आखिर मिल ही गई 'तीन तलाक' से आजादी
   दिनांक 31-जुलाई-2019
तीन तलाक पर कानून बनाकर मोदी सरकार ने सिद्ध कर दिया है कि अगर कोई मुस्लिम समाज को सही मायने में कुरीतियों से बचाना चाहता है और पवित्र कुरान और हदीस की मूल शिक्षाओें का पालन करवाना चाहता है तो वह मोदी सरकार ही है

 
तीन तलाक पर कानून बनने के बाद खुशी मनाती मुस्लिम महिलाएं
पवित्र कुरआन में साफ— साफ शब्दो में सूरहे बकराह और सूरेह निसा में तलाक के बारे में स्पष्ट किया है। एक साथ तीन तलाक कहीं भी कुरान में नहीं हैं इसे गलत तरीके से परिभाषित किया गया है। वास्तव में कुरान शरीफ में तलाक को एक बुरी घटना की तरह देखा गया है।
सूरेह निसा की आयत नम्बर 35 में खुलासा किया गया है कि अगर तुम्हें शौहर और बीवी में फूट पड़ जाने का अंदेशा हो तो एक हकम यानी कि निर्णायक मर्द के पक्ष का और एक औरत के पक्ष में से मुक़र्रर कर दो। अगर शौहर और बीवी दोनों सुलह चाहेंगे तो अल्लाह उनके बीच सुलह करा देगा, बेशक अल्लाह सब कुछ जानने वाला और सब की खबर रखने वाला है।
तलाक उल बिद्वत- का अर्थ है, वह तलाक जो खराबी वाला हो यानी बिद्वत का अर्थ होता है खराबी। सही मायने में वह तलाक जो पवित्र कुरान के हवाले से नहीं हो और उसमें अपनी तरफ से कुछ जोड़ दिया गया हो उसे सही तलाक नहीं माना गया है। हालांकि इस्लाम के हवाले से देखने में आता हे कि इस्लाम के खलीफा हजरत उमर फारूख र0अ0 ने तलाक के एक मामले में एक शख्स को कोड़े मारने की सजा दी थी। दरअसल उस शख्स ने तलाक उल बिद्वत का हवाला देकर एक बार में अपनी बीवी को तलाक दे दिया था जब मामला खलीफा के पास पहुंचा तो उन्होंने इसे जायज नहीं ठहराया और उस शख्स को सजा दी।
तलाक उल बिद्वत का हवाला देकर ही मुल्ला मौलवी तीन तलाक को जायज ठहराते आए हैं। जिसका खामियाजा तलाक पाने वाली मुस्लिम बहनों और उनके पूरे परिवार को जीवन भर झेलना पड़ रहा था।
आजादी के बाद से ही मुसलमानों को सिर्फ एक वोट बैंक की तरह ही प्रयोग किया जा रहा था। तथाकथित मुस्लिम विद्वान सरकारी निर्देशों के तहत पूरे समाज को कभी तलाक कभी 'समान नागरिक संहिता' कभी मदरसा शिक्षा के नाम पर दिशाविमुख करते रहे। तलाक के मसले पर जिस प्रकार से सूरे बकराह और सूरे निसा में पति पत्नी के रिश्तों का खुलासा किया गया है उस बारे में सही जानकारी मुसलमानों को दी ही नहीं गई। कुरान की मूल शिक्षा से परे जाकर मुसलमानों को जो समझाया गया उसके चलते आज अधिकतर मुसलमान एक साथ दिए गए तीन तलाक को सही मानते रहे और यह एक कुरीति की तरह पूरे देश में लागू रहा। वहीं तथाकथित मुस्लिम नेता और मुस्लिम संगठन इस मसले पर हायतौबा कर इस्लाम को खतरे में बताकर इस पर सियायत करते रहे। आज तीन तलाक पर कानून बनाकर मोदी सरकार ने सिद्ध कर दिया है कि अगर कोई मुस्लिम समाज को सही मायने में कुरीतियों से बचाना चाहता है और पवित्र कुरान और हदीस की मूल शिक्षाओें का पालन करवाना चाहता है तो वह मोदी सरकार ही है। मोदी सरकार ने मुस्लिम बहनों और पूरे मुस्लिम समाज को एक बड़े गुनाह से बचाया है जो दशकों से लगातार हो रहा था। सही मायनों में मोदी सरकार ने मुसलमानों की इस कानून के द्वारा मदद ही की है।
एक साथ तीन तलाक की वैश्विक स्थिति
भारत के तथाकथित मुस्लिम विद्वान जब एक साथ दिए गए तीन तलाक के अलमबरदार बने हुए थे उन्हें मालूम होना चाहिए था कि विश्व के कई देशों में एक साथ तीन तलाक देना गैर कानूनी है। अरब के मुल्कों अल्जीरिया, मिस्र, इराक, जोर्डन, कुवैत, लेबनान, लिबिया, मोरक्को, सुडान, सीरिया, ट्यूनेशिया, यूएई और यमन में एक साथ तीन तलाक पर कानून है। इसके अलावा इंडोनेशिया, मलेशिया और फिलीपींस में भी तीन तलाक पर रोक है। हमारे पड़ोसी मुल्कों जैसे पाकिस्तान, बंगलादेश, श्रीलंका में भी एक साथ तीन तलाक देना जुर्म है।
कुछ मुल्कों के एक साथ तीन तलाक देने पर कानूनी प्रावधान की जानकारी भी होना जरूरी है इसलिए कुछ प्रमुख प्रावधानों का जिक्र करना लाजमी हैः
अल्जीरिया में इस्लामिक देश है जहां कानून है कि तीन महीने से अधिक की अवधि के लिए सुलह के प्रयास से पहले अदालत के फैसले को छोड़कर तलाक नहीं दिया जा सकता। मिस्र में 1929 में कानून बनाया गया कि नशे या मजबूरी के प्रभाव में दिया गया तलाक, तलाक नहीं माना जाएगा। एक साथ तीन तलाक मान्य नहीं होगा। संयुक्त अरब अमीरात में कानून है कि वहां भी एक साथ तीन तलाक नहीं दिया जा सकता।
तीन तलाक को लेकर मुसलमानों में यह बात काफी समय से घर कर रही थी कि कुरान और हदीस में बताये मार्ग के विपरीत जा कर पति पत्नी के रिश्ते को तोड़ना सरासर गलत है मगर तथाकथित मुस्लिम विद्वानों ने गलत व्याख्या करके पूरे मसले को एक जज्बाती रंग दे दिया था। इसके चलते मुस्लिम महिलाएं तलाक का दंश झेल रही थी और उनके नाबालिग बच्चे लावारिस की जिंदगी गुजारने को मजबूर थे। इस्लाम की बात करें तो इस्लाम की मूल शिक्षाओं में महिलाओं का सम्मान सर्वोच्च है। अभी तक तीन तलाक का सहारा ले कर मुस्लिम महिलाओं का शोषण किया जा रहा था अब इस ऐतिहासिक कानून के आने के बाद मुस्लिम महिलाओं में न्याय पाने की आस जगी है। मैं व्यक्तिगत तौर पर कई महिलाओें को जानता हूं जिनकी जिंदगी एक साथ तीन तलाक के बाद जहन्नुम बन गई थी। आज वह यही दुआ करती होंगी कि मेरे साथ जो हुआ अब और किसी के साथ ऐसा न हो। माननीय सर्वोच्च न्यायालय के तीन तलाक के फैसले के बाद यह बात स्पष्ट है कि एक नया सवेरा भारत की भूमि पर आ रहा है और समाज को भटकाने ओर बरगलाने का समय अब लदने वाला है। यकीनन इस कानून के आने के बाद मोदी सरकार की हिमायत मुस्लिम समाज के एक बहुत बड़े वर्ग द्वारा की जाएगी क्योंकि इस ऐतिहासिक कानून के बाद से मुस्लिम महिलाओं का सम्मान जहां कायम हुआ है वहीं पर ईस्लाम के मूल सिद्धांतों का भी संरक्षण किया गया है। एक मुस्लिम विधि व्याख्याता और अधिवक्ता होने के नाते मुझे यह कहते हुए गर्व हो रहा है एक साथ तीन तलाक की कुप्रथा का अंत हुआ है।
(लेखक मुस्लिम विधि के व्याख्याता और सर्वोच्च न्यायालय में अधिवक्ता हैं )