कर्ज और मजहबी उन्माद में दबा ‘कप्तान’
   दिनांक 05-जुलाई-2019
 
पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान
कहावत है- कंगाली में आटा गीला! यानी समय जब परेशानियां लाता है तो चारों ओर से लाता है। विश्व मंच पर देखें तो फिलहाल यह कहावत पाकिस्तान की स्थितियों पर सटीक बैठती है। पाकिस्तान के वर्तमान कप्तान एक समय देश की क्रिकेट टीम के कप्तान रहे हैं। इसलिए तेज रफ्तार गेंदबाज रहे इमरान की अगुआई में पाकिस्तान की सुस्त चाल के लिए ‘क्रिकेट’ एक सहज रूपक हो सकता है। विश्व कप मुकाबलों में पाकिस्तान अपने खराब प्रदर्शन से उतना निराश नहीं था, जितना कि वह इंग्लैंड के हाथों भारत की हार से झल्लाया हुआ था।
भारत के आर्थिक सर्वेक्षण में 7 प्रतिशत विकास दर के अनुमान पर पड़ोसी ज्यादा चौंके, जबकि उन्हें गर्त में जाती पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था के लिए ज्यादा चौकन्ने रहने की जरूरत थी। जिस समय पाकिस्तान के पास बांग्लादेश पर असंभव जीत दर्ज करा इज्जत बचाने के लिए (भले सिर्फ कहने को ही सही) एक मौका था, उस समय इस्लामाबाद में वित्त नियोजन के मोर्चे पर सूरमाओं के चेहरों पर हवाइयां उड़ रही थीं। क्योंकि 1971 में भारत ने जिस बांग्लादेश को उससे अलग किया और जिसे क्रिकेट में वह कुछ नहीं समझता था, आज वह विश्व मंच पर किनारे होकर भी पाकिस्तान की प्रतिष्ठा के चीरहरण के लिए डटा है। उसे अंतत: रन रेट में पछाड़ने का मंसूबा पाल लेने पर भी बांग्लादेश की आर्थिक सेहत पाकिस्तान से कहीं अच्छी है। बांग्लादेश का विदेशी मुद्रा भंडार आज की स्थिति में 33 अरब डॉलर है, जो पाकिस्तान के मुकाबले करीब पांच गुना बैठता है! किसी तरह इज्जत बनाए रखने का गुणा-भाग पाकिस्तान को हताश करने वाला इसलिए था, क्योंकि पाकिस्तान के पास केवल सात अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार बचा है। सुधार और प्रभाव छोड़ भी दें तो राजकोष का अकेला यह आंकड़ा इस बात की मुनादी कर रहा है कि परेशानी गहरी है। इतनी विकराल कि विश्व कप के समीकरण यदि सहज भी रहे होते तो खाली तिजोरी के साथ किसी जीत के जश्न नहीं मनाए जा सकते थे।
विश्व कप में पाकिस्तान का रन रेट यदि नकारात्मक था, तो वित्त जगत में फिच जैसी अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी ने उसकी विकास दर केवल 3.2 प्रतिशत वार्षिक रहने का अंदेशा जताया है। इमरान ने कई दिग्गज टीमों की पारियां ढहाई हैं, लेकिन आज उन पर ढहती हुई अर्थव्यवस्था को किसी तरह बचा लेने का जिम्मा है। किन्तु क्या यह काम आसान है! नहीं!
‘रिवर्स स्विंग’ भी आसान नहीं होती, इमरान को इसमें महारत थी। लेकिन यह भी सच है कि एक तरफ से घिसी बॉल से ‘रिवर्स स्विंग’ आसान है, लेकिन दोनों ओर से घिसी, पूरी चमक खो चुकी अर्थव्यवस्था में ‘स्विंग’ तो छोड़िए ‘लाइन’ ‘लेंथ’ ठीक रखना ही बड़ी चुनौती है। उत्पादन और निवेश अर्थव्यवस्था के दो सिरे माने जाते हैं। पाकिस्तान में दोनों अपना रूप-रंग खो चुके हैं। निवेश की संभावनाओं को आतंकवाद लील गया और उत्पादन पारिवारिक श्रम की चारदीवारी में सीमित रह गया। क्रिकेट मुकाबलों में इमरान की मजबूत कमांडर सरीखी छवि रही, लेकिन दुनिया के अन्य देशों से अलग पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था का एक आयाम यह भी है कि सेना के कमांडर व्यापार के मोर्चों पर डटे दिखते हैं। 70 वर्ष की आजादी में आधे से ज्यादा समय राज करने वाली सेना आधारभूत ढांचे के अलावा भी तिजारत (व्यापार) में गहरे धंसी है।
पाकिस्तान की आर्थिक स्थितियों पर भारत या दुनिया के अन्य देशों के गहराई से देखने-सोचने की अहम वजह यह है कि आतंकवाद को अपने बच्चे की तरह पालते पाकिस्तान ने देश, समाज और मजबूत अर्थव्यवस्था के लिए आवश्यक पोषण ‘जिहादी जमात’ को पोसने में लगातार खर्च किया है।
कमजोर पाकिस्तान को दुनिया के लिए खतरा बताया जाता रहा है। इसके पीछे तर्क दिया जाता है कि खस्ताहाल स्थितियों में भारी विनाश के अस्त्र इस्लामी उन्मादियों के हाथ लग सकते हैं! इसमें किंचित सचाई होने पर भी एक सवाल तो सदा अनसुलझा, अनसुना ही रहा है- क्या मजहबी उन्माद सिर्फ उन पालों तक सीमित है, जहां इसका अंदेशा और आक्षेप हैं? या फिर इस उन्माद और कट्टरता को खाद-पानी देते-देते पाकिस्तानी समाज और व्यवस्था का बड़ा हिस्सा स्वयं इस ताप में ऐसा बेसुध हो गया कि इसका आनंद लेने लगा! ऐसा बेसुध कि अर्थव्यवस्था के अहम कारकों, संपन्नता को आधार देने वाले सौहार्दपूर्ण सामाजिक समीकरणों और विविधता के बेल-बूटों को फौजी बूटों तले कुचल डाला गया!
सवाल पाकिस्तान की बदहाली और गफलत का नहीं, ‘उम्मत’ और ‘जिहाद’ की उस ‘लत’ का है जिसे सीने से लगाए रखते हुए वह अर्थव्यवस्था को मझधार से निकालने के लिए प्र्गतिशील दुनिया की मदद चाहता है। क्या यह संभव है? इस्लाम ब्याज की मनाही करता है, मगर आज की स्थिति में क्या पाकिस्तान बिना ब्याज और कर्ज के एक कदम भी चल सकता है?
पाकिस्तानी क्रिकेट बोर्ड के वर्तमान अध्यक्ष एहसान मनी हैं। पेशे से चार्टर्ड एकांउटेंट अहसान जानते हैं कि ट्रॉफी अपनी जगह, मगर आज पाकिस्तान के लिए ‘मनी’ ज्यादा महत्वपूर्ण है।