दक्षिणी भारत के वो स्वतंत्रता सेनानी जिनका नाम शायद ही जानते होंगे आप
   दिनांक 13-अगस्त-2019
आजादी से पहले शेष भारत की तरह दक्षिण भारत भी स्वातंत्र्य संग्राम की उत्कट भावना से भरा था। घर-घर से आजादी के मतवाले अंग्रेजों या आततायी शासन के विरुद्ध लोहा लेने को निकल रहे थे। ऐसे में उन्हें सशक्त नेतृत्व देने वाले अनेक नेता हुए। उनमें से ऐसे कई व्यक्तित्व हैं जिनके योगदान के बारे में लोग न के बराबर जानते हैं, लेकिन उनका जीवन स्वतंत्रता संग्राम में एक आदर्श बन गया
तमिलनाडु

सुब्रमण्य शिवा (4 अक्तूबर 1884-23 जुलाई1925) अनूठे स्वतंत्रता सेनानी और लेखक थे। ब्रिटिश साम्राज्य विरोधी गतिविधियों के कारण 1908 से 1922 के बीच उन्हें कई बार गिरफ्तार किया गया। सजा के दौरान जेल में उन्हें कुष्ठ रोग हो गया था और उसी से 1925 में उनकी मृत्यु हुई। उनका जन्म तत्कालीन मद्रास प्रांत के डिंडिगुल जिले में वतालागुंडु निवासी राजम अय्यर के परिवार में हुआ था। उनके आरंभिक जीवन के बारे में जितनी जानकारी उपलब्ध है, उसके अनुसार उन्होंने अपने विवाह के उपरांत राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेना शुरू कर दिया था।
शिवा उग्र क्रांतिकारी थे। उन्होंने वी.ओ. चिदम्बरम पिल्लै तथा सुब्रमण्य भारती के साथ काम करते हुए युवाओं को स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के लिए प्रेरित किया था। उन्हें संस्कृत से प्रेम था और उसका काफी अच्छा ज्ञान था। वह पूरे भारत को अपनी जननी मानते थे, इसीलिए उन्होंने पप्पारापट्टी में भारत माता मंदिर बनाने का प्रयास किया था, दुर्भाग्य से वह कार्य पूरा नहीं हो सका।
स्वतंत्रता संग्राम में उलझे रहने के बावजूद वह तमिल भाषा के उत्थान के लिए सक्रिय रहे। उनकी यह तीव्र कामना ािी कि सभी लोग अपनी मातृभाषा से प्रेम करें। इसीलिए उन्होंने लिखा, ‘किसी देश का जीवन उसकी भाषा में ही होता है। अपनी मातृभाषा का त्याग करने वालों के लिए कहा जा सकता है कि वे अपनी मूर्खता या पागलपन के कारण आत्महत्या कर रहे हैं। यदि आत्महत्या करना राज्य के विरुद्ध अपराध है, तो अपने राज्य की भाषा की उपेक्षा करते हुए स्वयं अपनी और अपने समाज की हत्या करना शुरू करने वाला व्यक्ति हजार गुना गंभीर अपराधी है।’ उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्यवादी सरकार और अंग्रेजी भाषा के आधिपत्य को कभी अलग नहीं माना। वह ब्रिटिश सरकार को उसकी भाषा के साथ देश से बाहर करना चाहते थे; ऐसी दृढ़ कामना के साथ ही वह गंभीरता से इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सक्रिय भी रहते थे।
शिवा मद्रास प्रेसिडेंसी के पहले राजनीतिक कैदी थे। जेल के अपने अनुभवों को उन्होंने ‘जेल लाइफ’ नामक छोटी सी पुस्तक में सहेजा है। स्वतंत्रता आंदोलन ने उन्हें वक्ता बनाया तो जेल जीवन ने उन्हें लेखक बना दिया था। उनकी कविताओं का संग्रह ‘ज्ञान भानु’ भी प्रकाशित हुआ था। वह स्वामी विवेकानंद और श्री रामकृष्ण परमहंस के प्रशंसक थे। 1908 में जब वह जेल में थे तब उन्हें कुष्ठ रोग हो गया था और इसके परिणामस्वरूप उन्हें सालेम जेल भेजने का आदेश दिया गया। उस समय कुष्ठ रोग को छूत का रोग समझा जाता था इसलिए ब्रिटिश अधिकारियों ने उनके रेल से जाने पर पाबंदी लगाते हुए उन्हें पूरे शरीर पर घावों के बावजूद पूरा मद्र्रास राज्य पैदल पार करते हुए सालेम जेल जाने को मजबूर किया। इतनी भयंकर पीड़ा सहने के बाद भी वह स्वतंत्रता के लिए संघर्षशील रहे और अनेक बार कैदी जीवन का कष्ट उठाया। अंतत:, इस रोग के कारण 23 जुलाई 1925 को उनका प्राणांत हो गया।
वी.ओ. चिदम्बरम पिल्लै को ‘कप्पालोत्तिय तमिलन’ (नौका चलाने वाला तमिल) कहा जाता था क्योंकि वह किसी भारतीय नौका का संचालन करने वाले पहले भारतीय थे। अंग्रेजों द्वारा जेल में कठोर यातनाएं दिए जाने के बाद भी उनके देशप्रेम के भावों में रत्ती भर फर्क नहीं पड़ा था। जेल में उन्हें जूट बनाने की मशीन चलाने जैसा कठोर श्रम करना होता था जिससे उनके हाथ रगड़ से छिल गए थे, घावों से खून बहता था। ऐसे में जेलर उनके ऊपर दया करने के बजाय उन्हें तेल के कोल्हू में बैल की जगह लगा देता था कि वह चक्कर लगाते हुए तेल निकालें। स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने वाले भारतीयों को दी जाने वाली यह क्रूरतम सजा थी। कहते हैं कि वी.ओ. चिदम्बरम कोल्हू से तेल निकालने के कठिन और हाड़तोड़ काम को भारत माता मंदिर की परिक्रमा करने जैसा मानते हुए बेहिचक करते थे। अमानवीय कष्ट सहने के बावजूद दृढ़ निश्चयी चिदम्बरम ने अपने उर्वर तथा कल्पनाशील मस्तिष्क का उपयोग करते हुए अपनी प्रिय भाषा तमिल में कई पुस्तकों का सृजन किया।

वी.ओ. चिदम्बरम पिल्लै का जन्म 5 सितंबर, 1872 को तूतीकोरिन जिले के ओट्टापिदारम नामक स्थान पर हुआ था। उनके पिता का नाम ओलगानाथन पिल्लै और माता का नाम परामाई अम्मल था। उन्होंने बचपन में अपनी दादी से भगवान शिव तथा बाबा से रामायण की कहानियां सुनी थीं। अधिवक्ता बन जाने के कुछ ही समय बाद उन्होंने यह पेशा छोड़ दिया और स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ गए। 1892 में चिदम्बरम पर तिलक महाराज का प्रभाव पड़ा और वह उनके शिष्य हो गए। सुब्रमण्य शिवा और सुब्रमण्य भारती के साथ वह मद्र्रास प्रेसिडेंसी में स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी योद्धाओं में गिने जाते थे।
समुद्री परिवहन के व्यवसाय में ब्रिटिश भारत की स्टीम नेविगेशन कम्पनी के एकाधिकार को देखते हुए चिदम्बरम ने एक समुद्री नौवहन कम्पनी की स्थापना की। यह किसी भारतीय द्वारा प्रारंभ की गई पहली नौवहन कम्पनी थी। स्वदेशी नौवहन कम्पनी के पास स्वदेशी जलयान होने की आवश्यकता को देखते हुए चिदम्बरम ने कम्पनी के अंश बेचकर पूंजी जुटाने के लिए पूरे देश का दौरा किया। उन्हें ब्रिटिश नौवहन कम्पनी से कड़ी प्रतियोगिता करनी पड़ रही थी। लेकिन दु:ख की बात यह रही कि जब वे जेल से छूटे तब तक उनकी स्वदेशी स्टीम नेविगेशन कम्पनी का समापन हो चुका था और उसके जलपोतों को नीलामी में प्रतिद्वंद्वी कम्पनी को दिया जा चुका था। कम्पनी का पहला जलपोत एस.एस. गैलिया ब्रिटिश शिपिंग कम्पनी को बेचा गया था।
अदालत ने उन्हें दो आजीवन कारावास ( कुल 40 वर्ष) की सजा सुनाई थी। अरविंदो घोष ने अपने पत्र बंदे मातरम में वी.ओ. चिदम्बरम की प्रशंसा करते हुए लिखा: ‘शाबाश, चिदम्बरम!... जब कोई राजनीतिक नेता अपने साथियों के लिए कष्ट उठाने को तैयार होता है, जब कोई प्रसिद्ध और लोकप्रिय व्यक्ति अपने मित्रों और सहकर्मियों को छोड़ कर आगे बढ़ जाने की बजाए उनके लिए जेल में रहने को तैयार होता है तो यह इस बात का लक्षण है कि भारत में राजनीतिक जीवन यथार्थ में बदल रहा है।... मद्र्रास को इस बात का सारा श्रेय है कि ऐसा व्यक्ति वहां जन्मा।’
वी. ओ. चिदम्बरम की महानता इस बात में भी है कि जो भी उनके सम्पर्क में आया, उसे उन्होंने राष्ट्रभक्त में बदल दिया। उन्होंने सैकड़ों लोगों को प्रेरित किया था; खास तौर पर बेहद आम लोगों को, छोटे-मोटे काम करने वाले लोगों को। एक उदाहरण ऐसा भी था कि उनसे अत्यंत प्रभावित होकर उनके नाई ने अपने बेटे का नाम ‘वंदे’ और बेटी का नाम ‘मातरम’ रख दिया। वह अपने पास आने वालों से अपने बच्चों के नाम लेने को कहता जिससे स्वत: ‘वंदे मातरम’ का उच्चारण हो जाता था।

तेलंगाना/आंध्र प्रदेश

कोमारम भीम का जन्म तेलंगाना क्षेत्र के आदिलाबाद जिले में एक गोंड परिवार में हुआ था। हैदराबाद में निजाम का शासनकाल ऐसा समय था जब वहां की हिंदू आबादी को निजामशाही की कठोरता का कष्ट भोगना पड़ता था। निजाम लोगों पर अकथनीय अत्याचार करते थे। लोगों पर बहुत अधिक कर लादे जाते थे, उनकी स्त्रियों का अपमान होता था और पुरुषों का अकारण उत्पीड़न किया जाता था। लोगों का हर तरह से शोषण ही वहां का जीवनक्रम था। तेलंगाना क्षेत्र में जिलों के नाम भी बदल दिए गए थे।
अपनी किशोरावस्था में कोमारम भीम ने इन अन्यायपूर्ण प्रथाओं को देखा था। इन्हें देखकर उनका हृदय लोगों के प्रति द्रवित हो जाता था और भीतर विद्र्रोह की आग सुलगने लगी थी। अन्य वनवासी नेताओं के बलिदानों की कहानियों और मातृभूमि के लिए आत्मोत्सर्ग करने वाले शहीद भगत सिंह की कहानियों ने कोमारम को बहुत प्रेरित किया था। इन कहानियों से उन्हें अपने भीतर के विद्रोही को जगाने की प्रेरणा मिली। उन्होंने जल, जंगल, जमीन का नारा दिया जिसका आशय यह था कि जंगलों में रहने वालों को जंगल के संसाधनों पर पूरा अधिकार मिलना चाहिए।
प्रतिबद्धता तथा अपने लोगों को न्याय दिलाने की उत्कट इच्छा ही कोमारम के संघर्ष में उनका मुख्य हथियार थी। अपनी पृष्ठभूमि के कारण उनके लिए आधुनिक हथियार जुटाना कठिन था। तथापि, अत्यंत दृढ़ निश्चय के साथ वह निजाम के शासन के अंत के लिए आगे बढ़े। उनकी कार्रवाइयों से स्थानीक तालुकेदार अब्दुल सत्तार को बहुत कठिनाई हुई। घबराये और हार से भयभीत अब्दुल सत्तार ने कोमारम के विरुद्ध पुलिस से सहायता मांगी। 1940 में शस्त्रों से सुसज्जित 90 पुलिसकर्मियों ने कोमारम के ठिकाने पर धावा बोला। बंदूकों, भालों, गोफन, धनुष-तीर और तलवारों जैसे साधारण हथियारों के साथ भी कोमारम और उनके साथी योद्धाओं ने इतनी बहादुरी से भीषण रण किया कि वह इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया। लेकिन, कोमारम को इस युद्ध में घातक चोटें आईं और उससे उनकी मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु आज भी ऐसे शहीद के अवसान के रूप में याद की जाती है जिसने निजामशाही के अन्याय के खिलाफ तथा अपने लोगों को अन्याय से मुक्ति दिलाने के लिए किए युद्ध में आत्मोत्सर्ग किया। उनकी बहादुरी तथा शौर्य ने उन्हें भगवान जैसा दर्जा दिलाया। आज भी बहुत से परिवारों में उनकी पूजा होती है।

स्वतंत्रता संग्राम के दौरान वर्ष 1927 ऐसा भ्रामक समय था जब ब्रिटिश भारत के तत्कालीन कानूनों में सुधारों के बारे में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेताओं के साथ विचार-विमर्श करने के उद्देश्य से साइमन कमीशन भारत आया था। जब कमीशन मद्र्रास पहुंचा तो वहां उसे विरोध कर रही भीड़ के ‘साइमन कमीशन वापस जाओ’ के नारों का सामना करना पड़ा। शहर के प्रमुख केंद्र्र पैरी कॉर्नर में प्रदर्शनकारियों पर पुलिस ने अंधाधुंध गोलियां चलार्इं और एक युवा कार्यकर्ता की मौके पर ही मौत हो गई। जुलूस का नेतृत्व कर रहे नेताओं ने इस पर वहां तैनात पुलिस अधिकारी से कहा कि वह उन्हें मारे गए साथी की पहचान करने दें। लेकिन, उस अधिकारी ने नेताओं की ओर बंदूक तानते हुए उन्हें गंभीर परिणामों की धमकी दी तो किसी ने भी शव के पास जाने की हिम्मत नहीं की।
उसी समय उन नेताओं में से एक ने आगे बढ़कर अपने कोट के बटन खोले और राइफलमैन को अपना सीना दिखाते हुए तेज स्वर में ललकारा, ‘‘मुझे गोली मारो’’। इस पर घातक परिणामों से डरे पुलिस अधिकारी ने रिवॉल्वर वापस रख ली। इसी दौरान भीड़ में से आवाजें आने लगीं, भीड़ ने जोर से चिल्लाकर कहा ‘आंध्र केसरी की जय’। वह बहादुर व्यक्ति थे तंगुतुरी प्रकाशम पांटुलु, जिन्हें तब से लोग श्रद्धावश ‘आंध्र केसरी’ कहने लगे।
प्रकाशम का जन्म 23 अगस्त, 1872 को तत्कालीन गुंटूर जिले के कनपार्टी गांव में गोपालकृष्णैया और सुब्बाम्माया के पहले बेटे के रूप में हुआ था। कम ही उम्र में उनके पिता का निधन हो गया। मां ने गरीबी में बड़ी कठिनाई से उनका पालन-पोषण किया। बड़े होने पर उनका दाखिला मिडिल स्कूल में हुआ जहां उन्होंने इम्मानेनी हनुमंतराव नायडू का शिष्यत्व ग्रहण किया। बहुत से अध्यापकों से अलग इम्मानेनी ने प्रकाशम को पिता जैसा प्रेम दिया और तरह-तरह से मदद की ताकि उस अत्यंत ऊजार्वान युवा की क्षमताओं को रचनात्मक दिशा में मोड़ा जा सके। आगे चलकर नायडू प्रकाशम को लेकर राजमुंदरी चले गए, जहां बालक ने मैट्रिक की परीक्षा दी। इसी दौरान उनकी मंचीय प्रतिभा भी सामने आई जब उन्होंने नायडू के साथ नाटकों में महिला भूमिकाएं निभानी शुरू कीं। प्रकाशम ने 1890 में हनुमायम्मा से शादी की।
आगे चल कर उन्होंने कला संवर्ग से एफ.ए. (इंटरमीडिएट) परीक्षा उत्तीर्ण की और बाद में मद्र्रास से कानून की डिग्री ली। उन्होंने 1894 में राजमुंदरी में अधिवक्ता के रूप में काम शुरू करते हुए जल्द ही खुद को प्रमुख अधिवक्ता के रूप में स्थापित कर लिया और शहर का गौरव बन गए। उन्हें 1901 में नगरपालिका अध्यक्ष चुना गया। तत्पश्चात, प्रकाशम बैरिस्टर की अर्हता प्राप्त करने के लिए लंदन गए। वहां से लौट कर 1907 में वह मद्रास चले गए और वहां प्रतिष्ठा अर्जित की। गांधी जी के आह्वान पर 1921 में उन्होंने वकालत छोड़ दी और एक अंग्रेजी दैनिक ‘स्वराज्य’ शुरू किया जो न केवल प्रकाशम का मुखपत्र बना, बल्कि दक्षिण भारत के देशभक्तों के लिए लड़ाई का हथियार भी बन गया। उस जमाने में इसकी प्रसार संख्या 20,000 थी। चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने गांधीजी को बताया था कि किस तरह प्रकाशम का शुरू किया अंग्रेजी दैनिक सबसे लोकप्रिय समाचार-पत्र के रूप में दक्षिण के अंग्रेजी जानने वाले लोगों में उनकी छवि और प्रभाव को बढ़ा रहा था। इस पत्र को ब्रिटिश सरकार के क्रोध का शिकार बनना पड़ा था।
जब उन्होंने 1930 में नमक सत्याग्रह में भाग लिया, तो उन्हें कैद कर वेल्लोर जेल में डाल दिया गया था। वहां सी. आर. कासिनाधुनी, नागेश्वर राव, पट्टाभि, एस. सत्यमूर्ति और अय्यदेवरा कलेश्वर राव उनके साथ थे। जेल में रहते हुए प्रकाशम ने दो पुस्तकें लिखीं- ‘विश्व की मौद्रिक प्रणाली’ और 'भारतीय मुद्रा प्रणाली'। जेल में अन्य प्रतिष्ठित नेताओं के साथ प्रकाशम की मौजूदगी को खतरनाक मानते हुए ब्रिटिश सरकार ने 1931 में उन्हें कन्नानूर जेल में स्थानांतरित कर दिया था। आगे चल कर 1937 में भारत सरकार अधिनियम-1935, के अधीन दी गई प्रांतीय स्वायत्तता के तहत चुनाव हुए। प्रांतीय कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष के रूप में प्रकाशम ने प्रधानमंत्री पद के लिए सी. राजगोपालाचारी का नाम प्रस्तावित किया। प्रकाशम को राजगोपालाचारी केमंत्रिमंडल में राजस्व मंत्री के रूप में शामिल किया गया था जिसने उन्हें लोगों की मदद करने का मौका मिला। वह मंत्री के रूप में जमींदारी उन्मूलन विधेयक को विधानसभा से पारित करवाना चाहते थे, लेकिन ऐसा नहीं हो सका, क्योंकि 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध शुरू होने के बाद सभी कांग्रेस सरकारों ने इस्तीफा दे दिया था।
1942 के भारत-छोड़ो आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लेने के कारण प्रकाशम को फिर गिरफ्तार कर वेल्लोर जेल में डाल दिया गया था। गांधीजी की अनिच्छा के बावजूद, प्रकाशम को कांग्रेस विधायक दल का नेता चुना गया और 10 जून, 1946 को उन्होंने मद्रास के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली। उन्होंने अपने कार्यकाल में मद्यनिषेध को बहुत सफलतापूर्वक लागू किया जो राजगोपालाचारी के प्रधानमंत्रित्वकाल में नहीं हो सका था। आगे चलकर प्रकाशम ने कांग्रेस से नाता तोड़कर प्रजा पार्टी शुरू की और 1952 में आजाद भारत का पहला आम चुनाव लड़ा। मद्रास के गवर्नर बने श्री प्रकाश ने उस समय सी. राजगोपालाचारी को मुख्यमंत्री बनाया।
उसी समय तेलुगु राज्य की लंबे समय से चली आ रही मांग ने गति पकड़ना शुरू कर दिया और वह जल्द ही एक बड़े आंदोलन में बदल गई। ‘अमरजीवी’ पोट्टि श्रीरामुलु के सर्वोच्च बलिदान ने आंध्र राज्य के गठन की प्रक्रिया को तेज कर दिया और कुरनूल को राज्य की राजधानी के रूप में चुना गया। उस समय तक कांग्रेस में लौट आए प्रकाशम ने 1 अक्तूबर, 1953 को राज्य के पहले मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। प्रकाशम ने ही आंध्र प्रदेश में श्री वेंकटेश्वर विश्वविद्यालय की स्थापना तथा नए राज्य में जल आपूर्ति परियोजनाओं की शुरुआत की और कृष्णा नदी पर बैराज का निर्माण करवाया। ‘आंध्र का शेर’ कहे जाने वाले प्रकाशम ने 20 मई, 1957 को अंतिम सांस ली जिस पर ‘आंध्र प्रभा’ के प्रसिद्ध संपादक, नरला वेंकटेश्वर राव ने इन शब्दों में टिप्पणी की: ‘आंध्र से प्रकाश का समापन’। प्रकाशम की सेवाओं के प्रति आभार व्यक्त करने के लिए राज्य सरकार ने राज्य के नेल्लोर और गुंटूर जिलों में से एक और जिला बना कर उसका नाम प्रकाशम रखा।