370 पर फंसा पाकिस्तान न निगला जाए न उगला जाए
   दिनांक 19-अगस्त-2019
पाकिस्तान हल्ला ज़रूर मचा रहा है, लेकिन उसकी आवाज़ में दम नहीं है. क्यों, ये जानना दिलचस्प है
 
" कश्मीर पाकिस्तान की शह रग है..." यह जुमला पाकिस्तान में दशकों से चल रहा है. 'शह रग' से अर्थ गले की नस से है. भारत ने जबसे 370 को समाप्त किया है, बौखलाए इमरान के मंत्री, खुद इमरान और उनके रावलपिंडी वाले रहनुमा, अंगारे उगल रहे हैं, पीले पड़े चेहरों के साथ.
ट्रंप ने अपने मध्यस्थता वाले बयान से इमरान और जनरल कमर बाजवा की उम्मीदें जगा दी थीं , लेकिन धारा 370 के हटने के बाद अमेरिकी रवैये से पाकिस्तानियों को ट्रम्प के झुनझुने की असलियत का एहसास हो गया है. ' बड़ा बिरादर' सऊदी अरब हो या शेष मुस्लिम जगत, सब पत्थर के सनम बने बैठे हैं. इस रुदन को कोई भाव दे भी तो कैसे. धारा 370 भारत के कानून का एक हिस्सा थी. भारत सरकार ने इसे बदल दिया. अब इसमें कोई दूसरा देश क्या ये बोल सकता है कि भारत ने अपने कानून में बदलाव कैसे कर लिया? भारत की मजबूत विदेश नीति के साये में मायूस बैठे बाजवा और इमरान पाकिस्तान के जज्बाती धड़ों के उम्मीदें बांधे रखने की कोशिश कर रहे हैं.
“क्या तुम्हें नहीं मालूम ..?”
धारा 370 को लेकर पाकिस्तान दुनिया में भले ही हल्ला मचा रहा है लेकिन इस मामले पर वो खुद भी भ्रमित है कि क्या करें और क्या ना करें. 370 को लेकर पाकिस्तान की संसद में गुल-गपाड़ा हुआ. पक्ष विपक्ष ने भारत और एक दूसरे पर तोहमतें लगाई. इमरान खान और विदेश मंत्री संसद से गायब थे, जब सवाल उठ खड़ा हुआ कि 370 पर सरकार के प्रस्ताव में से 370 का मुद्दा ही गायब है. इमरान सरकार का बयान कश्मीर में “अत्याचार” की पुरानी पाकिस्तानी पटकथा पर केन्द्रित था. दोनों तरफ से लानत भेजने की रस्में अदा की जा रही थीं और सत्ता पक्ष विपक्ष से आंखों ही आंखों में मानो सवाल पूछ रहा था कि “क्या तुम्हे नहीं मालूम है कि हम 370 का जिक्र क्यों नहीं कर सकते ?”
दरअसल पाकिस्तान ने शुरू से ही कश्मीर पर भारत के किसी भी क़ानून, किसी भी धारा को अमान्य करता आया है . इसी के चलते उसने धारा 370 को भी कभी मान्यता नहीं दी थी. पाकिस्तान का दावा रहा है कि जम्मू कश्मीर पर भारत का अवैध कब्जा है, इसलिए भारतीय संविधान की कश्मीर संबंधी धाराओं की भी कोई अहमियत नहीं है. अब नए सूरते-हाल में उसी पाकिस्तान को धारा 370 हटाने का विरोध करना है. यानी एक रूप में कश्मीर पर भारत के क़ानून को मान्यता देना है. इसलिए ये सारा मजाक बनकर रह गया, और पाकिस्तान के सभी रहनुमा बगलें झांकते नज़र आए.
मजेदार बात ये है कि काफी बहस के बाद पाकिस्तान की संसद ने 370 का जिक्र उस प्रस्ताव में जोड़कर 370 हटाने का विरोध किया और फिर आगे कहा कि हालांकि हमने कभी भी कश्मीर के उपर भारत के किसी भी क़ानून को मान्यता नहीं दी है.
कहां गायब हैं वो गाज़ी-जिहादी ?
कश्मीर पर दिन-रात आग उगलने वाली जिहादी तंजीमें भी आश्चर्यजनक रूप से चुप हैं.पाकिस्तानी मीडिया पर नज़र रखने वाले जानते हैं कि वहां कश्मीर पर उग्र रैलियां होती ही रहती हैं जिनमें कश्मीर को इस्लाम का सवाल बनाकर भारत पर जुबानी कोड़े बरसाए जाते हैं. इन रैलियों में लाखों लोगों के सामने कश्मीर में जिहाद का वास्ता देकर पाकिस्तान के एक तबके के खून का उबाल बनाए रखने के कोशिश की जाती है. इस उबाल का उपयोग पाक फौज और आईएसआई अपनी निरंतर बदलती रणनीति के लिए, कभी इस तो कभी उस पार्टी के पक्ष में करती रहती हैं. ये यहां के सियासती जायके का पुराना नुस्खा है.
तो फिर कश्मीर पर मौसम-बेमौसम गरजने वाले गाज़ी-जिहादी, वो मेलों में दहाड़ने वाले शेर कहां गायब हो गए ? पाकिस्तान की पैदाइश के बाद कश्मीर पर सबसे बड़ा झटका उन्हें मिला है, और वो नदारद हैं, क्यों? जवाब ये है कि उन्हें नदारद रहने को कहा गया है. पाक फौज नहीं चाहती कि भारत के इस कदम पर लोगों में ज्यादा जज़्बात जगाए जाएं, क्योंकि जब ‘हिंदू भारत’ के खिलाफ ‘जिहाद’ का नारा बुलंद होगा, तब लोग फौज की तरफ ही उम्मीद लगाने लगेंगे.
कॉमेडी सर्कस में राजू श्रीवास्तव ने एक मजाकिया शेर सुनाया था कि
“खुदी को बुलंद कर इतना, चढ़ा वो जैसे –तैसे,
ऊपर वाले ने खुद पूछा, अब उतरेगा कैसे ?“
यही हालत इस समय पाक फौज की है, क्योंकि कश्मीरी जिहाद उसी का नारा है, और वो बहुत ऊपर चढ़ चुके हैं.
काम न आया चीनी टोटका


 
कश्मीर पर होने वाली जिहादी रैलियां नदारद और बेअसर रहा चीनी टोटका  
पाकिस्तान ने बार –बार चीन की चिरौरियां करके 370 मामले पर चीन को मनाया कि वो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में इस मामले को उठाए. चीन ने बहुत जोर लगाया तो भी मामला बंद कमरे की चर्चा तक ही पहुंच सका. इस चर्चा के गंभीरता का अंदाज़ इस बात से लगाया जा सकता है कि सुरक्षा परिषद की इस “चर्चा” का कोई रिकॉर्ड भी नहीं रखा गया और न ही चर्चा की समाप्ति पर कोई बयान जारी किया गया. स्वाभाविक रूप से ये एक महत्वहीन बैठक थी जिसे सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य चीन की जिद पर बुलाया गया था. पर पाकिस्तान को पुचकारने के लिए चीन ने एक बार फिर दुनिया को भरमाने की कोशिश की जब उसने बैठक के बाद बयान दिया कि “भारत ने कश्मीर में एकतरफा कदम उठाया है, और हालात खतरनाक है.” लेकिन “कश्मीर द्विपक्षीय मामला है” कहकर रूस ने चीन के इस दिखावे की हवा निकाल दी.
दरअसल चीन ने कश्मीर पर उसके बयान को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का बयान बनाकर पेश करने के कोशिश की लेकिन रूस के बयान, परिषद् के अन्य सदस्यों की चुप्पी और भारत के विदेश विभाग के वक्तव्य ने उसके इरादों पर पानी फेर दिया. सुरक्षा परिषद की इस “बैठक” के बाद प्रधानमंत्री इमरान खान ने डोनाल्ड ट्रम्प समेत सुरक्षा परिषद के अन्य सदस्यों के राष्ट्राध्यक्षों को फोन लगाया ताकि वो भी इस मामले पर चीन की तरह कुछ बोलें लेकिन छन कर आई ख़बरों के अनुसार “उनकी किसी से भी बात नहीं हो पाई.”
उधर संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान की प्रतिनिधि मलीहा लोधी दिखावटी दृढ़ता के साथ मीडिया के सामने जोर देती रहीं कि सुरक्षा परिषद की बैठक के कारण “कश्मीर मामले का अंतरराष्ट्रीयकरण हो चुका है” लेकिन सब समझ रहे थे कि ये “अंतरराष्ट्रीयकरण ” चीन और पाकिस्तान तक सीमित है.
भारत के प्रतिनिधि सैयद अकबरुद्दीन ने मौके पर बहुत सटीक बयान दिया. बोले “दो देशों (चीन और पाकिस्तान) ने अपने बयानों को अंतरराष्ट्रीय समुदाय की इच्छा बनाकर पेश करने की कोशिश की है. लेकिन हम जानते हैं कि सुरक्षा परिषद कैसे काम करती है. उसके विचार हम सब तक (मीडिया और शेष लोगों तक) संयुक्त राष्ट्र अध्यक्ष द्वारा पहुंचाए जाते हैं. धारा 370 हमारा आंतरिक मामला है. हमारी सरकार ने ये कदम जम्मू कश्मीर और लद्दाख के हमारे लोगों की भलाई के लिए उठाए हैं. हम सुरक्षा परिषद के आभारी हैं, कि उसने इस आंतरिक चर्चा में हमारे कदमों का समर्थन किया है. हम राज्य में शांति और विकास के लिए प्रतिबद्ध हैं . कुछ लोगों ने (जम्मू-कश्मीर को लेकर) आशंका का वातावरण बनाने का प्रयास किया है, जो कि जमीनी सच्चाइयों से परे है. ध्यान रहे कि एक देश और उसके नेता जिहाद की विचारधारा का उपयोग भारत में हिंसा फैलाने के लिए कर रहे हैं. आप सब समझ रहे हैं कि सुरक्षा परिषद की इस चर्चा का निष्कर्ष क्या निकला है.”
जिन्हें फैसला लेना है वो तो...
सारे दांव चले जा चुके हैं. गोटियां पिट चुकी हैं. हताश इमरान और उनका काबीना बीच-बीच में मरी आवाज़ में जंग की संभावना जतलाता है, लेकिन जंग का फैसला जिन्हें लेना है, याने पाक फौज, वो ठंडे पड़े हैं. जाहिर है इमरान जंग के चुनौती भारत को नहीं पाक फौज को दे रहे हैं, ताकि वो एक हद के आगे उन पर दबाव न बनाए. खान को अपनी कुर्सी बचाए रखनी है, इसलिए कुछ करते हुए दिखते रहना उनकी मजबूरी है. वो भी जानते हैं कि उनके फौजी भारत से सीधा उलझना नहीं चाहते. और फिर गोला-बारूद की कौन सोचे, अभी तो उन्हें आलू-प्याज भारी पड़ रहे हैं.