पुस्तक समीक्षा सरल जीवन, गूढ़ चिंतन
   दिनांक 27-अगस्त-2019
 
 
कुछ समय पहले प्रकाशित पुस्तक ‘प्रखर राष्टÑभक्त एकात्म मानववाद के प्रणेता पं. दीनदयाल उपाध्याय’ में दीनदयालजी के जीवन के हर पहलू को समेटा गया है। दीनदयालजी की सरलता, मधुरता और विचारशीलता देखकर सभी प्रभावित हो जाते थे। पुस्तक के लेखक और वर्तमान में देश के शिक्षा मंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ ने अपने लेखकीय में लिखा है, ‘‘दीनदयाल जी भारत के उज्जवल अतीत से प्रेरणा लेकर उज्जवलतर भविष्य का निर्माण करना चाहते थे। उनका इस बात पर जोर रहता था कि स्वतंत्र भारत की विचारधारा का स्रोत ‘भारतीय चिंतन’ ही होना चाहिए। पर इसके साथ ही वे रूढ़िवादी नहीं’ प्रगतिगामी थे।’’ 1942 में शिक्षण पूर्ण होने पर वे संघ के प्रचारक बन गए। 1947 में दीनदयालजी ने ‘राष्टÑधर्म प्रकाशन’ की स्थापना की। इसके अंतर्गत ‘राष्टÑधर्म’, ‘पाञ्चजन्य’, तथा ‘स्वदेश’ नामक पत्र प्रकाशित होने लगे। उनमें अपना नाम लिखे बिना ही वे तमाम मुद्दों पर लिखते रहे। इन पत्रों के माध्यम से देश में संघ का प्रचार-प्रसार और भी तेजी पकड़ने लगा। संघ कांग्रेस के लिए मुसीबत बनता जा रहा था। अत: कांग्रेस सरकार ने इन पत्रों को प्रतिबंधित कर दिया। लेकिन दीनदयाल जी ने सूझबूझ से काम लिया। पाञ्चजन्य पर प्रतिबंध लगने पर उन्होंने ‘हिमालय पत्रिका’ नाम से एक समाचार पत्र शुरू किया। यह पत्र भी जल्दी ही लोकप्रिय हो गया। सरकार ने इसे भी प्रतिबंधित कर दिया। तब उन्होंने ‘देशभक्त’ नाम से प्रकाशन शुरू किया। सरकार समझ नहीं पा रही थी कि क्या करें। अंतत: उन्होेंने दीनदयाल जी को ही पकड़ने की साजिश रची, लेकिन वे तब तक उनकी पकड़ नहीं पाए जब तक कि उन्होंने खुद ही आत्मसमर्पण नहीं कर दिया।
6 अप्रैल, 1951 को डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने भारतीय जनसंघ की स्थापना की। श्रीगुरुजी ने संघ को राजनीति से बिल्कुल अलग रखने का सूत्र दिया था। उन्होंने दीनदयालजी एवं अटल जी को जनसंघ के लिए सौंप दिया था। कुछ दिन बाद ही दीनदयालजी जनसंघ के राष्टÑीय महासचिव बने। इतने उच्च पद पर पहुंच कर भी वे साइकिल से घूमते थे और लोगों से संपर्क करते थे। पुस्तक में दीनदयालजी के एकात्म मानववाद का विशद् वर्णन है। पूंजीवाद, समाजवाद, साम्यवाद को उन्होंने भारतीय राष्टÑीय मानस के अनुकूल कभी नहीं माना। जैसा कि अब हम उनके विचारों की सत्यता को अनुभव कर रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, पं. दीनदयाल उपाध्याय के विचारों को साकार रूप से रहे हैं। लेखक ने दीनदयाल जी को आधुनिक भारत का चाणक्य माना है।
दीनदयालजी ने नेहरू की नीतियों को देशहित में नहीं माना था। उन्होंने नेहरू की अंतरराष्टÑीय गुटनिरपेक्ष नीति तथा युद्ध से उदासीन नीति की आलोचना की थी। दीनदयाल जी के शब्दों में, ‘‘किसी भी देश की पर-राष्टÑनीति, राष्टÑ के स्वार्थ की सिद्धि के एकमेव उद्देश्य से तैयार की जानी चाहिए। उसे यथार्थवादी होना चाहिए।’’ दीनदयाल जी के विचार से राष्टÑ की सुरक्षा सर्वोपरि है। उन्होंने लिखा, ‘‘भारत के शांतिपूर्ण दृष्टिकोण की उपेक्षा करके चीन ने तिब्बत को गुलाम बना लिया। नेपाल से संधि करते समय भारत के हितों का ध्यान नहीं रखा। बर्मा तथा भारत के पूर्वोत्तर राज्यों की बहुत जमीन हड़प ली। हम पंचशील पर भरोसा किए बैठे रहे।’’
पुस्तक में दीनदयाल जी के बारे में कुछ प्रमुख लोगों के विचार भी हैं। तत्कालीन सरकार्यवाह बालासाहब देवरस कहते हैं, ‘उन्हें देखकर हमें राष्टÑीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार जी का स्मरण हो आता था। ...डॉक्टर जी की कर्तव्यनिष्ठा लोगों को चुम्बक की तरह आकर्षित करती थी। इसी प्रकार दीनदयालजी भी सबको आकर्षित करते थे। मैं उन्हें तीस वर्षों में बड़े समीप से जानता था। मैंने उन्हें एक बार भी यह कहते नहीं सुना कि मैंने यह किया, मैंने वह किया। ‘मैं’ शब्द का वे कदाचित् ही प्रयोग करते थे।’ वहीं रज्जू भैया कहते हैं, ‘‘दीनदयालजी एक अनुपम पुरुष थे और देखने में, रहन-सहन में, बोलचाल में बिल्कुल साधारण। जब कभी घर आते तो हमारे घर की भोजन बनाने वाली ठकुरानी से ब्रज भाषा में कहते कि आज तो उरद की दाल और मक्के की रोटी खिलाओ।’’
पुस्तक में ऐसे विचार अनेक महापुरुषों के दीनदयाल जी पर हैं। इन उद्गारों ने पुस्तक का महत्व अत्यधिक बढ़ा दिया है। यह पुस्तक हर सामाजिक कार्यकर्ता को अवश्य पढ़नी चाहिए। —मायाराम पतंग
 
पुस्तक का नाम : प्रखर राष्टÑभक्त एकात्म मानववाद के प्रणेता पं. दीनदयाल उपाध्याय
लेखक : डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’
प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स (प्रा.) लि. एक्स-30, ओखला इंडस्ट्रियल एरिया, फेज-दो
नई दिल्ली-110020
पृष्ठ : 262
मूल्य : रु. 250/- मात्र