धारा 370 हिंदू विरोध का कांग्रेसी औजार थी
   दिनांक 14-अगस्त-2019
ये वही कांग्रेस है जिसकी यूपीए सरकार हिंदू विरोधी “सांप्रदायिक और लक्षित हिंसा विरोधी कानून” बनाने जा रही थी, जिसमें किसी ‘अल्पसंख्यक’ द्वारा की गई मामूली शिकायत पर भी हिंदुओं को जेल में ठूंसा जा सकता था. कांग्रेस का नेतृत्व 370 पर वही हठधर्मिता दिखा रहा है, जैसी उसने अमरनाथ श्राइन बोर्ड आंदोलन के समय दिखाई थी.

 
चिदंबरम के मुंह से कांग्रेस का वह सच निकल गया है, जिसे कांग्रेस बोलने से तो बचती रही, लेकिन व्यवहार में शत-प्रतिशत उतारा. सोनिया गांधी के विश्वस्त माने जाने वाले, यूपीए सरकार के गृह मंत्री और वित्त मंत्री रह चुके चिदंबरम ने बयान दिया है कि "मोदी सरकार ने जम्मू कश्मीर से धारा 370 इसलिए हटाई क्योंकि जम्मू कश्मीर एक मुस्लिम बहुल राज्य है. यदि वो एक हिंदू बहुल राज्य होता तो मोदी सरकार कभी धारा 370 नहीं हटाती." इस निर्लज्ज बयान ने कांग्रेस के सच को उघाड़ कर रख दिया है कि जम्मू कश्मीर की मुस्लिम बहुलता के कारण ही वहां धारा 370 का प्रावधान किया गया था और कांग्रेस लगातार कश्मीर के "विशेषाधिकार" की बात करती रही.
"कश्मीरियत" की आड़ में 370 का बचाव किया जाता रहा. सवाल यह है कि ये "कश्मीरियत" ऐसी क्या चीज है जिसकी रक्षा के लिए 370 जैसी असंवैधानिक धारा की आवश्यकता थी? यह कश्मीरियत, पंजाबियत, बंगालियत, गुजरातियत आदि से कैसे अलग है ? देश के अन्य राज्यों को अपनी स्थानीय परंपराओं की रक्षा के लिए किसी विशेषाधिकार कानून की आवश्यकता नहीं पड़ी, तो कश्मीर में ऐसा कौन सा आसमान टूट रहा था, कि कांग्रेस 370 धारा लेकर आई, और आज उसके हटने को लेकर इतनी बेचैन है?
सचाई यह है कि कश्मीरियत के नाम पर जेहादी आतंकवाद और अलगाववाद को पाला पोसा गया. संविधान की धज्जियां उड़ाई गईं. राष्ट्रध्वज का अपमान होने दिया गया . पाकिस्तान समर्थित तत्वों को कश्मीर में खुला खेल खेलने की छूट दी गई. कश्मीरी हिंदुओं को अपने ही देश में दोयम दर्जे का नागरिक बनने पर मजबूर किया गया. पाकिस्तान से कश्मीर में आकर बसे हिंदू शरणार्थियों को अमानवीय परिस्थितियों में जीने के लिए 70 वर्षों तक मजबूर किया गया . कश्मीर की सुरक्षा में लगे सुरक्षाबलों के जवानों की जिंदगी की कीमत नहीं समझी गई. और हिंदू –बौद्ध बहुल जम्मू और लद्दाख के साथ 70 सालों तक घोर अन्याय किया गया. लद्दाख के जनसंख्या नक्शे को योजना पूर्वक बदला गया.
जम्मू और लद्दाख के साथ धारा 370 की आड़ में अन्याय किया जाता रहा और कांग्रेस की सरकारों ने कभी परवाह नहीं की. जम्मू और लद्दाख के दर्जन भर से ज्यादा जिलों के साथ जिस प्रकार का अन्याय किया गया है, वैसा यदि देश के किसी एक मुस्लिम बहुल गांव के साथ भी हुआ होता तो कांग्रेस आसमान सर पर उठा लेती. यही वह सचाई है जो अनजाने में चिदंबरम के मुंह से निकल गई है.
ज्यादतियों की मीनार
जम्मू और लद्दाख के साथ पिछले सात दशकों में जो किया उसे बेशर्म धांधली के अलावा और कुछ नहीं कहा जा सकता. यह धांधली हर स्तर पर हुई है. 1998 की संसदीय मतदान सूची के आधार पर जम्मू और कश्मीर में मतदाताओं की संख्या लगभग बराबर है. कश्मीर में कुछ हजार ज्यादा है. लेकिन कश्मीर से 47 विधानसभा सीटें आती हैं, जबकि जम्मू से 36. जम्मू का क्षेत्रफल भी कश्मीर से बहुत बड़ा है, इस हिसाब से जम्मू में विधानसभा सीटों की संख्या कश्मीर से पर्याप्त ज्यादा होनी चाहिए, लेकिन कश्मीर में 9 सीटें ज्यादा हैं. इसलिए आज तक इतने बड़े जम्मू में से एक भी मुख्यमंत्री नहीं बन सका. राजस्व की दृष्टि से जम्मू से राज्य का 70 प्रतिशत राजस्व आता है, कश्मीर से 30 प्रतिशत. लेकिन केंद्रीय सहायता सहित राजस्व का 62 प्रतिशत कश्मीर पर व्यय होता आया है, जबकि जम्मू में मात्र 28 प्रतिशत. प्रशासनिक व्यवस्था एवं नियुक्तियों में भी ऐसा ही घोर भेदभाव हुआ है. 2001 की गणना के अनुसार कमिश्नर और सचिव स्तर के पदों पर 31 नियुक्तियां कश्मीर से हुईं और मात्र 4 जम्मू से. सचिव स्तरीय कर्मचारियों का प्रतिशत कश्मीर से 90% रहा जबकि जम्मू से 10%. लद्दाख से नगण्य. केंद्रीय मुख्यालय और सभी 13 राज्यस्तरीय प्राधिकरणों में शत-प्रतिशत नियुक्तियां केवल कश्मीर से हुईं.
वैष्णो देवी तथा अन्य धार्मिक यात्राओं के कारण जम्मू में हर साल 50 लाख के लगभग पर्यटक आते हैं, कश्मीर में 2 लाख से कम. लेकिन सरकारी पर्यटन व्यय 88 प्रतिशत कश्मीर में हुआ 10 प्रतिशत जम्मू में और लद्दाख में मात्र 2 प्रतिशत. जबकि लद्दाख में पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं. जम्मू में भी धार्मिक स्थलों के अलावा एक से बढ़कर एक पर्यटन के केंद्र हैं, लेकिन सारा प्रचार कश्मीर का ही होता आया है.
राज्य के कुल 350 मेगावाट विद्युत उत्पादन में से 328 मेगावाट कश्मीर को जाता रहा, और जम्मू को 22 मेगावाट. 1991 तक जम्मू में 4267 किलोमीटर सड़कें थीं और कश्मीर में 6480, जबकि लद्दाख में 1645 किलोमीटर. ध्यान रहे कि जम्मू और लद्दाख का क्षेत्रफल घाटी से कहीं अधिक है. लेकिन सड़क बिछाने में जो भेदभाव किया गया उसकी गवाही देता आंकड़ा है - 1965 से 1991 तक क्षेत्रवार सड़क वृद्धि का प्रतिशत. इन 26 वर्षों में जम्मू में सड़क लम्बाई में 45.1 प्रतिशत की वृद्धि हुई जबकि कश्मीर में 119.2 प्रतिशत की. लद्दाख का आंकड़ा उपलब्ध नहीं है.
शिक्षा बजट का 70 प्रतिशत कश्मीर पर व्यय हुआ , 30 प्रतिशत जम्मू पर. शिक्षा नीति इस प्रकार से बनाई गई कि जम्मू के शिक्षा संस्थानों में कश्मीरी छात्रों की पर्याप्त संख्या रहती आई है, जबकि कश्मीर के संस्थानों में जम्मू के छात्रों की संख्या नगण्य. लद्दाख के अधिकांश छात्र जम्मू, चंडीगढ़, दिल्ली आदि के संस्थानों में अध्ययनरत हैं. बीते दशकों में जिन संस्थानों की योजना जम्मू अथवा लद्दाख में हुई, उन्हें बाद में कश्मीर में स्थानांतरित कर दिया गया. पशु चिकित्सा, दंत चिकित्सा एवं अन्य पाठ्यक्रमों में जम्मू और लद्दाख के छात्रों की संख्या लगातार गिरती चली गई.
राज्य में केंद्र सरकारें दशकों से पैसा उड़ेल रही हैं, लेकिन दिल्ली से आने वाली केंद्रीय निधि का 90 प्रतिशत घाटी में खर्च किया गया, और 10 प्रतिशत जम्मू तथा लद्दाख में. 1986 में प्रधानमंत्री ने राज्य को एक विशेष पैकेज दिया था. इस पैकेज का 92 प्रतिशत कश्मीर घाटी में खर्च किया गया और 8 प्रतिशत जम्मू एवं लद्दाख में.
आंदोलन होते रहे
ऐसा नहीं है कि इस भेदभाव और ज्यादती के खिलाफ जम्मू और लद्दाख के लोगों ने आवाज नहीं उठाई. आंदोलन होते रहे. लोग बार-बार सड़कों पर उतरते रहे. लेकिन न तो राष्ट्रीय मीडिया के कानों पर जूं रेंगी, और न ही ' सेकुलर' राजनीति की मोटी खाल पर कुछ असर हुआ. कश्मीर के पहाड़ी जनजातीय समूहों जैसे गुज्जर, बकरवाल आदि के साथ भी भेदभाव किया गया. 1947 के बाद से ही जम्मू के लोग अपने अधिकारों के लिए मांग उठा रहे थे. उनका कहना था कि कश्मीर को विशेष महत्व देकर उनके विरुद्ध पक्षपात किया जा रहा है. लगातार चल रहे आंदोलन के कारण 6 नवंबर 1967 को गजेंद्र गडकर नामक कमीशन की नियुक्ति हुई. इस कमीशन ने राज्य की क्षेत्रीय विविधताओं का गहराई से अध्ययन किया और अनेक परामर्श दिए. जम्मू , कश्मीर और लद्दाख के विकास के लिए क्षेत्रीय समितियों के गठन का प्रस्ताव सामने रखा. कमीशन ने स्पष्ट किया था कि जम्मू तथा लद्दाख के साथ भेदभाव हो रहा है. कमीशन ने कहा कि " यदि वर्तमान के सारे मुद्दे समान रूप से सुलझा भी लिए जाएं तब भी असंतोष बना रहेगा, जब तक कि जम्मू व लद्दाख की राजनैतिक आकांक्षाएं भी पूरी नहीं होती." परिणाम वही हुआ जो हमेशा होता है. कमीशन की अधिकांश सिफारिशों को स्वीकार ही नहीं किया गया, और जिन्हें स्वीकार किया गया उन्हें लागू नहीं किया गया.
राज्य की राजनीति में घाटी का नेतृत्व ही हावी था, जिसकी केंद्र की कांग्रेस सरकार से निकटता थी. जम्मू और लद्दाख को उनका हक दिए जाने की बात ना तो शेख अब्दुल्ला को मंजूर थी और न ही कश्मीर के कांग्रेस नेतृत्व को.
1978 में इस भेदभाव के विरुद्ध जम्मू एक बार फिर सुलग उठा. पुंछ, राजौरी और जम्मू जिले में उग्र छात्र आंदोलन हुआ. कर्फ्यू लगा. पुलिस ने गोलियां चलाई. 26 दिसंबर 1978 को एक सर्वदलीय जम्मू कार्यकारी समिति की स्थापना हुई जिसने जम्मू की शिकायतों को सामने रखकर 94 दिनों तक आंदोलन चलाया. मजबूर होकर राज्य सरकार ने जस्टिस एस एम सीकरी की अध्यक्षता में दूसरा कमीशन बैठाया. सीकरी कमीशन ने भी वहीं अनुशंसाएं कीं, जो गजेन्द्र गडकर कमीशन ने की थीं. सीकरी कमीशन रिपोर्ट का भी वही हश्र हुआ जो गडकर कमीशन की रिपोर्ट का हुआ था.
दोनों कमीशनों की रिपोर्ट को लागू करने के लिए जम्मू में आंदोलन शुरू हुआ. लेकिन हुआ कुछ नहीं. इस बीच राज्य सरकार घाटी में जिलों की संख्या बढ़ाती रही और जम्मू कुढ़ते हुए देखता रहा. किश्तवाड़ में इस फैसले के विरुद्ध आंदोलन चला. 12 नवंबर 1981 को राज्य सरकार ने एक और कमीशन बनाया जेएन वजीर कमीशन . वजीर कमीशन ने जम्मू में तीन नए जिले किश्तवाड़, सांबा तथा रियासी और श्रीनगर में एक नया जिला बांदीपुरा बनाने का सुझाव दिया. राज्य सरकार ने बांदीपुरा बनाने का सुझाव तो मान लिया, जम्मू को एक बार फिर खाली हाथ छोड़ दिया. इस प्रकार आंदोलन चलते रहे, और "कश्मीरियत" के नाम पर की जा रही राजनीति ढिठाई के साथ राज्य की आधी आबादी के साथ भेदभाव करती रही.
अमरनाथ श्राइन बोर्ड आंदोलन 
 
अमरनाथ श्राइन बोर्ड के लिए हुआ था ऐतिहासिक आंदोलन
घाटी में ‘कश्मीरियत’ के नाम पर कैसे हिंदू विरोधी राजनीति की जाती रही इसका ज्वलंत उदाहरण है अमरनाथ श्राइन बोर्ड आंदोलन. 26 मई 2008 को अमरनाथ यात्रियों को ठंड से बचाने के लिए अस्थायी शेड बनाने हेतु अमरनाथ श्राइन बोर्ड को 99 एकड़ जमीन आवंटित की गई. इस निर्णय के विरूद्ध घाटी में हुर्रियत कांफ्रेंस और “कश्मीरियत” के ठेकेदारों ने हिंसक प्रदर्शन शुरू कर दिए. पीडीपी और नेशनल कांफ्रेंस हुडदंगियों के साथ थी, तो कांग्रेस दुबकी हुई थी. अंततः सबने मिलकर अमरनाथ यात्रियों के लिए दी गई जमीन को वापिस लेने का फैसला कर लिया. इस फैसले के विरूद्ध जम्मू की जनता उठ खडी हुई और जम्मू कश्मीर राज्य के इतिहास का सबसे बड़ा आंदोलन हुआ. जब प्रतिदिन लाखों महिलाएं, पुरुष और बच्चे गिरफ्तारी देने के लिए पहुंचने लगे. कई जानें गईं. आखिर में अमरनाथ यात्रा के लिए अस्थायी छत बनाने के लिए 40 हेक्टेयर (लगभग 99 एकड़) भूमि दी गई. आतंकवादी तो अमरनाथ यात्रा पर हमले की धमकी देते ही हैं, हमले भी करते हैं, लेकिन घाटी के अलगाववादी और राजनीतिक नेतृत्व भी धारा 370 की आड़ में कैसे हिंदू विरोधी काम करते आ रहे थे, अमरनाथ श्राइन बोर्ड आंदोलन इसकी मिसाल है.
अभी भी बाज़ आने को तैयार नहीं
धारा 370 पर राहुल गांधी का रुख, पी चिदंबरम का बयान और प्रियंका वाड्रा का बकरीद की शुभकामना देता वो ट्वीट, जिसमें उन्होंने कश्मीरियों पर “भयंकर प्रतिबंधों” का उल्लेख किया है, इस बात का प्रमाण है, कि कांग्रेस आज भी अपना रवैया बदलने को तैयार नहीं है. कांग्रेस का नेतृत्व उसी राजपरिवार के हाथों में बना हुआ है, जिसने 370 जैसी देशघाती धारा को पैदा किया, और जिंदा रखा. कांग्रेस के इन्हीं रहनुमाओं की छाया में यूपीए सरकार हिंदू विरोधी “सांप्रदायिक और लक्षित हिंसा विरोधी कानून” बनाने जा रही थी, जिसमें किसी ‘अल्पसंख्यक’ द्वारा की गई मामूली शिकायत पर भी हिंदुओं को जेल में ठूंसा जा सकता था. कांग्रेस का नेतृत्व 370 पर वही हठधर्मिता दिखा रहा है, जैसी कि उसने अमरनाथ श्राइन बोर्ड आंदोलन के समय दिखाई थी. वही अन्यायी मानसिकता, जैसा कि उसने 30 सालों तक कश्मीरी हिंदुओं के साथ किया. जैसा कि उसने 70 सालों तक जम्मू और लद्दाख के साथ होने दिया.