मानसून के मौसम में योग
   दिनांक 20-अगस्त-2019


स्वास्थ्य चर्चा - 'स्वास्थ्य चर्चा' में प्रति सप्ताह आहार, आरोग्य, जीवनशैली और योग के विशेषज्ञ बताएंगे कि आपका खान-पान कैसा हो, आप स्वस्थ कैसे रह सकते हैं, जीवनशैली कैसी होनी चाहिए और किस बीमारी में कौन-सा आसन करना चाहिए। इस स्तंभ की दूसरी कड़ी में योग पर चर्चा करेंगे। कपालभाति और ताड़ासन के लाभ और उसकी विधि को जानेंगे


हम साल के 365 दिन योग कर सकते हैं, लेकिन हर योगासान हरेक व्यक्ति के लिए नहीं है। अत: उचित परामर्श से ही योग करना चाहिए। हमें अपनी शारीरिक स्थिति एवं मौसम के अनुकूल ही योगासन चुनना चाहिए

-आचार्य कृष्ण देव

नियमित रूप से योग करना, विशेष रूप से मानसून के मौसम में एक सबसे अच्छा जीवनरक्षक साधन है, जो सहज उपलब्ध है। मानसून वर्ष का वह समय होता है जब हम पानी से होने वाली बीमारियों के मामलों में वृद्धि देखते हैं। योग आपके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ावा देगा, रोग प्रतिरोधक क्षमता में सुधार करेगा।

कपालभाति

कपालभाति क्रिया करने के लिए मेरुदण्ड को सीधा रखते हुए किसी भी ध्यानात्मक आसन, सुखासन, पद्मासन, वज्रासन या फिर कुर्सी पर बैठें। सहजतापूर्वक पहले दो लंबी गहरी श्वांस लें और उसे जाने दें। इसके बाद तेजी से नाक के दोनों छिद्रों से सांस को यथासंभव बाहर फेंकें। साथ ही पेट को भी यथासंभव अंदर की ओर संकुचित करें। जैसे ही थकान हो थोड़ा रुक जाएं। पुन: शुरू करें। इस क्रिया को 50 बार से धीरे-धीरे बढ़ाते हुए 500 बार तक कर सकते हैं। ध्यान दें, इसका खाली पेट अभ्यास करें अथवा खाना खाने के चार घंटे बाद भी कपालभाति कर सकते हैं। दो साल के भीतर पेट में कोई ऑपरेशन हुआ हो, अपेंडिक्स, हर्निया इत्यादि की समस्या हो, उस समय भी कपालभाति न करें। हृदय रोग, उच्च रक्तचाप और पेट में गैस आदि शिकायतों में कपालभाति धीरे-धीरे करना चाहिए (60 बार एक मिनट में)। धूल-धुआं-दुर्गंध, बंद व गर्म वातावरण में कपालभाति न करें। मासिक चक्र के समय और गर्भावस्था के दौरान कपालभाति नहीं करना चाहिए। बुखार, दस्त, अत्यधिक कमजोरी की स्थिति में कपालभाति न करें। कब्ज की स्थिति में यह प्राणायाम न करें।

ताड़ासन

ताड़ासन बहुत ही सहज योगासन है, लेकिन इसके लाभ अद्भुत हैं। अत: इसे हर कोई कर सकता है। इससे शरीर की स्थिति ताड़ के पेड़ के समान हो जाती है, इसीलिए इसे ताड़ासन कहते हैं।

यह आसन खड़े होकर किया जाता है। एड़ी-पंजों को समानांतर क्रम में थोड़ा दूर रखें। हाथों को कमर से सटाकर रखें। फिर धीरे-धीरे कंधों के समानांतर लाएं। फिर जब हाथों को सिर के ऊपर ले जाएं, तो एड़ी भी जमीन से ऊपर उठाकर सावधानी से पंजों के बल खड़े होंं। पैर की उंगलियों के सहारे जमीन पर पकड़ बनाकर हाथों के पंजों को ऊपर की ओर मोड़ दें और ध्यान रखें कि हथेलियां आसमान की ओर रहें। गर्दन सीधी रखें। ऊपर जाने के क्रम में श्वांस भरते हुए जाना है। कुछ देर यानी अपनी क्षमतानुसार 10-20 सेकंड रुक सकते हैं, श्वांस रोककर अथवा सामान्य श्वांस-प्रश्वांस लेते हुए। इस आसन को नियमित करते रहने से पैरों में मजबूती आती है, साथ ही पंजे मजबूत होते हैं तथा पिंडलियां भी सख्त होती हैं।

यह योग उचित मार्गदर्शन में ही करें। जब हाथों को ऊपर की ओर ले जाते हैं, तब यह ध्यान रखना है कि हाथों के साथ एडि़यों को भी ऊपर की ओर उठाना है। जब हाथों को ऊपर की ओर खींचते हैं उस समय पेट को अंदर की ओर खींचते हैं। जिनके पैरों में कोई गंभीर रोग है, हाल ही में कोई सर्जरी हुई हो, वे यह आसन न करें।