वापस लौटा अवॉर्ड वापसी गिरोह
   दिनांक 08-जुलाई-2019
वो विमर्श खड़ा करना चाहते हैं, लेकिन कोई तथ्य पेश नहीं करना चाहते. काल्पनिक बातों के तथ्य पेश किए भी कैसे जा सकते हैं. भ्रमित बुद्धिजीविता और जानते बूझते देश को भ्रमित करने का प्रयास कर रहे अवॉर्ड वापसी गिरोह की यही मजबूरी है.
फिल्म अभिनेत्री शबाना आज़मी ने बयान दिया है कि देश में ऐसा माहौल बनाया गया है कि सरकार की आलोचना वालों को राष्ट्र द्रोही करार दे दिया जाता है. लगभग इसी तरह के बयान उनके पति और पटकथा लेखक जावेद अख्तर लोकसभा चुनावों के दौरान व्यक्त कर चुके हैं. ऐसे ही मौके होते हैं जब सेकुलरिज्म के सूरमा मैदान में कूद पड़ते हैं. शबाना आज़मी के बयान के बाद साल 2014 के बाद हुए अवार्ड वापसी तमाशे की यादें ताजा हो गई. इस तरह के बयानों से जिन्हें आड़ मिलती है, ऐसे तत्व तो खुश हुए ही, विपक्ष के कई नेता भी मीडिया में सुर्खियां बनाने के लिए मचल उठे.

हालांकि ऐसे लोगों की आजकल एक समस्या है. जेएनयू के टुकड़े टुकड़े कांड के बाद जो गहमागहमी हुई, जिस प्रकार से समाचार चैनलों के दर्शकों ने रुख दिखाया, उससे मीडिया जगत के बड़े-बड़े दिग्गजों के होश उड़ गए. जब कन्हैया कुमार और उमर खालिद जेएनयू में भारत विरोधी नारों के बीच नेतागिरी कर रहे थे, और राहुल गांधी, अरविंद केजरीवाल जैसे नेता उनकी हौसला अफजाई कर रहे थे, वामपंथी नेता, फैशनपरस्त एक्टिविस्ट कन्हैया कुमार और खालिद की बलैयां ले रहे थे, तब बहुत थोड़े से ही पत्रकार और इक्का-दुक्का न्यूज़ चैनल ही थे जो खुलकर इस देश विरोधी कृत्य की सही रिर्पोटिंग और आलोचना कर रहे थे. जब इस देश विरोधी कृत्य पर प्रशासनिक कार्यवाही शुरू हुई तो एक ने प्राइम टाइम में अपना स्क्रीन ही काला कर डाला. कोई कोई इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बतला रहे थे, और शेष तटस्थ बने हुए थे. जब इस पखवाड़े की टीआरपी सामने आई तो बहुत सारे मीडिया कार्यालयों में भूचाल आ गया.
जिन चैनलों ने राष्ट्रीय दृष्टिकोण रखते हुए जेएनयू प्रकरण की बेबाक रिपोर्टिंग की थी, उनकी टीआरपी आसमान छू रही थी, शेष बड़े-बड़े दिग्गज धूल चाट रहे थे. दर्शकों ने अपनी भावनाओं का इजहार कर दिया था. देश को जेएनयू कांड में कन्हैया - खालिद समर्थक चैनलों और तटस्थ रहने वाले पत्रकारों दोनों की ही भूमिका पर एतराज था. टीआरपी और विज्ञापन, यह दो ऐसे शब्द हैं, जिनके आगे मीडिया घरानों के व्यक्तिगत अहम, वाद, समीकरण सब फीके पड़ जाते हैं. मंथन हुआ, और रिपोर्टिंग में संतुलन बनाने के प्रयास शुरू हो गए. स्थापित हो गया था, कि राष्ट्रीय दृष्टिकोण से की गई रिपोर्टिंग भी ' सैलेबल' है. ऐसी घटनाओं पर सोशल मीडिया में उठने वाला ज्वार भी बार बार यही बतलाता है, कि आज का दर्शक उसके मुंह में जो ठूंस दिया जाए, उसे पहले की तरह चुपचाप निगलने को तैयार नहीं है. अब उसके पास विकल्प हैं. अपनी असहमति और रोष को व्यक्त करने के माध्यम हैं. इसलिए अब एकतरफा रिर्पोटिंग से काम चलने वाला नहीं है.
कसौटी पर कसा जाए इस ‘बुद्धिजीविता’ को -
इस नयी बयार ने पुरानी जमावटों को उखाड़ फेंका है. बुद्धिजीविता के खास तरह के उत्पादों से सजी दुकान अब सिमट रही है. इस तथ्य को स्वीकारना जिनके लिए कठिन हो रहा है, वो परिवर्तन को गालियां दे रहे हैं. थोड़ी मात्रा में एक भ्रमित बुद्धिजीवी वर्ग भी है, जिसकी बुद्धिजीविता को खुलकर कसौटी पर कसा जाना चाहिए, जैसा कि श्रीमती शबाना जावेद अख्तर ने भी कहा है कि सवाल पूछे जाने चाहिए.
शबाना आज़मी और उनके पति जावेद अख्तर ने कन्हैया कुमार का खुलकर समर्थन किया है. उसे 'खुले विचारों वाला' बतलाया. जावेद अख्तर तो कम्युनिस्ट पार्टी के लोकसभा प्रत्याशी कन्हैया कुमार का चुनाव प्रचार करने बेगूसराय भी गए थे. अब शबाना जी बतलाएं कि ‘भारत की बर्बादी तक, जंग रहेगी’ और ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे – इंशाअल्लाह- इंशाअल्लाह’ के नारे क्या केंद्र सरकार की आलोचना थी? कांग्रेस के चुनावी घोषणापत्र में देशद्रोह की धारा हटाने का वादा या कश्मीर में सेना से पूछे बिना आर्म्ड फ़ोर्स स्पेशल पॉवर एक्ट हटाने की बात क्या सरकार की आलोचना थी? इस तरह की बुद्धिजीविता को कटघरे में खडा करने की आवश्यकता है.
राष्ट्रवाद और राष्ट्रीयता में अंतर -
सबसे ताजा मामला है महुआ मोइत्रा का, जिसके लिए ‘प्रगतिशील’ बुद्धिजीवियों ने तालियां बजाईं. टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा ने संसद में खड़े होकर कहा कि देश में फासिज़्म आ गया है, और फासिज़्म का पहला लक्षण राष्ट्रवाद है. अनेक नेता और लिबरल/ वामपंथी पत्रकार व बुद्धिजीवी महुआ पर प्रशंसा के फूल बरसाने लगे. उनके साक्षात्कार होने लगे. लेकिन महुआ से ये किसी ने नहीं कहा कि फासिज़्म और राष्ट्रवाद दोनों विचार अभारतीय हैं.
खैर! महुआ मोइत्रा संसद में चीख-चीखकर जो भाषण पढ़ रही थीं, वो भी हलंत, कौमा, पूर्णविराम सहित अक्षरशः नक़ल था, जिसे एक अमेरिकन वेबसाइट पर डोनाल्ड ट्रम्प के किसी आलोचक ने लिखा था.
राष्ट्रवाद अठारहवीं और उन्नीसवीं सदी का यूरोपीय विचार है, जिसने दुनिया को दो विश्व युद्धों में झोंका, और करोड़ों जानें लीं. क्या था यूरोप का यह राष्ट्रवाद? यह राष्ट्रवाद था कि ' मेरा देश ही सारी दुनिया में जीने का अधिकार रखता है. और हम सभी दूसरे देशों को कुचलकर उन्हें झुकाएंगे अथवा अपना गुलाम बनाएंगे.' इसीलिए ब्रिटेन सारी दुनिया को गुलाम बना रहा था. फ्रांस, पुर्तगाल, स्पेन, सभी इस प्रतिस्पर्धा में लगे थे. एक दूसरे के गले काट रहे थे. द्वितीय विश्व युद्ध में जर्मनी ने यूरोप के 16 देशों को रौंद डाला था. हिटलर से समझौता करके स्टालिन के नेतृत्व वाले कम्युनिस्ट रूस ने भी अनेक देशों की स्वतंत्रता का हरण किया था. जापान ने दक्षिण पूर्व एशिया में मौत बरसाई थी. सभी ने मनुष्यता पर अकथनीय अत्याचार किए थे. इसलिए आज के यूरोप और अमेरिका में राष्ट्रवाद एक विवादित, भयभीत करने वाला शब्द बन गया, जिसे सुनते ही वहां पर आम लोगों के कान खड़े हो जाते हैं, क्योंकि इस अंधे राष्ट्रवाद की मार में उन सब ने बहुत कुछ खोया था. इसीलिए ट्रंप के विरोधी उन्हें निशाना बनाने के लिए' ' राष्ट्रवाद' का उपयोग करते हैं.
इसके विपरीत भारत में राष्ट्रवाद जैसी कोई चीज नहीं रही है. भारत में राष्ट्रीयता सनातन काल से विद्यमान है. वेदों में भी भारत को एक राष्ट्र बतलाया गया है. राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद के अंतर को समझना आवश्यक है. जब वाद होता है तो विवाद भी होता है. राष्ट्रवाद के बारे में हमने पिछली पंक्तियों में बात की. यूरोप का राष्ट्रवाद एक सामूहिक अहंकार, स्वार्थ और दूसरों के प्रति हीनता के भाव से उपजा, जिसकी परिणिति भयंकर रक्तपात के रूप में हुई. राष्ट्रीयता अपनी संस्कृति, अपने मान बिंदुओं, अपनी भूमि से लगाव से उपज ने वाली व्यक्तिगत और सामूहिक मनोदशा है. अपने ' स्व' का भान है. इसमें दूसरों के प्रति उपेक्षा, हीन भावना, हिंसा आदि का कोई स्थान नहीं है. इसीलिए सारे विश्व में भारत एकमात्र देश है जिसने हजारों साल के इतिहास में कभी किसी अन्य देश पर आक्रमण नहीं किया. इसीलिए राष्ट्रीयता एक सकारात्मक भाव दशा और विचार है, जबकि राष्ट्रवाद नकारात्मक विचार है. यह इतिहास सिद्ध तथ्य है. लेकिन विदेशों से उधार ली गई बुद्धिजीविता भारत राष्ट्र को नहीं समझ पाती. न समझना चाहती है. भारत में राष्ट्र को लेकर कोई ‘वाद’ नहीं है. राष्ट्रीयता को लेकर चर्चा और अपेक्षाएं हैं. सब राष्ट्रीयता के एक सूत्र में जुड़कर चलें ऐसी आशा है.
झूठे तर्क, चयनित आक्रोश -
महुआ ने दूसरी बात कही कि भारत में मानवाधिकारों की अवहेलना हो रही है. अब यह ऐसा बयान है जिसकी हर कोई अपने हिसाब से व्याख्या कर सकता है. इस बयान को उठाकर पाकिस्तान दुनिया में प्रोपेगेंडा कर सकता है हिंदुस्तान की सेनाएं कश्मीर में मानवाधिकारों का हनन कर रही है. ऐसे बयान शहरी नक्सली (अर्बन नक्सल) भी देते हैं. महुआ भीड़ द्वारा किए जाने वाले अपराधियों को सरकार पर थोप कर मानवाधिकार की दुहाई दे रही है. ये मानवाधिकार भी उनके लिए बड़े चयनित किस्म के हैं. मानवाधिकारों का हनन हुआ है अथवा नहीं इसका फैसला महुआ जैसे लोग इस आधार पर करते हैं कि पीड़ित किस मजहब का है. यदि किसी बीएसएफ के जवान को या किसी गौसेवी को गौ तस्कर पीट-पीटकर मार डालते हैं तो यह कानून-व्यवस्था का मामला होता है, दूसरे मामले में यही घटना मानवाधिकार का विषय बन जाती है. शब्दों की ओछी राजनीति करते हुए लिंचिंग पर कठोर कानून बनाने की मांग की जाती है. ये सहज बोध( कॉमन सेंस) की बात है, कि दुनिया का कोई भी कानून व्यक्ति पर लागू होता है, भीड़ पर नहीं. और व्यक्तियों के लिए पर्याप्त कानून हैं.
ये ‘लक्षण’ तो आपके हैं.....
महुआ मोइत्रा ने फासीवाद का तीसरा लक्षण बतलाया 'लोगों को इकट्ठा करने के लिए किसी शत्रु का भय पैदा करना' वास्तव में फासीवादियों और नाजियों ने यही किया था. पाकिस्तान में इस्लाम के नाम पर यही किया जाता है, जब यहूदियों, हिंदुओं, अहमदियों के खिलाफ आग उगली जाती है. महुआ मोइत्रा जवाब दें. लोकसभा चुनाव के बाद उनकी नेता ममता बनर्जी ने मुस्लिमों की विशाल सभा को संबोधित करते हुए उनसे नारे लगवाए "जो हमसे टकराएगा चूर-चूर हो जाएगा." क्या यह समुदाय विशेष के अंदर किसी काल्पनिक शत्रु का भय पैदा करने का प्रयास नहीं है? ममता बनर्जी के साथ कदमताल कर रहे राहुल गांधी वायनाड में जाकर बोलते हैं कि ‘मोदी दक्षिण भारत के राज्यों के साथ अन्याय करते हैं.’ और इस प्रकार दक्षिण भारत में कुछ राजनैतिक दलों द्वारा की जाने वाली अलगाववाद की राजनीति को भड़काते हैं. देश के एक हिस्से को दूसरे हिस्से के खिलाफ खड़ा करते हैं. क्या यही वह तीसरा लक्षण नहीं है, जिसके बारे में वह बात कर रही हैं ?
चौथी बात कहीं गई मीडिया पर नियंत्रण. मीडिया और उसमें आ रहे परिवर्तन के बारे में इस लेख के प्रारंभ में विस्तार से बात की गई है. मीडिया पर दशकों से किसका नियंत्रण रहा है यह बताने की आवश्यकता नहीं है.
कौन है उन्मादी ?..
पांचवी बात कही गई कि राष्ट्रीय सुरक्षा का उन्माद जगाया जा रहा है. देश में एक ऐसा वर्ग है जो पाकिस्तान की करतूतों की आलोचना कर को भी नफरत फैलाना और उन्माद जगाना कहता है. महुआ मोईत्रा और शबाना आज़मी बतलाएं कि बालाकोट में की गई वायु सेना की कार्यवाई अथवा पहली सर्जिकल स्ट्राइक देश की सुरक्षा आवश्यकता थी या उन्माद? ममता सेना की नियमित ड्रिल को अपना तख्तापलट ने की साजिश कहकर कौन सा उन्माद जगाने का प्रयास कर रही थीं?
छठी बात कही गई सरकार और मजहब का घालमेल| ममता बनर्जी समेत खुद को सेकुलर कहने वाली कई सरकारें इमामों को भत्ता देती हैं. ममता मंच पर फातिहा पढ़ती हैं, लेकिन दुर्गा पूजा पर रोक लगाती हैं और हाई कोर्ट से फटकार खाती हैं. देश में दशकों तक सरकारी पैसे से रोजा अफ्तार करवाया जाता रहा. हज सब्सिडी दी जाती रही, जिसे मोदी सरकार ने समाप्त किया. तो सरकार और मजहब का घालमेल कौन करता आया है?
खुलकर बताएं .....
फिर कहा गया सातवां और आठवां लक्षण - उद्योगों के अधिकार सुरक्षित करना व श्रमिकोंके अधिकारों का दमन करना . मोइत्रा और उनके समर्थकों को खुलकर बतलाना चाहिए कि कौन से ऐसे नए अधिकार हैं जो उद्योगपतियों को दिए गए और श्रमिकों के कौन से ऐसे अधिकार थे, जो छीन लिए गए. श्रमिकों को दी जा रही अटल पेंशन योजना और सभी विपन्न देशवासियों की तरह 5 लाख रुपए का स्वास्थ्य बीमा, प्रधानमंत्री आवास योजना आदि क्या उद्योगपतियों को दी जा रही सुविधाएं हैं? दशकों तक देश की अर्थव्यवस्था को बीमार बनाए रखने वाले अधकचरा वामपंथी सिद्धांतों में लिथड़े ये बयान कालबाह्य हो चुके हैं, इसे कुछ लोग नहीं समझ पा रहे हैं.
इस ‘रचनाधर्मिता’ पर गौर करें....
अगले कुछ इल्जाम हैं ' बुद्धिजीवियों' और कला का तिरस्कार ,अपराध और उसकी सजा को लेकर उन्माद जगाना तथा पक्षपात और भ्रष्टाचार पहले बात बुद्धिजीवियों और
कलाकारों की. स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार सिनेमा और कला जगत का एक बड़ा हिस्सा खुलकर राष्ट्रीय विचारों के समर्थन में आगे आ रहा है. देश की संस्कृति पर गर्व कर रहा है. यही बात उन लोगों को खटक रही है, जिन्हें कला साहित्य और सिनेमा में 'लाल सलाम' देखने और सुनने की आदत रही है. जिन्होंने इसका फायदा उठाकर खूब चांदी काटी है. जब साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाए जा रहे थे तब कई साहित्यकारों की 'रचनाएं' देखने का अवसर मिला.
साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने वाले उदय प्रकाश की एक कविता का नमूना देखिए-
एक था रंगा
एक था बिल्ला
दोनों भाई-भाई नहीं थे,
लेकिन दोनों को फांसी हो गई।
एक थे टाटा,
एक है बिरला
दोनों भाई-भाई हैं,
लेकिन दोनों को फांसी नहीं
हुई।
कविता के स्तर पर बाद में चर्चा की जा सकती है, फिलहाल कवि की सोच पर ध्यान दें। श्रीमान उदयप्रकाश दो देशभक्त महान उद्योगपतियों की तुलना दुर्दांत हत्यारों रंगा और बिल्ला से कर रहे हैं। उद्योगपतियों के प्रति परंपरागत कम्युनिस्ट घृणा की सड़ांध में लिपटी ये पंक्तियां इन साहित्य अकादमी पुरस्कार 'विजेता' की राजनैतिक प्रतिबद्धता की पोल खोल रही हैं।
प्रधानमंत्री मोदी पर खुलकर हमला करने वाले मोदी सरकार से नाखुश होकर ' साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने वाले शायर मुनव्वर राणा ने कांग्रेस की पूर्व अध्यक्षा सोनिया गांधी पर कुछ पंक्तियां लिखी थीं , उनमें से कुछ पंक्तियां -
"अब ये तकदीर तो बदली भी
नहीं जा सकती,
मैं वो बेवा हूँ जो इटली भी
नहीं जा सकती। ...........
राणा आगे लिखते हैं-
" मैं तो भारत में मोहब्बत के
लिए आई थी,
कौन कहता है कि हुकूमत के
लिए आई थी।
सब मेरे बाग़ के बुलबुल की
तरह लगते हैं,
सारे बच्चे मुझे राहुल की
तरह लगते हैं। "
और ,.....
" कोख में रखकर ये मिट्टी इसे
धनवान किया,
मैंने प्रियंका और राहुल को
भी इंसान किया। "
अब ये साहित्यकार नाखुश हैं, तो कारण समझा जा सकता है. नाखुश हैं तो कुछ न कुछ कहेंगे लेकिन आपत्तियां व्यक्तिगत हितों के लिए सारे देश को ‘असहिष्णु’ या लिंचिस्तान’ कहने पर दर्ज हो रही हैं. भावनाएं दूसरों की भी हैं... मृत कन्नड़ लेखक एमएम कलबुर्गी की हत्या पर खूब सियासत हुई थी. आज भी हो रही है. किसी भी लेखक या सामान्य व्यक्ति की ह्त्या अनुचित है। करने वाले को क़ानून के अनुसार दंड मिलना चाहिए। लेकिन मृत कन्नड़ लेखक एमएम कलबुर्गी ने किस प्रकार हिन्दू भावनाओं का निरादर किया, उसका सिरे से चर्चा से गायब होना पत्रकारों और बुद्धिजीवियों की नीयत पर प्रश्न तो खड़े करेगा ही। जून 2014 में बंगलुरु में 'अंधविश्वास विरोधी बिल ' पर आयोजित सेमीनार में कलबुर्गी ने स्वयं के द्वारा शिवलिंग पर पेशाब किये जाने का बखान किया था। क्या इससे समाज में तनाव और आक्रोश नहीं भड़का होगा? भारत में तथाकथित सेकुलर राजनीति के ढंग यह रहे हैं कि सलमान रश्दी की किताब शैतानी आयतें को आनन-फानन में प्रतिबंधित कर दिया जाता है, लेकिन विश्वविद्यालयों में हिंदुओं के आराध्य राम सीता हनुमान कृष्ण आदि पर अत्यंत आपत्तिजनक और अश्लील काल्पनिक साहित्य पढ़ाया जाता है, एवं उसका विरोध होने पर विरोध को असहिष्णुता कहा जाता है.
सहन करना सीखें इन सवालों को....
सरकार की तथ्यों के आधार पर आलोचना अवश्य होनी चाहिए. परंतु बेबुनियाद बातें करके देश और समाज की प्रतिष्ठा को धूमिल करना कौन सी बुद्धिजीविता है ? आप इस बात को कैसे नज़रंदाज़ कर सकते हैं कि वर्तमान सरकार देश की पहली केंद्र सरकार है जिस पर भ्रष्टाचार का एक भी दाग नहीं है? क्या यह प्रत्येक भारतवासी के संतोष का विषय नहीं होना चाहिए?
लोकतांत्रिक मूल्यों के नाम पर दशकों से चले आ रहे अलोकतांत्रिक रिवाजों का बचाव करना और देश विरोधी- समाज विरोधी तत्वों को बौद्धिक ओट देना, इस पर नया भारत प्रश्न खड़े कर रहा है. दशकों तक जिनके वाक्यों को ब्रह्म वाक्य और जिनकी बुद्धि जीविता को अंतिम सत्य बनाकर प्रस्तुत किया जाता रहा है, उन्हें यह सवाल सहन नहीं हो रहे हैं. वो विमर्श खड़ा करना चाहते हैं, लेकिन कोई तथ्य पेश नहीं करना चाहते. काल्पनिक बातों के तथ्य पेश किए भी कैसे जा सकते हैं. भ्रमित बुद्धिजीविता और जानते बूझते देश को भ्रमित करने का प्रयास कर रहे अवॉर्ड वापसी गिरोह की यही मजबूरी है.