ज्ञानोत्सव ज्ञान-गंगा का मंथन
   दिनांक 27-अगस्त-2019

दीप प्रज्जवलित कर ज्ञानोत्सव का उद्घाटन करते हुए श्री मोहनराव भागवत। साथ में हैं (बाएं से) आचार्य बालकृष्ण,
डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’, श्री दीनानाथ बत्रा, स्वामी अमृतानंदस्वरूप पुरी और श्री अतुल भाई कोठारी।
 
 
नई दिल्ली में आयोजित ज्ञानोत्सव में देशभर के 450 से अधिक कुलपतियों और बड़ी संख्या में भारतीय प्रशासनिक सेवा, भारतीय पुलिस सेवा और राज्य सेवा के अधिकारियों ने शिक्षा में भारतीय परंपरा और संस्कृति को शामिल करने के साथ-साथ प्रतियोगी परीक्षाओं की विसंगतियों पर चर्चा की
अरुण कुमार सिंह
गत 17 और 18 अगस्त को नई दिल्ली में ‘ज्ञानोत्सव : 2076’ का आयोजन हुआ। इसका आयोजन शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास और इंदिरा गांधी राष्टÑीय मुक्त विश्वविद्यालय (इग्नू) द्वारा किया गया था। विशेष बात यही रही कि इस उत्सव में दोनों दिन राष्टÑीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत उपस्थित रहे।
17 अगस्त को देशभर से आए शिक्षाविदों ने मुख्य रूप से इन छह बिंदुओं- मूल्य आधारित शिक्षा, पर्यावरण शिक्षा, चरित्र निर्माण एवं व्यक्तिव विकास की शिक्षा, मातृभाषा में शिक्षा, शिक्षा में भारतीय दृष्टि तथा ज्ञान का समावेश और शिक्षा की व्यावहारिक दृष्टि देने पर चर्चा की। इसके साथ ही नई शिक्षा नीति पर भी विद्वानों ने अपने विचार रखे। 18 अगस्त को ‘भारत में प्रतियोगी परीक्षाएं : राष्टÑीय विमर्श’ विषय पर मंथन हुआ।
उल्लेखनीय है कि ज्ञानोत्सव गत वर्ष से हो रहा है। दिल्ली में पहला ज्ञानोत्सव हुआ था। इसके बाद सालभर देश के अनेक हिस्सों में छोटे-छोटे कार्यक्रम हुए। 2019 में यह दूसरा ज्ञानोत्सव आयोजित हुआ। इसका उद्घाटन राष्टÑीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत ने दीप प्रज्जवलित कर किया। इग्नू स्थित डॉ. आंबेडकर सभागार में आयोजित उद्घाटन समारोह में केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’, पतंजलि योग विद्यापीठ के कुलपति आचार्य बालकृष्ण, इग्नू के कुलपति डॉ. नागेश्वर राव, शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के अध्यक्ष श्री दीनानाथा बत्रा, राष्टÑीय सचिव श्री अतुल भाई कोठारी, अमृता विश्वविद्यापीठम्, कोयंबतूर के अध्यक्ष स्वामी अमृतानंदस्वरूप पुरी उपस्थित थे।
ज्ञानोत्सव की भूमिका रखते हुए श्री अतुल भाई कोठारी ने कहा कि शिक्षा में बदलाव के बिना देश नहीं बदल सकता है। आज देश में जितनी भी समस्याएं दिख रही हैं, उनके पीछे हमारी गलत शिक्षा नीति है। इस नीति को बदलकर ही हम देश को आगे बढ़ा सकते हैं। उन्होंने कहा कि मां और मातृभाषा का कोई विकल्प नहीं हो सकता है। इसलिए शिक्षा मातृभाषा में हो और मूल्याधारित हो। इन्हीं बिंदुओं पर मंथन करने और समाधान निकालने के लिए यह आयोजन हो रहा है। आचार्य बालकृष्ण ने कहा कि शिक्षा में सुधार के लिए तात्कालिक और दीर्घकालिक योजना की जरूरत है। तात्कालिक रूप से विद्यालयों में प्रार्थना की परंपरा शुरू होनी चाहिए, योग की शिक्षा भी दी जा सकती है। विद्यालयों में जड़ी-बूटियों की भी जानकारी दी जा सकती है। इससे हमारे प्राचीन मूल्य बचेंगे और लोग स्वस्थ भी रहेंगे। डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ ने कहा कि अपने ज्ञान-विज्ञान को नवाचार के जरिए दुनिया में ले जाने की आवश्यकता है। जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान के बाद अब जय अनुसंधान की बात होनी चाहिए। मूल्यों की कमी वाली शिक्षा कटी पतंग की तरह है। हम जमीन पर रहकर ऊंचाई को छूने का प्रयास करें और यह जमीन है हमारे मूल्य, हमारी संस्कृति। इसलिए शिक्षा में मूल्य और संस्कृति शामिल हों। उन्होंने संस्कृत को देश की आत्मा बताते हुए कहा कि इसकी जानकारी के बिना नई पीढ़ी अपने अमूल्य शास्त्रों के ज्ञान से वंचित रह जाएगी।
इस दिन के दूसरे सत्र में नवाचार और क्रियान्वयन पर प्रतिनिधियों और वक्ताओं ने चर्चा की। साथ ही शिक्षा में भारतीयता लाने के लिए कार्य कर रहे कुछ लोगों ने अपने अनुभव भी सुनाए। आईआईटी, दिल्ली के प्रोफेसर वीरेंद्र विजय ने बताया कि उन्नत भारत अभियान के तहत अब तक 2,124 कॉलेज 11,000 गांवों को गोद ले चुके हैं। उन गांवों में विद्यार्थी जाते हैं और उनके समग्र विकास के लिए योजनाओं के क्रियान्वयन में मदद करते हैं। सागर विश्वविद्यालय के अजय तिवारी ने बताया कि उनके विश्वविद्यालय में आपदा प्रबंधन का प्रशिक्षण नि:शुल्क दिया जाता है। गुजरात कॉलेज, अमदाबाद के एसोसिएट प्रोफेसर जयेंद्र सिंह जाधव ने बताया कि इन दिनों छह विद्यालयों में श्रद्धा अभियान चल रहा है। इसमें बच्चों को अपनी संस्कृति से जोड़ने का कार्य किया जाता है। इसके बहुत अच्छे परिणाम निकल रहे हैं। राष्टÑीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान के अध्यक्ष डॉ. चंद्रप्रकाश शर्मा ने बताया कि इस संस्थान के जरिए अब बच्चे वेद विषय में 10वीं और 12वीं कर रहे हैं।
इस सत्र की अध्यक्षता उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री डॉ. दिनेश शर्मा ने की। उन्होंने कहा कि शिक्षा को व्यवसाय से नहीं जोड़ने के कारण हम उपाधिधारी बेरोजगार पैदा कर रहे हैं। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष डॉ. डी.पी. सिंह ने कहा कि देश को भारत-केंद्रित शिक्षा की जरूरत है। हमें हजारों स्वामी विवेकानंद, डॉ. राधाकृष्णन, पं. मदनमोहन मालवीय चाहिए, तभी शिक्षा में भारतीयता आ सकती है।

 
 
श्रीमती अनीता शर्मा को सम्मानित करते हुए श्री मोहनराव भागवत। साथ में हैं श्री दीनानाथ बत्रा व श्री अतुल कोठारी।
ज्ञानोत्सव के समापन समारोह में देशभर से आए प्रतिनिधि
 
इस दिन के समापन सत्र को संबोधित करते हुए श्री मोहनराव भागवत ने कहा कि शिक्षा का क्षेत्र अभी भी पूरी तरह शासन के हाथ में नहीं है। बहुत कुछ समाज के हाथ में है। इसलिए इस क्षेत्र में समाज के प्रयास से ही बदलाव आ सकता है। अच्छी बात यह है कि ज्यादातर लोग शिक्षा में परिवर्तन चाहते हैं। इसलिए परिवर्तन संभव है। उन्होंने यह भी कहा कि मन से जो परिवर्तन होता है, वह टिकाऊ होता है। परिवर्तन का काम सत्यता और धैर्य के साथ करना होगा। उन्होंने यह भी कहा कि शिक्षा में प्रयोगशीलता पर बल देना होगा, तभी हम इसके उद्देश्य को प्राप्त कर सकते हैं।
इसी दिन शाम को पूसा संस्थान में ‘शिक्षा में भारतीयता’ विषय पर एक गोष्ठी संपन्न हुई। इसके मुख्य वक्ता थे सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत। उन्होंने कहा कि जिस शिक्षा में भारत की संस्कृति, भारत की परंपरा, भारत की भाषा-बोली, भारत के भजन और भोजन के बारे में नहीं बताया जाता है, वह भारत की शिक्षा नहीं है। शिक्षा का उद्देश्य है स्वयं को जानना। इसलिए शिक्षा स्वयं को गौरव अनुभव कराने वाली हो। उन्होंने यह भी कहा कि बच्चों को ऐसी शिक्षा देनी होगी कि वे अपने जीवन में आने वाली समस्याओं का सामना अच्छी तरह कर सकें। उन्होंने कहा कि शिक्षा केवल साक्षरता नहीं है। शिक्षा से विद्या, विद्या से ज्ञान और ज्ञान से जीवन के संघर्षों से मुक्ति मिलती है। मुक्त तो वही होता है, जो स्वतंत्र होता है। वह स्वतंत्रता तब अनुभव होती है जब हम अपनी चीजों को गौरव की भावना से देखते हैं। यह भावना विकसित होते ही हम स्वावलंबी होते हैं और फिर मुक्त हो जाते हैं और यह भावना भारत-केंद्रित शिक्षा से आती है। इस अवसर पर शिक्षाविद् डॉ. सीतानाथ गोस्वामी और श्रीमती अनीता शर्मा को पं. मदन मोहन मालवीय सम्मान से सम्मानित किया गया। साथ ही दो पुस्तकों (‘शिक्षा आयाम और विकल्प’ तथा ‘भारत में प्रशासनिक सेवाएं : मिथक और यथार्थ’) का लोकार्पण भी सरसंघचालक के करकमलों से कराया गया।
दूसरे दिन यानी 18 अगस्त को ‘भारत में प्रतियोगी परीक्षाएं : राष्टÑीय विमर्श’ पर चर्चा हुई। चर्चा को तीन समूहों में बांटा गया था। पहले समूह में सिविल सेवा की परीक्षाओं की विसंगतियों पर वक्ताओं ने विचार रखे और उनके समाधान के सुझाव भी दिए। इस चर्चा में बड़ी संख्या में वर्तमान और पूर्व आईएएस और आईपीएस अधिकारी शामिल हुए। दूसरे समूह में राज्य लोकसेवा आयोग की परीक्षाओं पर मंथन हुआ। तीसरे समूह में कर्मचारी चयन आयोग द्वारा आयोजित होने वाली परीक्षाओं के साथ-साथ बैंकिंग और रेलवे की परीक्षाओं के संदर्भ में विचार-विमर्श किया गया।
समापन सत्र में श्री मोहनराव भागवत का उद्बोधन हुआ। उन्होंने कहा कि कोई व्यवस्था यंत्रवत् नहीं चल सकती है। समय के अनुसार उसमें बदलाव किया ही जाना चाहिए। प्रशासनिक सेवाओं में जहां भी सुधार की जरूरत है, वहां सुधार हो। उन्होंने अंग्रेजी के बढ़ते प्रभाव के संदर्भ में कहा कि जो काम मैकाले नहीं कर सका, वह काम आज का अंग्रेजी माहौल कर रहा है। बच्चे मम्पी-पापा बोल रहे हैं, घरों से माता-पिता जैसे शब्द गायब हो रहे हैं। यह अपनी परंपरा और संस्कृति के अनुकूल नहीं है। उन्होंने कहा कि अंग्रेजी का विरोध नहीं है, लेकिन जहां उसकी जरूरत है, वहीं उसका इस्तेमाल होना चाहिए। जहां हमारी भाषा चल सकती है, वहां अपनी ही भाषा का प्रयोग होना चाहिए।
इस अवसर पर नेशनल टेस्टिंग एजेंसी के महानिदेशक डॉ. विनीत जोशी मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थे।

जिस शिक्षा में भारत की संस्कृति, भारत की परंपरा, भारत की भाषा-बोली, भारत के भजन और भोजन के बारे में नहीं बताया जाता है, वह भारत की शिक्षा नहीं है।
— मोहनराव भागवत, सरसंघचालक, रा.स्व.संघ

अपने ज्ञान-विज्ञान को नवाचार के जरिए दुनिया में ले जाने की आवश्यकता है। जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान के बाद अब जय अनुसंधान की बात होनी चाहिए।
— डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’, केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री

शिक्षा में सुधार के लिए तात्कालिक और दीर्घकालिक योजना की जरूरत है। तात्कालिक रूप से विद्यालयों में प्रार्थना की परंपरा शुरू होनी चाहिए, योग की शिक्षा भी दी जा सकती है।
— आचार्य बालकृष्ण, कुलपति, पतंजलि योग विद्यापीठ

मां और मातृभाषा का कोई विकल्प नहीं हो सकता है। इसलिए शिक्षा मातृभाषा में हो और मूल्याधारित हो।
— अतुल भाई कोठारी, राष्टÑीय सचिव, शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास