देशघाती अफवाहें उड़ाते राहुल गांधी
   दिनांक 13-अगस्त-2019
370 पर राहुल गांधी का रुख अलगाववादियों जैसा है, और अपने बयानों से वो पाकिस्तान की मदद करते दिख रहे हैं. कश्मीर पर कांग्रेस एक बार फिर अपनी ऐतिहासिक गलतियों की ओर मुड़ गई है.
 
अलगाववाद के सुर में सुर मिलाते राहुल 
धारा 370 के हटने से राहुल गांधी नाराज हैं. 370 वह दुर्भाग्य था जिसे राहुल के परनाना ने पैदा किया, जिसे उनके खानदान ने पाला पोसा, और जिसे जम्मू कश्मीर, विशेष रूप से वहां के हिंदुओं तथा सारे देश ने भुगता.
धारा 370 हटाने के विरोध में सदन में बोलते हुए कांग्रेस के नेता गुलाम नबी आजाद यहां तक बोल गए कि 370 को हटाकर “भारत का सिर काट दिया गया है.” कांग्रेस ने अपने दूसरे नेता अधीर रंजन चौधरी को बोलने के लिए खड़ा किया तो उन्होंने कश्मीर को अंतरराष्ट्रीय मामला बता डाला. निकट बैठे राहुल गांधी चुपचाप अपना मोबाइल खेलते रहे. उनकी माता सोनिया गांधी ने अधीर रंजन चौधरी को टोका लेकिन उनकी बात का खंडन नहीं किया.
राहुल गांधी ने चुप्पी बनाए रखी, और ट्विटर के माध्यम से अप्रत्यक्ष रूप से सरकार के इस कदम पर हमले करते रहे. अब राहुल गांधी का बयान आया है कि कश्मीर में बहुत कुछ गलत हो रहा है और प्रधानमंत्री तथा भारत सरकार को कश्मीर के मामले में पारदर्शिता बरतनी चाहिए. बिना तथ्यों के ऊल-जलूल, गैर जिम्मेदार बयान देना राहुल गांधी की आदत है. अपने बयानों से वह यदा-कदा देश विरोधियों की मदद भी करते रहते हैं. राहुल का हालिया बयान पाकिस्तान के कानों के लिए संगीत की तरह है. एक बार फिर पाकिस्तान में वो हीरो बन गए हैं, जो कश्मीर में तथाकथित अत्याचारों के खिलाफ आवाज़ उठा रहा है. राहुल ने कहा कि उन्हें जानकारी मिली है कि कश्मीर में बहुत कुछ गलत हो रहा है.
अफवाहों की राजनीति
विचित्र संयोग है कि कश्मीर की राजनीति और राहुल गांधी की राजनीति के आधारभूत स्तंभ एक से ही हैं – अफवाह तंत्र और वंशवाद. राज परिवार के वंशज होने के नाते राहुल गाँधी का जबसे राजनीति में पदार्पण हुआ है, तबसे उन्होंने अफवाहों को हवा देने का काम किया है. “असहिष्णुता, तानाशाही, मॉब लिंचिंग, राफेल “ आदि इसके उदाहरण हैं. मोदी विरोध के चक्कर में वो कई बार पाकिस्तान की बोली बोलते नज़र आते हैं. कश्मीर के मामले में भी एक बार फिर राहुल गांधी वही कर रहे हैं. कश्मीर पर उनका बयान सीमापार से उड़ाई जा रही अफवाहों पर आधारित है, जो शायद उनके करीबी उन तक पहुंचा रहे हैं. राहुल गाँधी के कश्मीर पर दिए गए बयान पर राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने तीखी प्रतिक्रिया दी है.
उन्होंने कहा कि राहुल गांधी कश्मीर के हालात को लेकर झूठ बोल रहे हैं. कश्मीर में एक भी गोली नहीं चली है और न ही कहीं लाठीचार्ज हुआ है. अनुच्छेद 370 अब वापस नहीं होने जा रहा और लोग जितनी जल्दी इस बात को समझ लें, हालात उतनी जल्दी सुधरेंगे. यह एक बदला हिंदुस्तान है और अब अनुच्छेद 370 नहीं रहा. राहुल गांधी को संबोधित करते हुए मलिक बोले कि राहुल गांधी के पास अगर कोई प्रमाण है तो उसे पेश करें. कश्मीर घाटी में अफवाह तंत्र किस प्रकार काम करता है इसपर राज्यपाल ने कहा कि यदि लाल चौक ( श्रीनगर) पर कोई छींक दे, तो यहां ( गवर्नर हाउस) आते-आते वह बम धमाके की खबर बन जाती है.
सत्यपाल मलिक की बात अक्षरशः सत्य है. सुरक्षाबलों को बदनाम करने और कश्मीर मामले में भारत पर कीचड़ उछालने के लिए लगातार अफवाहें फैलाई जाती रही हैं, और उन अफवाहों को आधार बनाकर घाटी में चुनिंदा स्थानों पर उपद्रव आयोजित किए जाते रहे. ऐसे अनेक उदाहरणों में से एक शोपियां कांड है. जिसमें दो कश्मीरी महिलाओं नीलोफर और आशिया की दुर्घटनावश डूबकर मृत्यु हो गई. इस घटना को अलगाववादी षड्यंत्रकारियों ने सुरक्षाबलों द्वारा किए गए बलात्कार एवं हत्या का मामला बताकर तूफान खड़ा कर दिया. केंद्र में यूपीए की सरकार थी. मामले की जांच शुरू भी नहीं हुई थी कि राज्य के मुख्यमंत्री और एक कैबिनेट मंत्री ने पत्रकार वार्ता करके घटना को प्रचार दे दिया. 4 माह तक कश्मीर घाटी में बंद और प्रदर्शन आयोजित किए गए. पीडीपी, नेशनल कॉन्फ्रेंस, हुर्रियत और स्थानीय कांग्रेस नेताओं ने आंदोलन किया. अंत में सीबीआई जांच और जस्टिस मुजफ्फर जान की अध्यक्षता वाली कमेटी की जांच रिपोर्ट के बाद सामने आया कि बलात्कार तो हुआ ही नहीं, दोनों महिलाओं की मृत्यु डूबने से हुई थी. शक की सुई परिवार सदस्यों की तरफ ही घूम रही थी. ऐसे अनेक उदाहरण हैं.
लेकिन कांग्रेस सरकार ने ऐसी घटनाओं से कभी सबक नहीं लिया. 31 जनवरी 2010 को प्रदर्शन के दौरान वामिक अहमद नाम के व्यक्ति की मृत्यु आंसूगैस का बोला फटने से हुई. अलगाववादी ऐसे ही मौके की तलाश में थे. उन्होंने तूफान खड़ा किया और केंद्र सरकार ने घुटने टेक दिए. हिंसक प्रदर्शन के आयोजनकर्ताओं पर तो कोई कार्यवाई नहीं हुई, लेकिन अपना कर्तव्य निभा रहे सीमा सुरक्षा बल के कमांडेंट को गिरफ्तार कर, मुकदमा दर्ज कर, स्थानीय पुलिस के हवाले कर दिया गया. इसलिए राहुल गाँधी के बयानों पर तनिक भी आश्चर्य नहीं होना चाहिए.

पिता और परनाना की परंपरा को आगे बढाते राहुल गांधी

 
 
पाकिस्तान के हीरो बने राहुल. प्रियंका वाड्रा का भड़काऊ ट्वीट
जम्मू कश्मीर के राज्यपाल रहे जगमोहन ने कश्मीर पर लिखी अपनी किताब में कश्मीर समस्या और राजीव गांधी के संबंध में कुछ ब्यौरा दिया है. राजीव गांधी का प्रधानमंत्री काल वह समय था जब कश्मीर में नासूर जहरीला होता जा रहा था. सीमा के उस पार जिया उल हक की तानाशाही का दौर था, जो पंजाब में खालिस्तानी आतंकवाद को भड़काने तथा कश्मीर को सुलगाने में लगे थे. उधर अफगानिस्तान में अमेरिका और सऊदी अरब के साथ मिलकर हज़ारों मुजाहिदीनों की फसल तैयार कर रहे थे.
इन दोनों स्वाभाविक प्रतिद्वंदियों के साथ अपने अनुभव को जगमोहन ने इस तरह साझा किया है " सन 1983 में जब मैं संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम द्वारा आयोजित आवास और शहरी विकास की कॉन्फ्रेंस में शामिल होने के लिए कराची गया तब मुझे पाकिस्तान के राष्ट्रपति जिया उल हक से मिलने का अवसर मिला . जिया ने मुझे विशेष रूप से पुराने ऐतिहासिक नगरों तथा सामान्य रूप से महानगरों की समस्याओं के बारे में विचार विनिमय के लिए आमंत्रित किया था. वह मुझे ठंडे और खामोश राजनीतिज्ञ की तरह लगे जिसके पास खास समस्याओं को गहराई से समझने और उन्हें हल करने की कार्य योजना को पूरा करने का पर्याप्त समय था. मुझसे मिलने से पहले उन्होंने मेरी किताब 'रीबिल्डिंग शाहजहानाबाद: द वाइल्ड सिटी ऑव दिल्ली' के कुछ पृष्ठ पढ़ रखे थे. उन्होंने मुझसे आग्रह किया कि मैं कराची डेवलपमेंट अथॉरिटी के वरिष्ठ अधिकारियों से वार्ता करूं, और दीवार से घिरे लाहौर नगर को भी देखूं.
इसके विपरीत राजीव गांधी से जब भी मुझे जम्मू कश्मीर की मुख्य समस्याओं पर वार्तालाप करने का अवसर मिला, वह मुझे हमेशा जल्दी में लगे. उनकी जानकारी अच्छी तरह बनाए गए दस्तावेजों पर आधारित ना होकर, कानों में फुसफुसाई गई बातों और अफवाहों से मिले उथले ज्ञान पर अधिक निर्भर लगी. उनका पूरा दृष्टिकोण घाटी के सामाजिक और राजनीतिक जीवन को बनाने वाली घटनाओं, धाराओं तथा अंतर्धाराओं पर आधारित ना होकर कुछ व्यक्तियों के मूल्यांकन पर टिका था.”
कश्मीर में यही रवैया राजीव गांधी के नाना पंडित नेहरू का भी था. कश्मीर में क्या करना है, इसके लिए उनके एकमात्र सलाहकार शेख अब्दुल्ला थे, जो वास्तव में कश्मीर को एक अलग रियासत बनाकर उसका सुल्तान बनने का ख्वाब देख रहे थे. शेख अब्दुल्ला की आंखों में कश्मीर को मुस्लिम रियासत बनाने का ख्वाब बसा था. इसलिए अब्दुल्ला ने जो पार्टी बनाई उसका नाम रखा मुस्लिम कॉन्फ्रेंस. ( बाद में इसे बदल कर नेशनल कॉन्फ्रेंस कर दिया गया) पाकिस्तान के साथ शेख अब्दुल्ला जा नहीं सकते थे, क्योंकि जिन्ना से उनकी बनती नहीं थी. शेख अब्दुल्ला की मुस्लिम कॉन्फ्रेंस का घोषित उद्देश्य मुसलमानों को अधिक आर्थिक अवसर और प्रशासनिक-सैनिक सेवाओं में अधिक पद दिलवाना था. नेहरू उनके साथ हो लिए .शेख अब्दुल्ला से अपनी मित्रता निभाने के लिए उन्होंने महाराजा कश्मीर से शत्रुता मोल ली. कश्मीर का भारत में पूर्ण विलय हो जाने के दो साल बाद शेख अब्दुल्ला की सलाह पर धारा 370 बनाई, और बाद में 35ए को इसमें जोड़ा. इस प्रकार कश्मीर को बेवजह अलगाववाद और आतंकवाद की राह पर ले गए. भारत के तत्कालीन राष्ट्रीय नेतृत्व की पूर्ण उपेक्षा करके आंखें बंद कर शेख अब्दुल्ला के पीछे चलते रहे. अपने पूर्वजों की उसी राह पर अब राहुल गाँधी दौड़ रहे हैं. इसी दौरान उनकी बहन प्रियंका वाड्रा का भी ट्वीट सामने आया है जिसमें उन्होंने लिखा है “आप सबको ईद की मुबारक. ख़ास तौर पर कश्मीर कि मेरी बहनों-भाईयों को, जो भयानक बंदिशें और दिक्कतें झेल रहे हैं....”
देशभक्तों की उपेक्षा, गद्दारों से गर्मजोशी 
कांग्रेस सरकारों ने कश्मीर मामले को राष्ट्रीय दृष्टिकोण से देखने की जगह वोटों की नज़र से देखा. इसे तुष्टीकरण का औजार बनाया. देश विरोधी हुर्रियत के नेताओं के लिए कालीन बिछाए जाते रहे. कांग्रेस की सरकारें उन लोगों को सर पर चढ़ाए रहीं जिनके हाथ निर्दोष कश्मीरी हिंदुओं के रक्त से सने थे, और जो निरंतर भारत की एकता व अखंडता को चुनौती दे रहे थे. यासीन मलिक जैसे लोग सरकारी दावतों और टीवी स्टूडियो की शोभा बढ़ाते रहे.
यासीन मलिक जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट का मुखिया है. जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट ने भारत के खिलाफ सशस्त्र जिहाद का नारा दिया था. 14 सितंबर 1989 को 58 वर्षीय कश्मीरी पंडित टिक्का लाल टापलू की दिनदहाड़े हत्या कर दी गई. टापलू उच्च न्यायालय के अधिवक्ता और जम्मू कश्मीर भारतीय जनता पार्टी के उपाध्यक्ष थे. टापलू जैसे प्रतिष्ठित व्यक्ति को श्रीनगर के बीचों- बीच उनके ही इलाके में क्लाशनिकोव राइफल की गोलियों से छलनी कर दिया गया था, जहां कश्मीरी हिंदुओं की सघन आबादी थी. संदेश साफ था कि जब राजधानी श्रीनगर में ऐसा हो सकता है, तो दूरदराज कस्बों और गाँवों में बसे हिंदुओं को अपना बोरिया बिस्तर बांध लेना चाहिए.
हत्या के बाद जेकेएलएफ ने अपना प्रेस वक्तव्य जारी किया जिसमें कहा गया कि " हम उन सब लोगों को मार देंगे जो कहते हैं कि जम्मू कश्मीर का भारत में विलय पूर्ण है. हम अपना सशस्त्र संघर्ष जारी रखेंगे."
जगह-जगह पाकिस्तान प्रेरित आतंकियों ने स्थानीय कट्टरपंथियों के साथ मिलकर हिंसा और बलात्कार को हथियार बनाकर लाखों कश्मीरी हिंदुओं को घाटी से खदेड़ दिया. हत्याएँ इतने नृशंस ढंग से की जातीं कि लोगों में खौफ फैले.
राष्ट्रभक्त मुस्लिमों को भी नहीं छोड़ा गया. कुपवाड़ा में सबइंस्पेक्टर शब्बीर अहमद आतंकवाद की रोकथाम के लिए अच्छा काम कर रहे थे. इसके लिए उनकी पदोन्नति भी की गई थी. 2 अक्टूबर 1989 की रात को वगूरा गाँव में तीन आतंकवादियों ने शब्बीर अहमद के भाई के घर पर रात में हमला किया. उन्होंने घर के रोशनदान से क्लाशनिकोव से अंधाधुंध गोलियां चलाई. चपेट में आकर अहमद की पत्नी और दस वर्षीय बेटी मारी गई. इस तरह कर्तव्य परायण पुलिस अधिकारियों तथा प्रशासनिक लोगों के परिवार तथा बच्चों को भी निशाना बनाया गया. पिछले सालों में भी इसी तरह की अनेक घटनाएँ हमने देखी हैं, जब आतंकियों ने सेना और पुलिस अधिकारियों को निशाना बनाया. ऐसे लोगों के लिए कांग्रेस के नेता, या राहुल गांधी अथवा सोनिया गांधी के मुँह से कभी सांत्वना के दो शब्द भी नहीं निकले.
जब राहुल गांधी और उनकी मां के हाथ में केंद्र की सत्ता थी, उस दौरान जनाधार विहीन कश्मीरी अलगाववादियों को किस कदर सर चढ़ाया गया उसकी एक से एक बढ़कर मिसाले हैं. देश के विरुद्ध ज़हर उगलने वाले हुर्रियत के लोगों को मनमोहन सिंह सरकार के दौरान सरकारी सुरक्षा प्रदान की गई. हुर्रियत तथा अन्य भारत विरोधी गुटों के नेताओं को फरवरी 2010 में दिल्ली में पाकिस्तान के विदेश सचिव से भेंट करने की अनुमति दी गई. उन्हें पाक दूतावास के भोज में शामिल होने दिया गया. हद तो तब हो गई जब इन लोगों को इस्लामी राष्ट्र संघ (ओआईसी) की बैठक में कश्मीर का प्रतिनिधि बनकर भाग लेने के लिए विदेश जाने तक की अनुमति दे दी गई.
फिर वही राग
देश बदल रहा है, कांग्रेस वहीं की वहीं है. लंबे समय तक चले प्रहसन के बाद कांग्रेस की कमान राहुल गांधी के हाथों से निकल कर उनकी माता के हाथों में लौट आई है. धारा 370 हटाने पर कांग्रेस के एक-दो नेताओं ने अपनी अंतरात्मा का परिचय दिया लेकिन कांग्रेस का मालिक गांधी परिवार चुप रहा. अब राहुल गांधी का मुंह खुला है तो उससे वही पुराना राग निकला है. राहुल गांधी पाक परस्तों की पीठ थपथपा रहे हैं. उनके दुष्प्रचार को अपनी आवाज दे रहे हैं. कांग्रेस में किसी की हिम्मत नहीं कि उनकी बात को काट सके. दुष्यंत कुमार का पुराना शेर है
 मौलवी से डांट खाकर अहले मकतब, फिर उसी आयत दुहराने लगे हैं.
इसी ग़ज़ल में दुष्यंत कुमार कहते हैं –
एक क़ब्रिस्तान में घर मिल रहा है,जिसमें तहख़ानों में तहख़ाने लगे हैं...
न जाने राहुल कांग्रेस का कैसा भविष्य गढ़ना चाह रहे हैं.