राहुल के इस्तीफे के मायने
   दिनांक 04-जुलाई-2019

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने ट्विटर पर चार पेज की चिट्टी सार्वजनिक कर पार्टी के अध्यक्ष से इस्तीफा देने का ऐलान किया। इसके पहले लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की करारी हार, यहाँ तक कि नेहरू-गांधी परिवार की परंपरागत सीट अमेठी से स्वयं हार जाने के बाद भी 25 मई को राहुल गांधी ने पार्टी के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया था जिसे कांग्रेस कार्यसमिति ने ठुकरा दिया था। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता उन्हें मनाने की कोशिश करते रहे। लेकिन आखिरकार सवा महीने बाद राहुल ने ट्विटर पर इस्तीफे की पुष्टि कर ही दी।
क्या हैं कांग्रेस के इस राजनीतिक प्रहसन के मायने? राहुल गांधी कहते हैं कि नया कांग्रेस अध्यक्ष नेहरू-गांधी परिवार से बाहर का होना चाहिए। राहुल लोकसभा चुनाव में हार की जिम्मेदारी भी ले रहे हैं। लेकिन इससे पहले 25 मई को इस्तीफा देने के बाद बीच में एक बार उन्होंने नाराजगी जताई थी कि उनके इस्तीफा देने के बावजूद किसी और ने इस हार की जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफे की पेशकश तक नहीं की। यानी राहुल को लग रहा था कि उनके इस्तीफा देने से कांग्रेस के तमाम नेता हार की जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफे की पेशकश करेंगे और नेहरू-गांधी परिवार की लुटी साख के साथ ही साथ कांग्रेस की साख की पुनर्स्थापना होगी।
लेकिन ऐसा नहीं हुआ जिससे राहुल निराश हुए। इसके बाद दूसरी कतार के कुछ कांग्रेसी नेताओं का इस्तीफा दिलवा कर कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं पर दबाव बनाने की कोशिश हुई। फिर भी कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने सांस नहीं ली और खामोश रहे। आखिरकार निराश-हताश राहुल गांधी ने 3 जुलाई को ट्विटर पर फिर से इस्तीफा दे दिया और ट्विटर पर अपने नाम के साथ कांग्रेस अध्यक्ष का पदनाम हटा लिया।
इस्तीफे में गंभीरता नहीं
इस पूरे प्रकरण से कई संकेत निकलते हैं। पहला तो यह कि राहुल गांधी की राजनीति में अभी भी गंभीरता नहीं आई है। वे अपने इस्तीफे का ऐलान कार्यकारिणी की बजाय सार्वजनिक रूप से करते हैं। स्पष्ट है कि इस इस्तीफे में हार की जिम्मेदारी लेने से ज्यादा भाव जिम्मेदार और शहीद होने का सार्वजनिक शोशा खड़ा करने का है। यदि राहुल वाकई कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में लोकसभा चुनावों की हार की जिम्मेदारी लेने में गंभीर होते तो इस्तीफा सोशल मीडिया पर देने की बजाय कार्यकारिणी में इस हार पर मंथन और विश्लेषण करते और फिर कार्यकारिणी में ही दो-टूक इस्तीफा देते।
संगठन पर पकड़ नहीं
पहली बार इस्तीफा देने के सवा महीने बाद इस्तीफे की दोबारा पुष्टि करने का सीधा अर्थ निकलता है कि राहुल इस्तीफे के नाम पर पार्टी के भीतर कुछ खास किस्म की राजनीति करना चाहते थे लेकिन कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं की चुप्पी ने उनकी इस रणनीति को नाकाम कर दिया। वरिष्ठ नेताओं द्वारा हार की जिम्मेदारी नहीं लिये जाने पर राहुल द्वारा जतायी गयी नाराजगी भी यही जाहिर करती है। दरअसल राहुल यह इस्तीफा देकर इंदिरा काल की कामराज योजना की तरह का एक शोशा खड़ा करना चाह रहे थे। लेकिन कांग्रेस के चतुर घुटे नेताओं ने यह संकेत पकड़ लिया और होठ सीये रहे। साफ था कि राहुल की संगठन पर पकड़ और असर खत्म हो चुकी है। ऐसे में राहुल के लिए पद पर बने रहने का औचित्य खत्म हो गया।
जिम्मेदारी से पलायन
राहुल चार पेज में हार की जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफे की घोषणा करते हैं। इस हार की जिम्मेदारी लेने में शहीदाना भाव है, जिम्मेदारी का नहीं। वैसे भी इस हार के लिए यदि राहुल गांधी जिम्मेदार नहीं होते तो कौन होता? याद रखिये! राहुल अपनी राजनीतिक या सांगठनिक काबिलियत के चलते नहीं, बल्कि नेहरू-गांधी परिवार का होने के नाते ही कांग्रेस महासचिव, और फिर कांग्रेस अध्यक्ष बने। कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद उन्होंने मान लिया कि जिस तरह कांग्रेस उनके सामने नतमस्तक रहती है, उसी तरह देश की जनता भी रहेगी। यहीं वे मात खा गये और वे स्वयं अपनी परंपरागत सीट अमेठी तक से हार गये। अमेठी से उनकी हार के बाद किसी अन्य कांग्रेसी प्रत्याशी का हारना या कांग्रेस की हार के लिए किसी अन्य के जिम्मेदारी लेने का कोई मतलब नहीं है। फिर भी राहुल चाहते रहे कि कांग्रेस के अन्य वरिष्ठ नेता उनके इस्तीफे के बाद जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दें। जाहिर है राहुल हार की जिम्मेदारी से बचना चाह रहे थे और उन्होंने इसके परिणामस्वरूप कांग्रेस में अपनी जिम्मेदारियों से पलायन करना श्रेयस्कर समझा।
नेहरू-गांधी परिवार से बाहर के अध्यक्ष की मांग
राहुल गांधी अपने इस्तीफे के साथ एक बात और जोड़ते हैं कि नया अध्यक्ष नेहरू-गांधी परिवार से बाहर का होना चाहिए। क्यों? दरअसल थोड़ा पीछे जाइये। सोनिया गांधी के अध्यक्ष और सत्ता में रहते हुए कांग्रेस 2014 में बुरी तरह पराजित होकर महज 44 सीटों पर सिमट गयी। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी अध्यक्ष थे और कांग्रेस फिर विपक्षी पार्टी बनने तक की संख्या से नीचे रह गयी। यानी लगातार दो चुनावों में नेहरू-गांधी परिवार के सदस्य अध्यक्षों के माथे पर कांग्रेस की जबरदस्त पराजय का दाग है। राहुल जानते हैं कि नेहरू-गांधी परिवार का कोई सदस्य अध्यक्ष रहे, न रहे, पार्टी के भीतर सत्ता नेहरू-गांधी परिवार की ही रहेगी और कांग्रेस के केंद्र में सरकार बनाने का अवसर आया तो प्रधानमंत्री नेहरू-गांधी परिवार से ही होगा। ऐसी स्थिति में कांग्रेस अध्यक्ष पद लेकर किसी हार के लिए जिम्मेदार बन कर नेहरू-गांधी परिवार की चुनावी साख को खत्म करने का कोई अर्थ नहीं है।
बाहर के अध्यक्ष की कितनी होगी बिसात
राहुल यदि कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर नेहरू-गांधी परिवार से बाहर के व्यक्ति को नियुक्त करने की बात कर रहे हैं तो यह समझने की जरूरत है कि क्या वाकई परिवार से बाहर के अध्यक्ष की कोई बिसात होगी? हमारे सामने दो-तीन उदाहरण मौजूद हैं। याद कीजिये कि नेहरू-गांधी परिवार से बाहर के अध्यक्ष सीताराम केसरी का क्या हस्र हुआ था। परिवार से बाहर के प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव के पार्थिव शरीर को कांग्रेस मुख्यालय में प्रवेश तक नहीं करने दिया गया। यहाँ तक कि राव की अन्त्येष्टि दिल्ली तक में नहीं होने दी गयी। जरा परिवार के बाहर के प्रधानमंत्री, भले वह परिवार द्वारा नियुक्त था, डॉ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल की याद कीजिये। कैबिनेट दागी नेताओं के संबंध में एक निर्णय करती है और प्रधानमंत्री पद से बहुत नीचे, कांग्रेस के महासचिव स्वयं राहुल प्रेस कांफ्रेंस में आते हैं और कैबिनेट के फैसले की प्रतियां फाड़ कर फेंक देते हैं। स्पष्ट है कि राहुल के लिए नेहरू-गांधी परिवार की साख बनाने के रास्ते में देश के संवैधानिक पदों का कोई मूल्य नहीं है। ऐसे में नेहरू-गांधी परिवार से बाहर का कोई व्यक्ति यदि कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया जाता है तो उसकी क्या बिसात होगी। और, क्या वाकई कांग्रेस के अध्यक्ष पद के लिए ईमानदारी से स्वतंत्र रूप से कोई व्यक्ति चुना जा सकता है? अब तक जो नाम आ रहे हैं, वे नेहरू-गांधी परिवार के वफादार सिपसालारों के ही नाम है। यानी, राहुल की यह कवायद कांग्रेस के खिलाफ नकारात्मक परिणामों के लिए बलि का एक बकरा ढूंढने के लिए है न कि कांग्रेस के आमूल-चूल परिवर्तन के लिए कोई गंभीर या जिम्मेदार कवायद।