तीन तलाक पर कानून 100 बरसों की भूलों का सुधार है
    दिनांक 31-जुलाई-2019
तीन तलाक पर बने नए कानून ने सौ वर्षों से चले आ रहे अल्पसंख्यकवाद के ढांचे पर कठोर प्रहार किया है. भारत ने राष्ट्रीय एकात्मता की दिशा में एक निर्णायक पग बढ़ाया है. ये बड़े परिवर्तन की शुरुआत है.

 राष्ट्रीय एकात्मता की दिशा में एक निर्णायक कदम
तीन तलाक पर कानून बनना एक ऐतिहासिक अवसर है. इससे भारत की संस्कृति और संविधान के न्याय और समानता के मूल्य दृढ़ हुए हैं. ये सौ साल से भी ज्यादा पुरानी तुष्टीकरण की रीति नीति पर कठोर प्रहार भी है. छद्म सेकुलरिज्म के किले का एक बड़ा बुर्ज ढह गया है.
सेकुलरिज्म के नाम पर अनेक तरह के गलत, अन्यायपूर्ण और विभाजनकारी काम होते रहे. कम अक्ल लोगों को मुस्लिम महिलाओं पर अत्याचार करने की खुली छूट दी गई. उनके मासूम बच्चों के बारे में तक नहीं सोचा गया. संविधान की दुहाई देने वालों ने बेधड़क संविधान की मूल भावना की धज्जियां उड़ाई. सरकारी पैसे पर दशकों तक हज यात्रा करवाई जाती रही. उदार और समझदार मुस्लिम नेतृत्व की उपेक्षा की गई, लेकिन कट्टरपंथियों के साथ गलबहियां डाली गईं. आरिफ मोहम्मद खान और मोहम्मद करीम छागला को दरकिनार कर दिया गया, आजम खान और ओवैसी जैसे नेताओं को सर चढ़ाया गया. रसखान और दाराशिकोह जैसे महान व्यक्तित्व इतिहास पन्नों में गुम कर दिए गए, और मौलाना मौदूदी की जहरीली विचारधारा को समाज में घुलने मिलने की खुली छूट दी गई. शिवाजी महाराणा प्रताप और छत्रसाल की उदारता को भुलाया गया, और हिंदुओं पर घोर अत्याचार करने वाले टीपूसुल्तान की जयंती मनाई गई. औरंगजेब के नाम पर सड़कें की गई. निर्लज्जजता इस चरम सीमा तक जा पहुंची कि गट्ठा वोटों के भूखे तथाकथित सेकुलर नेताओं ने सिमी और इंडियन मुजाहिदीन जैसे आतंकवादी संगठनों को मासूम बताना शुरू कर दिया.
एक ऐतिहासिक भूल 
तुष्टीकरण के इतिहास में 1919 में प्रारंभ हुए खिलाफत आंदोलन का बड़ा महत्व है. जब तत्कालीन कांग्रेस के नेतृत्व में एक विचित्र उद्देश्य को सामने रखकर देशव्यापी आंदोलन चलाया, उसे हिंदू मुस्लिम एकता के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया, और जिसकी परिणति पाकिस्तान के निर्माण के रूप में हुई. 1918 में प्रथम विश्व युद्ध समाप्त हुआ नई शक्तियों का उदय हुआ. तुर्की का इस्लामी राज्य, जो खलीफा के नेतृत्व में चलता था, उखाड़ फेंका गया. खलीफा भ्रष्ट और दुर्बल शासक था. उसके शासन यानी खिलाफत के हाथ लाखों निर्दोषों के खून से रंगे हुए थे. फिर तुर्की में एक लोकप्रिय प्रतिभावान युवा क्रांतिकारी का उदय हुआ. मुस्तफा कमाल पाशा नामक इस नेता ने खलीफा की सत्ता को उखाड़ फेंका और इस्लामी व्यवस्था के स्थान पर राष्ट्रवाद आधारित नए तुर्की के निर्माणका काम प्रारंभ किया. कमाल पाशा का सोचना था कि मध्ययुगीन विचारों को त्याग कर ही नए भविष्य की नींव रखी जा सकती है. इस्लाम की कट्टरपंथी धाराओं को दरकिनार रखते हुए आधुनिक स्वरूप में इस्लाम को दुनिया के सामने रखा जा सकता है. पश्चिम एशिया में अपने विस्तार को दृढ़ करने के लिए ब्रिटेन ने तुर्की की इस नयी सत्ता का साथ देने का निश्चय किया. तुर्की का सामरिक महत्त्व था. और वैसे भी खलीफा से ब्रिटेन की शत्रुता थी.
तुर्की की जनता ने इन नए सुधारों और अपने नए नेता का स्वागत किया. अरब जगत ने भी इसमें दखल देने की जरूरत नहीं समझी, लेकिन भारत में मुस्लिम लीग व अन्य रूढ़िवादी मुस्लिम नेतृत्व ने आसमान सर पर उठा लिया. मुस्लिम लीग के जो नेता और नवाब आदि कल तक गोरी सरकार से “सर” और “रायबहादुर” की उपाधियां लेने में गर्व महसूस करते थे अचानक उसके खिलाफ हो गए. कहने लगे कि ब्रिटेन ने इस्लाम के खिलाफ काम किया है, इसलिए ब्रिटिश सरकार का विरोध करना हर मुसलमान का कर्तव्य है. मौका देख कर तत्कालीन कांग्रेस भी इस लड़ाई में कूद पड़ी, और एक विचित्र आंदोलन शुरू हुआ. नाम रखा गया खिलाफत आंदोलन . उद्देश्य था तुर्की में जनता के समर्थन से खड़े हुए मुस्तफा कमाल पाशा के शासन को हटाना और बदनाम सुल्तान को वापस लाकर उसकी कट्टरपंथी सत्ता को फिर से स्थापित करना. यानी जो शासन तुर्की की जनता को मंजूर नहीं था, उसे तुर्की में दोबारा स्थापित करने के लिए हजारों मील दूर, भारत में आंदोलन चलाया जा रहा था. कांग्रेस ने भी अपनी सारी ताकत इस बेतुके लक्ष्य के लिए झोंक दी.
चूंकि आंदोलन की सारी प्रेरणा मजहबी थी, इसलिए मुसलमानों को इस आंदोलन से जोड़ने के लिए मुल्ला फौज को मैदान में उतारा गया. इन लोगों ने अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र जिहाद का नारा दिया. इस तरह कट्टरपंथी मध्ययुगीन सोच रखने वाले लोगों को शहर -शहर, गली- गली, मोहल्ले-मोहल्ले, मुस्लिम नेतृत्व के रूप में स्थापित कर दिया गया. अंततः यही लोग मुस्लिमों के राजनीतिक प्रतिनिधि के रूप में स्थापित हो गए. और आज़ाद भारत में उनके वोटों के ठेकेदार बन गए.

 
 तुर्की के जननायक कमाल पाशा. खिलाफत आंदोलन के पुरोधा अली बंधु और महात्मा गांधी
खिलाफत आंदोलन इतना आधारहीन था कि उसे असफल होना ही था. तुर्की के जिस सुल्तान अब्दुल मजीद के लिए , भारत में अंग्रेजों के खिलाफ आन्दोलन किया जा रहा था, वह खुद ही एक ब्रिटिश जहाज में बैठकर माल्टा भाग गया, क्योंकि वहां की जनता उस पर बहुत कुपित थी. भारत से कांग्रेस द्वारा भेजे गए कई मुस्लिम प्रतिनिधिमंडल अरब देशों के नेताओं से जाकर मिले, और उनसे खिलाफत आंदोलन के लिए समर्थन मांगा, लेकिन उन्होंने इन लोगों को अपमानित करके वापस भेज दिया.
इस पर भी सीख नहीं ली गई. गांधीजी के दाहिने हाथ कहे जाने वाले मोहम्मद अली ने घोषणा की कि चूंकि ब्रिटेन की सरकार ने तुर्की में खलीफा को हटाकर इस्लाम के खिलाफ काम किया है, और भारत में अंग्रेजों का शासन है, इसलिए मुसलमानों के लिए भारत में रहना हराम है, और मुस्लिमों को भारत छोड़कर निकट के किसी इस्लामी देश में रहने के लिए चले जाना चाहिए. परिणाम क्या हुआ कि 20 हजार के लगभग गरीब और अनपढ़ मुस्लिम अपना मज़हबी कर्तव्य समझकर, घर बार बेचकर महिलाओं बच्चों समेत बैलगाड़ियों, ऊंटों , खच्चरों पर बैठ कर या पैदल ही अफगानिस्तान की ओर चल पड़े. लेकिन अफ़गानी लोग भला उन्हें अपने देश में क्यों घुसने देते? इन लोगों को अफ़गानिस्तान की सीमा पर ही लूट लिया गया और मारपीट कर वापस धकेल दिया गया. घर-बार बेच चुके यह लोग अत्यंत दयनीय अवस्था में आ गए.
खिलाफत आंदोलन असफल हुआ तो इसका नेतृत्व कर रहे कट्टरपंथियों की फजीहत होने लगी. उन्होंने मुसलमानों को बड़े बड़े सपने दिखाए थे. विफल खिलाफत आंदोलन ने उन्हें यथार्थ के कठोर के धरातल पर ला पटका. अतः आंदोलन की कुंठा सांप्रदायिक दंगे के रूप में प्रकट हुई. सालों से की जा रहीं 'जिहाद' की तकरीरों ने भीषण ज्वाला का रूप ले लिया.
केरल में मोपला मुस्लिमों के बीच प्रचार किया गया, कि खिलाफत आंदोलन सफल हो गया है, और अब इस्लामी राज्य स्थापित करने का समय है. ‘सभी काफिरों’ को समाप्त करके खिलाफत को स्थापित करने का आह्वान किया गया. मोहम्मद हाजी नाम के व्यक्ति को खलीफा घोषित कर दिया गया, और हिंसा का दावानल भड़क उठा. दंगों में हजारों लोग मारे गए. यह आग तब शांत हुई , जब तथाकथित खलीफा मोहम्मद हाजी और उसके साथी अंग्रेज सेना के हाथ पड़े, और उन्हें फांसी की सजा हुई. खिलाफत आंदोलन में मुस्लिम लीग को ताकत दी. कांग्रेस अंग्रेजों के साथ तुष्टीकरण की होड़ में जुट गई. अंततः देश का विभाजन हुआ, जिस में लाखों लोग मारे गए. लेकिन इस सबसे भी कोई सबक नहीं लिया आया और आज़ाद भारत में तुष्टीकरण का नया दौर प्रारंभ हुआ.
एक ‘पर्सनल’ क़ानून 
देश का अपना संविधान बना. लेकिन उस संविधान के ऊपर मुस्लिम पर्सनल लॉ हावी कर दिया गया. ये अंग्रेजों की चालबाजी थी जिसे आज़ादी के बाद उनके वारिसों ने पूरी ताकत के साथ आगे बढाया.सबसे पहले ब्रिटिश गर्वनर जनरल वारेन हैस्टिंग्स ने मुस्लिम पर्सनल लॉ शब्द का उपयोग किया था. मुस्लिम पर्सनल लॉ कानून अंग्रेजों की राजनीतिक आवश्यकताओं के चलते अस्तित्व में आया था. अंग्रेजों के पहले जहां-जहां मुस्लिम शासक सत्ता में आए, वहां-वहां उन्होंने अपनी अपनी मान्यताओं के अनुसार इस्लामी कानून लागू किया. क़ाज़ी-उलेमा लोगों के भाग्य के फैसले करने लगे. अरब के इस्लामी कानून के अनुसार नाक-कान काटने, हाथ काटने, संगकशी (व्यक्ति जमीन में कमर तक गाड़ कर पत्थर मार-मारकर मौत की सजा) जैसी सजाएं दी जाने लगी. ये शरिया कानून दीवानी - फौजदारी और पारिवारिक आदि सभी मामलों पर लागू होता था.
जब अंग्रेजों ने ऐसी रियासतों को हड़पा, जहां पर शरियत कानून चलता था, तो उन्होंने उसमें हस्तक्षेप करने से परहेज किया. अंग्रेजों ने हत्या, चोरी, बलात्कार जैसे मामलों में इंडियन पीनल कोड लागू किया, लेकिन पारिवारिक मामलों, जैसे शादी, वसीयत आदि को नहीं छेड़ा। हिन्दू परिवार व्यवस्था भी पारम्परिक व्यवस्था से चलती रही। धीरे-धीरे ये व्यवस्था स्वीकार्य हो गई। सबसे पहले ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन के अंतर्गत 1772 में इसे लागू किया गया. हालाँकि दस्तावेज यह बतलाते हैं कि मुस्लिम रियासतों को छोड़कर और कहीं भी मुस्लिमों के लिए शरिया कानून नहीं था. मुस्लिम समाज भी जिस राज्य में रहता था, राज्य के कानूनों का पालन करता था. 1939 में मुस्लिम विवाह विच्छेद कानून बना, जिसमें मुस्लिम महिलाओं को थोड़ी राहत देते हुए विशेष परिस्थितियों में, जैसे पति का चार सालों तक लापता रहना, दो वर्षों तक आजीविका की व्यवस्था न करना आदि में तलाक लेने की व्यवस्था दी गई. लेकिन मूल समस्याएं यथावत बनी रहीं. स्वतंत्र भारत में जहां हिन्दू क़ानून में मूलभूत सुधार किए गए वहीँ ब्रिटिशकालीन मुस्लिम पारिवारिक कानून को अपरिवर्तनीय रखा गया. यह कानून मुस्लिम पर्सनल लॉ कहलाया. तीन तलाक और हलाला जैसी कुप्रथाएँ यथावत चलती रहीं. नारी उत्थान की बातें भी साथ साथ चलती रहीं. तीन तलाक को खत्म करने की हिम्मत तब भी नहीं की गई, जब देश में लंबे समय तक एक शक्तिशाली महिला प्रधानमंत्री का शासन रहा.
नेहरू के विचित्र हठ 
नेहरू अपनी जिद के लिए मशहूर थे. उन्होंने गौ हत्या बंदी कानून बनाने का विरोध किया. उन्होंने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण में सरदार पटेल और डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद की भागीदारी का विरोध किया. लेकिन 1954 में मुस्लिमों को हज यात्रा सब्सिडी देना प्रारंभ किया. जब देश का संविधान बनाया जा रहा था, तब हिंदू समाज में भी बहुविवाह की प्रथा विद्यमान थी. महिलाओं की दशा ठीक नहीं थी. इसके हिंदू कोड बिल लाया गया. देश में अनेक लोगों ने इसे शास्त्र विरुद्ध कहकर इसका विरोध किया, लेकिन संविधान सभा ने इसे क़ानून का रूप दिया. लेकिन जब मुस्लिम समाज में सुधार लाने की चर्चा प्रारंभ हुई तो नेहरु अड़ गए और अंग्रेजों के बनाए मुस्लिम पर्सनल लॉ क़ानून को यथावत रखा. सरदार पटेल, डॉ आंबेडकर. डॉ श्यामाप्रसाद मुखर्जी जैसे बड़े-बड़े नेता एक देश-एक क़ानून के पक्ष में थे. परन्तु पंडित नेहरु अड़े रहे. ये बड़ी विचित्र बात थी, क्योंकि हिंदू कोड बिल को किसी भी कीमत पर लागू करने को प्रतिबद्ध नेहरु मुस्लिम पर्सनल लॉ को किसी भी कीमत पर बचाए रखना चाहते थे. और वो इसमें सफल भी हुए.

 
पंडित नेहरु : हज सब्सिडी की शुरुआत और सोमनाथ मंदिर के निर्माण से परहेज 
परिवर्तन के अवसर को गंवा दिया गया. पंडित नेहरू की इस इस जिद का परिणाम लाखों मुस्लिम महिलाओं ने भुगता. नेहरु की इस परम्परा को उनके नाती राजीव गांधी ने निभाया, और अब राहुल गांधी निभा रहे हैं. तीन तलाक़ की पीड़ा को अनसुना कर दिया गया. हलाला की शर्मिंदगी से आंखें फेर ली गईं. शाहबानों का नाम बार-बार चर्चा में आता है, लेकिन इमराना की भी याद करें मुजफ्फर नगर की 28 वर्षीय इस मुस्लिम युवती के साथ 6 जून 2005 को उसके ससुर अली मुहम्मद ने बलात्कार किया. मामला स्थानीय शरिया अदालत में ले जाया गया. वहां से फरमान जारी हुआ कि चूंकि उसके ससुर ने उसके साथ बलात्कार किया है, इसीलिए उसके ससुर का बेटा, अर्थात इमराना का पति, इमराना के लिए बेटे समान हो गया है. इसलिए दोनों का निकाह अपने आप ही निरस्त हो गया है. फैसला सुन कर स्तब्ध हुई पांच बच्चों की मां इमराना को समझाइश देते हुए शरिया अदालत ने कुरान की आयत (4:22) दोहराई ‘वा ला तनकीहू मा नकाहा आबा-ओ-कुम’ अर्थात् जिन महिलाओं से तुम्हारे बाप ने निकाह किया है, उनसे तुम निकाह न करो.’ इस तरह बलात्कारी ससुर को छुट्टा छोड़ते हुए इस्लामी न्यायाधीशों ने इमराना और उसके पांच मासूम बच्चों को बिना कुछ कहे कठोरतम सजा सुना दी. जहां एक ओर इस फतवे से सारा सभ्य समाज अवाक् रह गया वहीं मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड फतवा देने वालों के साथ जा खड़ा हुआ. इस तरह के अन्याय किये जाते रहे.
परिवर्तन के नए दौर का शुभारंभ हो
आज़ादी के बाद जब सारे देश को भारतीय जीवन मूल्यों के आधार पर एक सूत्र में बांधा जा सकता था, तब ‘अल्पसंख्यकवाद’ का विभाजनकारी दाँव खेला गया. मज़हबी पहचान को राष्ट्रीयता के ऊपर स्थापित किया गया. सेकुलरिज्म के नाम पर देश की संस्कृति को नकारा गया. फलस्वरूप स्थान-स्थान पर अलगाववाद पनपा. समाज में नई नई दरारें पैदा हुईं. उर्दू को लेकर मजहबी राजनीति की गई. इमामों को सरकारी भत्ते दिए जाने लगे. सरकारी खर्चे पर रोजा इफ्तार होने लगा. संविधान की मूल भावना को दरकिनार करके अल्पसंख्यक संस्थानों के नाम पर सरकारी पैसे की लूट होने लगी. बाटला हाउस के आतंकियों के लिए आंसू बहाए जाने लगे. केरल की तथाकथित सेकुलर सरकार ने सर्कुलर जारी कर दिया कि 18 वर्ष से आयु की मुस्लिम लड़कियों के विवाह के पंजीयन किए जाएं. मज़हबी आधार पर आरक्षण की मांग की गई. और देश के प्रधानमंत्री (मनमोहन सिंह) सार्वजनिक रूप से कहने में नहीं हिचके देश के संसाधनों पर पहला अधिकार अल्पसंख्यकों का है.
अब समय है अल्पसंख्यकवाद की विभाजन कारी राजनीति के खात्मे का. तीन तलाक पर बने कानून ने तथाकथित सेकुलर राजनीति के खोखलेपन को उजागर तो किया ही है, इसने मुस्लिमों के बीच में कट्टरपंथी मुस्लिम नेतृत्व की ताकत के भरम को भी तोड़ा है. इससे उम्मीद की नई सुबह का आगमन हुआ है, जो मुस्लिम समाज में उदार और वास्तविक रूप से प्रगतिशील नेतृत्व के उभरने की उम्मीद जगाती है. यह छद्म सेकुलरवाद की राजनीति के अंत की शुरुआत है. यह नए समाज के उदय का संकेत है.