श्रद्धांजलि: सदैव प्रेरणास्रोत रहेंगे 'अरुण'
   दिनांक 26-अगस्त-2019
प्रभात झा

 
जो आया है , उसे तो जाना ही है। क्योकि जब कोई जाता है तभी धरा पर कोई आता है। विश्व में अभी तक कोई वैज्ञानिक ऐसा नहीं हुआ जो जाने वाले का पता लगा ले कि वह कहां गया? पर यह शास्त्र साफ़ शब्दों में कहता है की जीवन का सोलहवां संस्कार मृत्यु है। लेकिन मृत्यु इतनी निर्दयी होगी, ऐसा पता नहीं था। पता तब लगा जब एक होनहार बीरवान को असमय हम देशवासियों के बीच से उठा ले गया। 'अरुण' तो अभी अपने अरुणोदय से देश को, अपने विचार को आलोकित ही कर रहे थे कि मृत्यु ने उनका घर देख लिया। मृत्यु तुझे ऐसा नहीं करना था। जरूर हम लोगों से कोई गलती हुई होगी, अतः उन्हें तुम हमसे असमय छीन कर ले गए।
'अरुण जेटली' ने अपने जीवन की लेकिन स्वयं खींची। उन्होंने विचारों की प्रतिबद्धता की परीक्षा सन 1975 में ही शत-प्रतिशत अंक से पास कर कर ली थी। इंदिरा गांधी ने सन 1975 में देश में आपातकाल लगा दिया। उस दौरान अरुण जेटली सिर्फ 23 वर्ष के थे। लेकिन आजादी की दूसरी लोकतंत्र की लड़ाई के वे भी विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ता के रूप में एक सेनानी थे। उन्हें जेल की सीखचों में डाल दिया गया। वे घबराये नहीं। वे बड़े घराने के बेटे थे। लेकिन उन्होंने अपने विचारों का माथा ऊंचा रखा और इंदिराजी के सामने अपना माथा नहीं झुकाया। उलटे 19 महीने जेल में रहे। विचारों के प्रति प्रतिबद्धता का इससे बड़ा अनुपम उदाहरण और नहीं मिल सकता।
'उनके लक्ष्य तय हुआ करते थे।वे मित्र में इत्र की तलाश नहीं करते थे। यही कारण है कि उन्होंने सदैव मित्रता निभाई। यही कारण है कि बहरीन की धरती से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने दोस्त को हज़ारों भारतीयों के बीच में पुकारा और कहा कि , "मेरा दोस्त अरुण चला गया"। आज आपको सबकुछ मिल सकता है और मिल भी जाता है, पर एक अच्छा दोस्त मिलना बहुत कठिन हो गया है। राजनीतिक जीवन में तो दोस्त मिलना ही दुर्लभ है। क्योंकि यहां तो स्वार्थ का मेल मिलाप होता है। यहां का संबंध जिनसे है, वह भी समझता है कि क्यों दे और जो संबंध रखता है वह भी समझता है कि उनसे कब तक संबंध रखना है।
पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अरुण जेटली की दोस्ती की मिसाल भारत में हर दिन और हर पल दी जाएगी। विचारों का लगाव था। स्वार्थों की दोस्ती नहीं थी। यहीं कारण है कि श्रीमती संगीता जेटली को जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फ़ोन किया तो श्रीमती जेटली ने कहा कि, "आप अपने कर्तव्य पथ पर रहें और कार्य पूरा करके आएं"। श्रीमती जेटली का यह सन्देश भी दर्शाता है कि अरुण जेटली ने अपने परिवार को भी विचारों और कर्तव्यपथ से जोड़कर रखा था। अरुण जेटली बेबाक थे। वे प्रसिद्ध अधिवक्ता थे। वे कुशल वक्ता थे। साथ ही ऐसे प्रवक्ता थे जिन्हे सुनने के लिए लोग आतुर रहते थे।
2003 में संगठन का निर्णय हुआ की मुझे दिल्ली आना है। मैं, प्रकाश जावड़ेकर और श्याम जाजू संगठन के निर्णय से दिल्ली आए। हम लोगों के लिए यहां रहने की व्यवस्था नहीं थी। तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष कुशाभाऊ ठाकरे एक दिन अरुणजी के पास आये और कहा की दो कार्यकर्ता महाराष्ट्र से और दो मध्य प्रदेश से हमने दिल्ली में संगठन के कार्य के लिए बुलाए हैं। उन्हें रहने की व्यवस्था करनी है। जेटली जी ने तत्काल कहा की ठाकरे जी आपका आदेश। मैं तो अपने 9 नंबर अशोका रोड में रहता नहीं हूं। तीनों की व्यवस्था यहीं कर देते हैं। इसके बाद हम तीनों 9 अशोका रोड में रहने लगे।
वह हम सभी को बुलाते रहते थे और पूछते रहते थे की कोई दिक्क्त तो नहीं। एक दिन की घटना है। उन्होंने मुझे बुलाया और कहा की आज तुम मेरे घर चलोगे। मैं हतप्रभ रह गया। वे अपनी गाड़ी में शाम को ले गए। उन्होंने अनेक बातें की और कहा कि मुझे एक अधिकारी ने कहा है कि तुम अपने संपर्क से पार्टी में आने वाली दूसरी पीढ़ी को आगे लाओ बल्कि उनको गढ़ने का काम करो। वे कार्यकर्ताओं के कार्यकर्ता थे। उन्हें शौक था अपने से उन छोटों को गढ़ने का जिसमें भारत और भाजपा की समझ हो।
मैं 2008 में राज्यसभा में आया। रेल बजट पर बोलने का उन्होंने अवसर दिया। मैं जब बोला तो मेरी सीट पर आकर कहा कि अच्छा और तर्कयुक्त बोले। बधाई! मन गदगद सा हो गया। इतना ही नहीं, वे 'कमल सन्देश' का सम्पादकीय भी नियमित पढ़ते थे और साथ ही मार्गदर्शन भी देते थे। सदन के भीतर हम जैसे लोगों को उन्होंने सिखाया कि आप जब बोलते हो तो भारत देखता है और भारत भाजपा के बारे में सोचता है।
अरुण जेटली' का दिल्ली, पंजाब और चंडीगढ़ से बहुत लगाव था। वे कार्यकर्ताओं का अध्ययन करते थे। आज जो भाजपा की द्वितीय पंक्ति की टीम है उसे गढ़ने में उनका बहुत बड़ा हाथ है। वे संसद के दोनों सदनों के गौरव थे । उनके भाषण की जब सूचना मिलती थी तो पत्रकार दीर्घा, दर्शक दीर्घा और सदन की उपस्थिति ही नहीं होती थी, पूरा सदन आतुर रहता था की अब अरुणजी क्या बोलेंगे। वे राज्यसभा में विपक्ष के नेता बने। वे तर्कों के साथ तथ्यों को रखते थे। देश के हर प्रांत में आनेवाली पीढ़ी से उनका संपर्क रहता था। वे सदैव बोलते थे कि हम अपनी बात स्पष्टता से उचित स्थान पर रखते हैं। संगठन ने माना तो ठीक नहीं तो जो संगठन ने निर्णय लिया, उसे पूरा करने में वे जुट जाते थे।
'अरुण जेटली' एक व्यक्ति का नाम अक्सर लेते थे। वे थे राजकुमार भाटिया। अरुणजी कहते थे कि मुझे विद्यार्थी परिषद में लाने वाले, विश्वविद्यालय का चुनाव लड़ाने वाला राजकुमारजी ही थे। मैं इन्हीं के कारण परिषद से जुड़ा। वे व्यक्तियों के आकलन में कभी धोखा नहीं खाते थे। खासकर उनकी उनलोगों से बहुत नाराजगी थी, जो राजनीति में अवसरवादी होते हैं। वे ऐसे लोगों से से दल को मात्रा आगाह करते थे।
हमने राजनीति में अनेक लोग देखे। उनमें से विचारों के प्रति ईमानदार और अपने जीवन में मूल्यों और नैतिकता के प्रति ईमानदार व्यक्ति का नाम अरुण जेटली था , हम गर्व से कह सकते हैं उनका पूरा जीवन पारदर्शिता से भरा था।
हमें अवसर मिला उनके साथ एक नहीं अनेक राज्यों में मीडिया का काम करने का। उनके न्यूज़सेंस के सभी कायल थे। अनेक पत्रकार उनसे मार्गदर्शन लेने आते थे। वे सबसे साथ मित्रता रखते थे पर सबसे पहले उनकी विचारधारा थी। अरुण जी हम सबको छोड़कर चले गए। वे काया से जरूर चले गए, पर उनकी विचारों की छाया में भाजपा ही नहीं, देश की आने वाली पीढ़ी सदैव पल्ल्वित होती रहेगी।
सांसद (राज्यसभा) एवं भाजपा राष्ट्रीय उपाध्यक्ष