बंटा मानस, कराहते हिन्दू
   दिनांक 12-अगस्त-2019

 
  पुस्तक का नाम : वे पंद्रह दिन
लेखक : प्रशांत पोल
प्रकाशक : प्रभात पेपरबैक्स
4/19 आसफ अली रोड
नई दिल्ली-110002
दूरभाष : 011-23289777
पृष्ठ : 183
मूल्य : रु. 200/-
 
अखंड हिन्दुस्थान की खंडित स्वतंत्रता जब देश की दहलीज पर खड़ी थी, उस समय देश की पूर्वी और पश्चिमी सीमाओं पर प्रचंड नरसंहार चल रहा था। आजादी के सपने देखने वाले करोड़ों भारतीयों ने शायद ही कभी सोचा होगा कि आजाद होने के क्रम में उन्हें ये दिन देखने होंगे। 1 अगस्त, 1947 से लेकर 15 अगस्त 1947 के बीच ऐसी घटनाएं घटीं, जिनके कारण उनके सपने तो छोड़िए, उनकी पूरी जिंदगी तहस-नहस हो गई। इस तरह, एक आजाद देश की ख्वाहिश खंडित देश के रूप में सामने आई।
विभाजन की इस प्रक्रिया में पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान से लेकर बंगाल तक होने वाली एकतरफा हिंसा ने 10 लाख से अधिक हिन्दुओं की जान ले ली और डेढ़ करोड़ से ज्यादा लोग बेघर हो गए। वैसे तो कई लेखकों और इतिहासकारों ने इस त्रासदी को कलमबद्ध किया है, लेकिन ‘वे पंद्रह दिन’ पुस्तक में लेखक प्रशांत पोल ने जिस वस्तुनिष्ठता और व्यापकता के साथ उन 15 दिनों की घटनाओं व लोगों के मानस पर पड़ने वाले उनके असर को समेटा है, उसे भारतीय इतिहास के उथल-पुथल भरे दिनों की सबसे अच्छी तस्वीर कही जा सकती है। वे पंद्रह दिन देश के लिए सबसे महत्वपूर्ण थे, क्योंकि 650 से अधिक देसी रियासतें भारत में रहेंगी या पाकिस्तान के साथ जाएंगी, ऐसे अधिकांश बड़े फैसले इसी दौरान लिए गए। यह ऐसा समय था जब देश के भावी कर्णधार क्या कर रहे थे, उनकी कथनी और करनी कोई अंतर था? अगर था तो वह कैसा था? संदर्भों में बिना काट-छांट किए ऐसे प्रश्नों की ऊहापोह इस पुस्तक में शामिल किया गया है।
इन फैसलों के कारण देवी ढाकेश्वरी अब हमारी नहीं रहीं, बारीसाल के काली मंदिर में दर्शन करना और दुर्गा सरोवर में स्नान अब संभव नहीं रहा, गुरु नानक की जन्म स्थली ननकाना साहिब अब हमारे देश का हिस्सा नहीं रहा, पवित्र गुरुद्वारा पंजा साहिब हमसे दूर हो गया, मां हिंगलाज देवी के दर्शन भी हमारे लिए संभव नहीं। पुस्तक में यह बताया गया है कि उन 15 दिनों में माउंटबेटन के कहने पर स्वतंत्र भारत में यूनियन जैक फहराने के लिए नेहरूर किस तरह तैयार दिखे, गांधी जी को कहते हुए सुना गया कि  ‘अगर लाहौर मर रहा है तो आप भी उसके साथ मौत का सामना करो।’ इन सबके बीच सिंध प्रांत के हैदराबाद में रा.स्व.संघ के तत्कालीन सरसंघचालक श्री गुरुजी हिन्दुओं को संगठित होकर आततायियों से मुकाबला करने के लिए प्रेरित करते हुए दिखे। ये वे दिन थे, जब कराची समेत सिंध प्रांत के अधिकांश शहर, जो हिन्दू बहुल थे और व्यापार व अर्थव्यवस्था पर उनका दबदबा था, मुस्लिम लीग की आतंकी इकाई मुस्लिम नेशनल गार्ड के गुडों के हाथों मारे जा रहे थे। हिन्दू महिलाएं इनकी हवस का शिकार हो रही थीं। उस बेहद तनावपूर्ण माहौल में जान की परवाह किए बिना श्री गुरुजी हैदराबाद, कराची समेत अन्य स्थानों पर हजारों स्वयंसेवकों के साथ हिन्दुओं में आत्मविश्वास का संचार कर रहे थे,ताकि वे आततायियों का सामना कर सकें।
पुस्तक में बताया है कि स्वतंत्र भारत का प्रथम प्रधानमंत्री बनने जा रहे जवाहरलाल नेहरू इस तैयारी में लगे हुए थे कि मंत्रिमंडल का गठन किस तरह होगा, शपथ ग्रहण समारोह की तैयारी कैसे हो और उसके लिए उन्हें कौन सी पोशाक पहननी है। उन्हें लुट रहे लाखों हिन्दुओं की चिंता कतई नहीं थी।
इस दौरान गांधी भी लाहौर से बंगाल तक की यात्रा कर रहे थे। वे बलूचिस्तान से लेकर पंजाब व बंगाल तक हिन्दुओं को अपनी जगह न छोड़ने व मुसलमानों के साथ भाईचारा बनाए रखने की सीख दे रहे थे। 1946 में गांधी जी ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ के उस खलनायक सुहरावर्दी के साथ कोलकाता में बैठकें कर रहे थे, जिसने 5 हजार हिन्दुओं की हत्या कराई थी। अगर तत्कालीन नेताओं ने डॉ. भीमराव आंबेडकर की बात मान ली होती तो शायद 10 लाख से अधिक हिन्दू नहीं मारे जाते और दंगे-फसाद का दौर नहीं चलता। आंबेडकर ने विभाजन की प्रक्रिया में जनसंख्या की पूर्ण अदला-बदली की योजना दी थी, जिसे, खासकर नेहरू ने ठुकरा दिया था। नेहरू और गांधी इस बात को लेकर आश्वस्त थे कि मुस्लिम लीग को पाकिस्तान चाहिए था, जो उसे मिल गया। फिर वे क्यों हिन्दुओं को तकलीफ देंगे। हद तो तब हो गई जब 5 अगस्त, 1947 को लाहौर यात्रा के क्रम में ‘वाह’ शिविर के पास रुके गांधी ने सबकुछ लुटाकर शिविर में शरण लेने वाले हजारों बेसब्र हिन्दुओं को एक बार फिर वे यही समझाने की कोशिश की कि उन्हें कुछ नहीं होगा, क्योंकि ‘जिन्ना ने पाकिस्तान की असेंबली में यह आश्वासन दिया है’।
तभी तो 10 अगस्त, 1947 को हिन्दू महासभा के वीर सावरकर ने दिल्ली में आयोजित अखिल भारतीय हिन्दू महासभा की बैठक में नेहरू द्वारा खून-खराबे को टालने के लिए पाकिस्तान के निर्माण के तर्क को फर्जी बताया था। लेकिन नेहरू की जिद के कारण खान अब्दुल गफ्फार के नेतृत्व वाला नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस भी भारत ने गंवा दिया, जबकि आखिर तक खान भारत के साथ विलय के पक्ष में थे और वहां कांग्रेस की सरकार थी। नियम और शर्तें तय थीं कि जहां कहीं भी कांग्रेस की सरकार है, वह राज्य भारत में रहेगा और जहां मुस्लिम लीग की सरकार है, वह पाकिस्तान में जाएगा। लेकिन खून-खराबे की वजह से नेहरू ने खान की बातों को अहमियत नहीं दी और मुस्लिम लीग की मांग स्वीकार कर ली। यही कारण है कि खान ने खुलेआम कहा था कि नेहरू और गांधी ने उन्हें धोखा दिया। 3 जून को भारत का विभाजन स्वीकार करने वाले कांग्रेस के नेताओं ने वर्षों से नेहरू और गांधी की नीतियों की हिमायत करने वाले खान और उनके समर्थकों की एक नहीं सुनी।
गांधी भारत-पाकिस्तान का पितृ पुरुष कहलाने का आदर्श लेकर चल रहे थे, हालांकि उन्हें यह मालूम नहीं था कि पाकिस्तान मांगने वाले उन्हें हिन्दू नेता ही मानते थे। उनसे द्वेष करते थे। यही कारण है पाकिस्तान में गांधी जी का रत्तीभर भी सम्मान नहीं है। जिस शेख अब्दुल्ला को कश्मीर विरोधी कारस्तानी के कारण 15 मई, 1946 को जेल में डाला गया था, उसे आजाद कराने के लिए 3 अगस्त, 1947 को गांधी कश्मीर जाते हैं। साफ तौर पर यह सब नेहरू की सलाह पर हो रहा था, क्योंकि अब्दुल्ला नेहरू के परम मित्र थे। इस यात्रा के दौरान गांधी कश्मीर के महाराजा हरिसिंह से भी मिले। गांधी की इस यात्रा का उद्देश्य साफ था, हालांकि इसकी भनक महाराजा हरि सिंह को नहीं थी। कश्मीर रियासत के दीवान रामचंद्र काक को नेहरू सिर्फ इसलिए नापसंद करते थे, क्योंकि एक बार निषेधाज्ञा नहीं मानने पर उन्होंने नेहरू को जेल में डाल दिया था। इस बैठक का यह नतीजा निकला कि पहले तो काक की छुट्टी हो गई और फिर बाद में
शेख अब्दुल्ला को जेल से बाहर कर दिया गया।
5 अगस्त, 2019 को जिस अनुच्छेद 370 को केंद्र की वर्तमान मोदी सरकार ने खत्म किया है, उसके बारे में अब्दुल्ला को लिखे पत्र में आंबेडकर ने कहा था कि आप चाहते हैं कि भारत जम्मू-कश्मीर सीमा की रक्षा करे, यहां सड़कों का निर्माण करे, अनाज आपूर्ति करे, कश्मीर को भारत के समान अधिकार मिले, लेकिन आप यह भी चाहते हैं कि कश्मीर में भारत को सीमित शक्तियां मिलें। ऐसा प्रस्ताव भारत के साथ विश्वासघात होगा, जिसे कानून मंत्री होने के नाते मैं कतई स्वीकार नहीं करूंगा’। लेकिन नेहरू ने अब्दुल्ला के साथ दोस्ती निभाते हुए उनकी ये बातें भी मान ली थीं। नेहरू ने पटेल को सूचित किए बिना ही शेख अब्दुल्ला के साथ अनुच्छेद 370 के मसौदे को अंतिम रूप दिया। आंबेडकर के विरोध के कारण ही संविधान सभा की चर्चा में इस मसौदे को पारित करवाने की जिम्मेदारी गोपाल स्वामी अयंगर को मिली।अफसोस कि इतिहास लेखन में ‘पॉलीटिकल करेक्टनेस’ और छद्म पंथनिरपेक्षता के कारण सही तथ्य सामने नहीं आ पाते हैं। ऐसे में रोचक लेखन शैली, बिना अतिरेक विभाजन के कालखंड के नेताओं के मूल्यांकन के साथ दुर्लभ चित्रों के संग्रह ने इस पुस्तक के महत्व को और बढ़ा दिया है। —उमानाथ सिंह