिया है, जो न केवल देश, बल्कि दुनिया के लिए चिंता का विषय हैं।
महिला शक्ति के बीच स्वच्छता की अलख जगाते स्वामी चिदानंद जी (मध्य में)
देवभूमि उत्तराखंड की पवित्र नगरी ऋषिकेश में गंगा के किनारे बने दिव्य और भव्य आश्रम परमार्थ निकेतन की देश-दुनिया में अपनी एक अलग पहचान है। दुनियाभर से लोग यहां गंगा आरती का साक्षी बनने आते हैं। परमार्थ निकेतन जितना पूजा-पाठ, भजन-कीर्तन के लिए प्रसिद्ध है उतना ही पर्यावरण, स्वच्छता, शिक्षा, सामाजिक उत्थान व अनेक विकासात्मक कार्यों के लिए भी जाना जाता है। परमार्थ निकेतन द्वारा करीब 9 वर्ष पूर्व गंगा की सफाई और संरक्षण के लिए बने 'गंगा एक्शन परिवार' में धर्मगुरु, वैज्ञानिक, अभियंता, पर्यावरणविद्, सामाजिक कार्यकर्ता और ख्यातिप्राप्त पेशेशर शामिल हैं। इसका उद्देश्य केवल गंगा को स्वच्छ व प्रदूषणमुक्त बनाना ही नहीं, बल्कि गंगा किनारे बसे लाखों लोगों के जीवन में नई आशाएं जगाना भी है। स्वामी चिदानंद सरस्वती का कहना है, ''पानी, प्रदूषण और आबादी, तीन ज्वलंत मुद्दे हैं। कुछ स्थानों पर पानी का भीषण संकट है, इसलिए जनशक्ति को जल शक्ति से जुड़ना चाहिए। जल है तो कल है। अगर जनसंख्या पर नियंत्रण नहीं किया गया तो आने वाली पीढ़ी के लिए कुछ नहीं बचेगा। इसलिए 21वीं सदी में इन तीन मुद्दों पर काम करना होगा। इन तीनों की दशा ठीक रही तो स्वास्थ्य, स्वच्छता और स्मृति की त्रिवेणी बहेगी।''
स्वामी चिदानंद छोटी आयु में तपस्या के लिए जंगलों में चले गए थे। जब लौट कर उन्होंने अपने गुरु से पूछा कि आगे क्या आदेश है तो गुरु ने उन्हें समाज सेवा का आदेश देते हुए कहा कि अगर कभी पूजा न कर पाओ, मंदिर न जा पाओ, माला न फेर सको तो कोई बात नहीं, लेकिन समाज में किसी का दुख हर लिया तो समझ लो भगवान की सेवा कर दी। परमार्थ निकेतन में ज्ञान की गंगा बहती है तो सेवा की अमृत धारा भी बहती है। आश्रम के गुरुकुल में वेद-पुराण, भारतीय संस्कृति के साथ आधुनिक कंप्यूटर शिक्षा भी दी जाती है। यहां पढ़ने वाले ऋषि कुमार राष्ट्र को समर्पित नागरिक बन कर निकलते हैं। उत्तराखंड में प्राकृतिक आपदा आने पर आश्रम के ऋषिकुमार और स्वामीजी के अनुयायियों की टोलियां राहत और बचाव कायार्ें में जुट जाती हैं। स्थानीय से लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर तक हर तरह के परमार्थ कार्यों से जुड़ना इस आश्रम की विशेषता है। संयुक्त राष्ट्र के जल, स्वच्छता और स्वास्थ्य कार्यक्रम से जुड़ कर स्वामीजी ने उत्तराखंड की महिलाओं को स्वच्छता का पाठ पढ़ाया। अब ये महिलाएं अपने इलाकों में शौचालय, सफाई और हाथ धोने का महत्व समझा कर समाज में जागरूकता फैला रही हैं।
परमार्थ आश्रम से स्वच्छता का पाठ पढ़ने के बाद महिलाएं इस अभियान को घर-घर पहुंचा रही हैं 
भले ही भारत की प्राचीन विधा योग को अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पहचान मिली हो और 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मनाया जाने लगा है। लेकिन परमार्थ निकेतन दशकों से मार्च के पहले सप्ताह को योग सप्ताह के रूप में मनाता आ रहा है। दुनियाभर से योग गुरु और योग सीखने वाले ऋषिकेश में सप्ताह भर के लिए एकत्र होते आ रहे हैं। इसके अलावा, मेडिकल शिविर लगाना, वृक्षारोपण और आस-पास के इलाके को प्रदूषण मुक्त करना आश्रम की नियमित गतिविधियों में शामिल है। स्वामी चिदानंद भारतीय विरासत शोध प्रतिष्ठान के संस्थापक भी हैं। यह अंतरराष्ट्रीय स्तर का लाभ-रहित मानववादी संगठन है जो शिक्षा, स्वास्थ्य, युवा कल्याण और व्यावसायिक प्रशिक्षण क्षेत्र में कार्य करता है। इस प्रतिष्ठान ने 'हिन्दू धर्म विश्व कोश' का संकलन भी किया है। इसके अलावा, स्वामी चिदानंद ने गरीब, परित्यक्त, विधवा और अनाथ बच्चियों के कल्याण व उत्थान के लिए 'डिवाइन शक्ति फाउंडेशन' की भी स्थापना की है, जो जरूरतमंद महिलाओं को संरक्षण, आश्रय, सहायता शिक्षा प्रदान कर उनके जीवन में नई ऊर्जा का संचार कर रहा है। यह संगठन ऐसे पहाड़ी स्थानों पर हर सप्ताह स्वास्थ्य शिविर लगाता है, जहां स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध नहीं हैं।
आध्यात्मिक और सामाजिक क्षेत्र में योगदान के लिए स्वामी चिदानंद सरस्वती को अनेक राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिल चुके हैं। उनका मानना है कि भारत की संस्कृति अर्पण, तर्पण और समर्पण की है। समाज के प्रति अर्पण, पितरों को तर्पण यही हमारे ऋषि-मुनियों ने सिखाया। सेवा को वे सबसे बड़ी साधना मानते हैं। परमार्थ निकेतन को देश-विदेश की बड़ी-बड़ी हस्तियों से तन, मन और धन से भरपूर सहयोग मिलता है। हालांकि स्वामीजी कहते हैं कि उन्होंने कभी चंदे के लिए याचना नहीं की। लोग स्वत: ही आश्रम द्वारा संचालित सेवा कार्यों से प्रभावित होकर सहायता के लिए आगे आते हैं।