पूरा कश्मीर सिर्फ हमारा है
    दिनांक 20-अगस्त-2019
1994 में संसद ने एक प्रस्ताव पारित कर यह संकल्प किया कि, ‘‘पूरा कश्मीर हमारा है। पाकिस्तान अपने कब्जे वाले कश्मीर को खाली करे’’

 
जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 समाप्त किए जाने के बाद से पाकिस्तान में राजनीतिक हलचल तेज है। वहां की वर्तमान इमरान सरकार कठघरे में है और विपक्ष उस पर हमलावर है। आंतरिक अराजकता और आर्थिक दिवालिएपन की ओर बढ़ रहे पाकिस्तान की इमरान सरकार के लिए यह मुश्किल भरा समय है।
बौखलाए इमरान फिर से वही पैंतरा चलने की कोशिश कर रहे हैं जो उनके पूर्ववर्ती प्रधानमंत्री चलते आए हैं। अर्थात् सीमा पर हथियारों और सेना का जमावड़ा और नाभिकीय हथियारों की धमकी के बीच अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के खिलाफ दुष्प्रचार। लेकिन वे यह भूल रहे हैं कि समय बदल चुका है और उसके साथ ही दुनिया के देशों की धारणा भी पाकिस्तान के बारे में बदल चुकी है। शीतयुद्ध के काल के दांव-पेच अब उसका साथ नहीं निभा सकेंगे, यह समझने के लिए पाकिस्तान और उसकी सेना को शायद और समय चाहिए।
मांगी सहायता, मिली दुत्कार
भारत द्वारा राज्य में अनुच्छेद 370 की समाप्ति के तुरंत बाद हमेशा की तरह, पाकिस्तान ने अपने अंतरराष्ट्रीय सहयोगियों को सहायता के लिए पुकारा। उसने अमेरिका से हस्तक्षेप की अपील की, किंतु अमेरिकी विदेश विभाग के प्रवक्ता मॉर्गन ओर्टागल ने कहा कि कश्मीर को लेकर अमेरिका की नीति स्पष्ट है कि यह द्विपक्षीय मुद्दा है। उसने संयम बरतने और क्षेत्र में शांति बनाए रखने की अपील की।
अपने हर मौसम के मित्र चीन पर उन्हें भरोसा था कि वह तो उनका साथ देगा ही। समर्थन पाने के विश्वास के साथ शाह महमूद कुरैशी ने बीजिंग के लिए उड़ान भरी। चीनी विदेश मंत्री वांग यी के साथ हुई बैठक के बाद चीन ने बयान जारी कर कहा कि कश्मीर का मुद्दा औपनिवेशिक इतिहास से बचा हुआ विवाद है। इसे संयुक्त राष्ट्र चार्टर, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और द्विपक्षीय समझौते के प्रस्तावों के आधार पर ठीक से और शांति से हल किया जाना चाहिए।
इस्लामिक देशों के संगठन ओआईसी ने भी पाकिस्तान का साथ नहीं दिया। संयुक्त अरब अमीरात ने इसे भारत का आंतरिक मामला बताया, वहीं तुर्की और सऊदी अरब ने द्विपक्षीय वार्ता द्वारा मामले को सुलझाने की बात कही। यहां तक कि उसके ही पैदा किए हुए तालिबान ने भी पाकिस्तान को आगाह करते हुए कहा कि वह भारत को लेकर अपने तनाव के साथ अफगानिस्तान को न जोड़े।
इस बीच पाकिस्तान ने कश्मीर में तथाकथित विशेष दर्जे को समाप्त करने संबंधी एक शिकायती पत्र संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को भेजा, किंतु उसकी अध्यक्ष जोआना रोनेका ने पत्रकार वार्ता में इस पत्र के संबंध में पूछे गए प्रश्न के उत्तर में इस पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया। इसके बाद पाकिस्तानी विदेश मंत्री कुरैशी ने संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुतारेस को पत्र लिखकर भारत द्वारा सुरक्षा परिषद के 1949 के प्रस्ताव का ‘उल्लंघन’ करने की शिकायत की। इसके उत्तर में महासचिव के प्रवक्ता स्टीफन डुजारिक ने शिमला समझौते का उल्लेख करते हुए मामले को शांतिपूर्ण ढंग से हल करने की बात कही। ज्ञातव्य है कि बांग्लादेश के निर्माण और पाकिस्तान की भारतीय सेना के हाथों हुई हार के बाद 1972 में हुए शिमला समझौते में दोनों देशों द्वारा इस पर सहमति व्यक्त की गयी थी कि जम्मू—कश्मीर का मसला द्विपक्षीय बातचीत के द्वारा ही हल किया जाएगा और इसमें किसी तीसरे पक्ष की कोई भूमिका नहीं होगी।
शिमला में हुआ समझौता

 
2-3 जुलाई, 1972 की मध्य रात्रि को भारत और पाकिस्तान के बीच शिमला में हुए समझौते में पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो और तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के मध्य इस बात पर सहमति हुई कि दोनों देशों के संबंध संयुक्त राष्ट्र चार्टर के सिद्धांत व उद्देश्य से निर्देशित होंगे। दोनों देश अपने मतभेदों को शांतिपूर्ण तरीकों से द्विपक्षीय वार्ता या किसी अन्य शांतिपूर्ण उपाय, जिस पर वे सहमत हों, से निपटाने के लिए दृढ़ संकल्पित हैं। दोनों देशों के बीच किसी समस्या का अंतिम समाधान लंबित रहने पर दोनों पक्ष एकपक्षीय रूप से स्थिति में परिवर्तन का प्रयास नहीं करेंगे और शांतिपूर्ण व सद्भावनापूर्ण संबंधों के लिए हानिकारक किसी भी संगठन को सहयोग और प्रोत्साहन से दूर रहेंगे। दोनों देशों ने एक-दूसरे की राष्ट्रीय एकता, क्षेत्रीय अखण्डता, राजनीतिक स्वतंत्रता और प्रभुत्वसम्पन्न समानता का सम्मान करने और एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करने के प्रति वचनबद्धता व्यक्त की। तय किया गया कि दोनों देशों के बीच संबंधों को सामान्य करने के लिए संचार, डाक, टेलीग्राफ, समुद्र, सीमा-चौकियों सहित भूमि और वायु संपर्क बहाल करने के लिए कदम उठाए जाएंगे। शत्रुतापूर्ण प्रचार को रोकने के लिए यथाशक्ति प्रयास करेंगे। नियंत्रण रेखा का सम्मान दोनों देशों द्वारा बिना किसी पूर्वाग्रह के किया जाएगा। दोनों पक्ष इस रेखा के उल्लंघन के लिए सेना के इस्तेमाल या खतरा दिखाने से दूर रहेंगे।
इस समझौते की पृष्ठभूमि में 1971 के युद्ध में पाकिस्तान की शर्मनाक पराजय और उसके 93,000 सैनिकों का बंदी बनाया जाना था। जुल्फिकार अली भुट्टो ने अपने देश को यह विश्वास दिलाया था कि वे भारत के नियंत्रण में गए क्षेत्र को वापस लाएंगे। वे भारतीय समकक्ष इंदिरा गांधी को यह समझाने में सफल रहे कि यदि वे शिमला से खाली हाथ लौट गए तो उनके अस्तित्व और पाकिस्तान में उभरती लोकतांत्रिक व्यवस्था को खतरा पहुंच सकता है। वह सैन्य बलों पर प्रशासनिक नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं और शिमला समझौते की असफलता इस प्रक्रिया को बाधित कर सकती है।
जुल्फिकार अली भुट्टो का यह तर्क भी था, ‘‘यदि बांग्लादेश के निर्माण के रूप में पाकिस्तान के विभाजन और सैन्य पराजय के बाद यदि औपचारिक रूप से तुरंत जम्मू—कश्मीर भी सौंप दिया गया तो पाकिस्तानी जनता के मन में भारत के प्रति शत्रुता का भाव और गहरा हो जायेगा।’’ भुट्टो ने यह भी कहा कि वे अनेक मामलों पर सहमति दे रहे हैं, किन्तु समझौते में प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से इनका उल्लेख न किया जाए। इंदिरा गांधी ने उनकी विवशता को समझते हुए इस अनुरोध को स्वीकार किया। समझौते में न तो इन बातों का उल्लेख किया गया और न ही इस बातचीत का रिकॉर्ड रखा गया।
दोनों पक्ष वार्ता की मेज पर तो आ गए थे, किंतु दोनों ही ओर आशंकाएं घिरी हुई थीं दोनों प्रधानमंत्रियों के सलाहकार भी एकमत नहीं थे। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सलाहकार भी दो तरह की राय रखते थे। प्राप्त सूचनाओं के अनुसार, उनके सलाहकार डी. पी. धर पाकिस्तान द्वारा नियंत्रण रेखा को विभाजक रेखा मानते हुए एक स्पष्ट लिखित समझौता किए जाने के बाद ही पाकिस्तानी युद्धबंदियों को छोड़ने और पाकिस्तानी क्षेत्र को खाली करने की सहमति देना चाहते थे। इसके विपरीत अन्य सलाहकारों का मत था कि शांति व स्थिरता पाने के लिए युद्धबंदियों को छोड़ दिया जाए और पाकिस्तानी क्षेत्र खाली कर दिए जाएं। वे ऐसा समझौता करने के पक्ष में थे जिससे भुट्टो भारत के साथ शांतिपूर्ण संबंध स्थापित करने के प्रति प्रवृत्त हों और अपनी घरेलू राजनीतिक विश्वसनीयता बनाए रखने में सफल हो सकें, बशर्ते वे जम्मू-कश्मीर पर एक उचित समझौता करने के लिए तैयार हों।
1976 में भुट्टो अपने घरेलू राजनीतिक विवादों में फंस गए। 1977 में हुए तख्तापलट में जिया उल हक ने उन्हें अपदस्थ कर दिया। इसके साथ ही शिमला समझौते में जो अलिखित समझ बनी थी उस पर आगे बढ़ने की प्रक्रिया भी रुक गई। सलाहकारों के दोनों समूह और स्वयं प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी इस पर सहमत थे कि ‘1947 में जम्मू-कश्मीर का जो भाग पाकिस्तान के कब्जे में जा चुका है उसे पाना असंभव है।’ उनकी यह समझ तत्कालीन अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के कारण बनी थी। इसी दबाव में वे सभी इस पर सहमत थे कि यदि पूरा पाक अधिक्रांत जम्मू-कश्मीर पाकिस्तान को देकर युद्धविराम रेखा को ही स्थायी सीमा मान लें और शेष कश्मीर लेने की जिद छोड़ दें तो शांति स्थापित हो सकती है।
भुट्टो की विदाई के साथ ही समझौते के अलिखित प्रावधानों के कार्यान्वयन पर भी विराम लग गया। यह भारत के हित में ही हुआ। अपदस्थ किए जाने से पूर्व भुट्टो ने गिलगित-बाल्टिस्तान का नाम बदल कर ‘नॉर्दर्न एरिया’ कर दिया और उसे कथित आजाद कश्मीर से अलग कर दिया। पाक अधिक्रांत जम्मू-कश्मीर, जो वास्तव में अब मीरपुर-मुजफ्फराबाद का इलाका ही बचा था, उसको पूरी तरह से पाकिस्तान के संवैधानिक, राजनीतिक और प्रशासनिक नियंत्रण में लेना प्रारंभ कर दिया था। चूंकि यह परस्पर सहमति से हो रहा था इसलिए भारत की ओर से इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी गई।
समय बदला और सत्ता भी बदली। जनता पार्टी सरकार में तत्कालीन विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने फरवरी, 1978 में पाकिस्तान की यात्रा कर विश्वास बहाली की पहल की। दोनों देशों के बीच हॉकी और क्रिकेट मैच शुरू हुए और वाणिज्य दूतावास खोले गए। लोगों का आना-जाना बढ़ा। जनरल जिया ने सिख तीर्थयात्रियों को पाकिस्तान स्थित तीर्थों के दर्शन को प्रोत्साहित किया और वहां की खुफिया एजेंसियों ने सिख तीर्थयात्रियों से संपर्क कर उनमें से कुछ ‘उग्र’ तत्वों के मन में अलगाव के बीज बोने शुरू कर दिए।
जिया की शरारत
अक्तूबर, 1978 में नए बने कराकोरम राजमार्ग के दौरे के समय जिया ने अपने साथ भारत सहित 15 राजदूतों को आमंत्रित किया। यह राजमार्ग जम्मू- कश्मीर के गिलगित-बाल्टिस्तान से होकर गुजरता है। भारत के तत्कालीन राजदूत ने यद्यपि यह प्रस्ताव ठुकरा दिया, किंतु जिया ने इस अवसर का लाभ क्षेत्र पर अपने प्रभुत्व के प्रदर्शन के लिए किया। 1979 में पाकिस्तान ने ‘सेंटो’ से अपने हटने की घोषणा कर दी और भारत से यह आश्वासन प्राप्त किया कि वह पाकिस्तान के गुटनिरपेक्ष आंदोलन में शामिल होने का विरोध नहीं करेगा। भारत ने इसे सकारात्मक कदम माना, किंतु पहले ही भाषण में जिया ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन के मंच पर जम्मू-कश्मीर का मुद्दा उठा दिया। 15 नवंबर, 1979 को पाक अधिक्रांत जम्मू-कश्मीर का दौरा करते हुए जिया ने कहा, ‘‘पाकिस्तान कश्मीरी लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार को समर्थन देना जारी रखेगा।’’
3 अप्रैल, 1982 को जिया ने यह कहते हुए कि गिलगित, हुंजा और स्कार्दू जम्मू-कश्मीर के विवादित क्षेत्र के अंग नहीं हैं, इनके प्रत्यक्ष पाकिस्तानी न्यायक्षेत्र में होने की घोषणा कर दी। इसी वर्ष पाकिस्तान और चीन ने पाक अधिक्रांत जम्मू-कश्मीर और शिनजियांग प्रांत के बीच कुंजरब दर्रा सीमा को खोलने के विषय में एक प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर किए।
जिया उल हक के 11 वर्ष के कार्यकाल में भारत में खालिस्तान की मांग को लेकर आतंकवाद प्रारंभ हुआ। प्रारंभिक दौर में उसकी विभीषिका का अनुमान न लगा सकने के कारण उसे नजरअंदाज करने की भूल की भारी कीमत चुकानी पड़ी। बाद में आॅपरेशन ब्लू स्टार का कड़ा फैसला लेना पड़ा। इसी समय पाकिस्तान ने सियाचिन पर कब्जे की कोशिश की, जिसे विफल करने के लिए भारत को त्वरित कार्रवाई कर सियाचिन ग्लेशियर सहित सालतोरो रिज पर नियंत्रण स्थापित करना पड़ा। यही वह काल था जब पूर्ववर्ती सोवियत संघ ने अफगानिस्तान में दखल दिया, जिससे निपटने के लिए अमेरिका ने पाकिस्तान की भरपूर सहायता की।
भारत में खालिस्तानी उग्रवाद और आपरेशन ब्लूस्टार के घाव अभी पूरी तरह भर भी नहीं सके थे कि जम्मू-कश्मीर के नौजवानों के हथियार चलाने का प्रशिक्षण लेने के लिए पाक अधिक्रांत जम्मू-कश्मीर में जाने की सूचनाएं आने लगीं। 1988 में कश्मीर घाटी में जगह-जगह हिंसा की घटनाएं होने लगीं। पाकिस्तान के स्वतंत्रता दिवस 14 अगस्त को श्रीनगर सहित अनेक स्थानों पर पाकिस्तान के हरे झण्डे फहराए गए तो भारतीय स्वतंत्रता दिवस 15 अगस्त को काले झण्डे। जगह-जगह नारे लगाती भीड़ रावलपिण्डी के रास्ते खोल देने की मांग करने लगी। पुलिस के साथ उनके संघर्ष से स्थिति और अधिक जटिल होती चली गई। मुहर्रम के जलूस पर हमला हुआ और शिया-सुन्नी संघर्ष भी उठ खड़ा हुआ।
इसी बीच तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री मुफ्ती मुहम्मद सईद की बेटी के अपहरण के बाद भारत सरकार के घुटने टेकने की घटना ने पाकिस्तान को आश्वस्त किया कि वह अपने अलगाववादी एजेंडा को आगे बढ़ा सकता है। 21 मई, 1991 को राजीव गांधी की हत्या की दुखद घटना घटी। उनके अंतिम संस्कार में भाग लेने आए पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने भारत के प्रधानमंत्री चंद्रशेखर से भेंट करके कहा, ‘‘दोनों देश पूरे जम्मू—कश्मीर पर अपने दावे को छोड़ दें। भारत सरकार घाटी में जनमत संग्रह पर गंभीरता से विचार करे अथवा जम्मू और लद्दाख को अपने पास रख कर घाटी पाकिस्तान को सौंप दे तथा पाक अधिक्रांत जम्मू-कश्मीर पर पाकिस्तान का अधिकार स्वीकार कर ले।’’ चंद्रशेखर ने उनके प्रस्ताव को अव्यावहारिक व काल्पनिक बताया।
घाटी में आंदोलनकारी आत्मनिर्णय के अधिकार के नारे लगा रहे थे, किंतु पाकिस्तान ने नया पैंतरा अपनाते हुए आत्मनिर्णय के स्थान पर सुरक्षा बलों द्वारा ‘भारत विरोधी आंदोलनकारियों’ पर बल प्रयोग कर मानवाधिकारों के उल्लंघन को दुनियाभर में मुद्दा बनाया। बाबरी ढांचे के प्रकरण ने भारत में सांप्रदायिक खाई पैदा की, जिसे और बढ़ाने के लिए पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई ने मुंबई में श्रृंखलाबद्ध बम विस्फोटों की साजिश रची। 1990 में जनवरी 21 और 22 को कश्मीर की मस्जिदों से लाउडस्पीकरों पर कश्मीरी हिंदुओं को घाटी छोड़ने की चेतावनी दी गई। देखते ही देखते 3,50,000 हिंदुओं का निवासस्थान रही घाटी हिंदूविहीन हो गई। हिंसा का एक अभूतपूर्व दौर जम्मू-कश्मीर में चला, जिसके कारण हजारों लोगों को अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ा। समूचा देश आंदोलित हो उठा। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान के दुष्प्रचार ने विश्व जनमत को भी प्रभावित किया।
...और लिया संकल्प
अंतत: तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. नरसिम्हराव की पहल पर भारत की संसद ने 22 फरवरी, 1994 को एक सर्वसम्मत संकल्प स्वीकृत किया जिसमें कहा गया, ‘‘यह सभा भारत में अशांति, वैमनस्य और विध्वंस पैदा करने के स्पष्ट उद्देश्य से पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में स्थित शिविरों में आतंकवादियों को प्रशिक्षण देने, हथियार और धन उपलब्ध कराने, जम्मू और कश्मीर में भाड़े के विदेशी सैनिक सहित प्रशिक्षित जंगजुओं की घुसपैठ में सहायता देने में पाकिस्तान की भूमिका पर गहरी चिंता व्यक्त करती है। पाकिस्तान से आतंकवाद को अपना समर्थन देना तत्काल बंद करने की मांग करती है, क्योंकि यह शिमला समझौते तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत अंतरराज्यीय आचरण के प्रतिमानों का उल्लंघन है और दोनों देशों के बीच तनाव की मूल जड़ है। यह सभा भारत की जनता की ओर से यह दृढ़ घोषणा करती है कि
(क) जम्मू-कश्मीर राज्य भारत का अविभाज्य अंग रहा है और रहेगा तथा उसे शेष भारत से पृथक करने के किसी भी प्रयास का सभी आवश्यक साधनों से विरोध किया जाएगा।
(ख) भारत की एकता, प्रभुसत्ता और क्षेत्रीय अखण्डता के विरुद्ध हर तरह के षड्यंत्रों का प्रतिरोध करने की इच्छाशक्ति और क्षमता भारत में है, और यह सभा मांग करती है कि-
(ग) पाकिस्तान को भारत के राज्य जम्मू और कश्मीर के सभी क्षेत्र खाली कर देने चाहिए, जिन्हें आक्रमण कर हथिया लिया है और सभा संकल्प करती है कि-
(घ) भारत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने के किसी भी प्रयास का डटकर मुकाबला किया जाएगा।’’ संसद का यह संकल्प भारत की बदली हुई मनोदशा और नीति का दस्तावेज है। यह बताता है कि शिमला समझौते के समय युद्ध का मोर्चा जीतकर भी समझौते में हार जाने की ग्रंथि से भारत ढाई दशक पहले ही बाहर आ चुका है। सर्वसम्मत संकल्प के इस रजत जयंती वर्ष के अवसर पर भारत सरकार ने संकल्प के शब्दों को व्यवहार में प्रकट किया है। अब यह निश्चित हो गया है कि पाकिस्तानी दुष्प्रचार और वैश्विक दबाव की राजनीति को झटक कर भारत खम ठोंक कर खड़ा है। अब शिमला समझौते को अकेले नहीं, बल्कि 1994 के संसद के सर्वसम्मत संकल्प के साथ पढ़ा जाएगा। पाक अधिक्रांत जम्मू-कश्मीर पर आगामी समय में भारत की नीति को इस आलोक में ही पढ़ा और समझा जाना उपादेय होगा। आजादी के बाद भारत अपनी यात्रा के सात दशक पूरे कर उस मोड़ पर आ खड़ा हुआ है जब वर्तमान राष्ट्रीय नेतृत्व के साथ 130 करोड़ लोग इतिहास को एक नई ऊंचाई देने के लिए कमर कस चुके हैं।