सेकुलर चेहरों का सच
   दिनांक 27-अगस्त-2019
अवधेश कुमार
कांग्रेस सहित तमाम सेकुलरदलों का अनुच्छेद-370 एवं तीन तलाक जैसे राष्ट्र एवं समाज से जुड़े अहम विधेयकों जैसा रवैया रहा, वह साफ तौर पर उनकी तुष्टीकरण की राजनीति को दर्शाता है। जनता की मनोभावना और राष्ट्रहित के विपरीत बर्ताव करने वाले ये तमाम मुसिलम परस्त दल बेनकाब हो चुके हैं
 
भारत के लिए अब 30 जुलाई,2019 और 6 अगस्त, 2019 दो ऐसे ऐतिहासिक दिवस हो गए हैं, जिनको इतिहास के अध्याय से मिटाया नहीं जा सकता। 30 जुलाई को भारत की संसद के उच्च सदन यानी राज्यसभा ने एक साथ तीन तलाक को अपराध बनाने वाला विधेयक पारित कर दिया तो 6 अगस्त को लोकसभा ने जम्मू-कश्मीर के लिए नासूर बने अनुच्छेद- 370 का अंत किया। 30 जुलाई को राज्यसभा से तीन तलाक यानी मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) विधेयक, 2019 पारित होने के साथ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कई ट्वीट किए। एक ट्वीट में उन्होंने कहा कि एक मध्यकालीन कुप्रथा को इतिहास के कूड़ेदान में फेंक दिया गया है। उन्होंने लिखा कि ‘तीन तलाक विधेयक का पास होना महिला सशक्तिकरण की दिशा में बहुत बड़ा कदम है। तुष्टीकरण के नाम पर देश की करोड़ों माताओं-बहनों को उनके अधिकार से वंचित रखने का पाप किया गया। मुझे इस बात का गर्व है कि मुस्लिम महिलाओं को उनका हक देने का गौरव हमारी सरकार को प्राप्त हुआ है।’ उन्होंने एक ट्वीट में यह भी कहा कि ‘हमने इस विधेयक को पारित करने के साथ ही इतिहास की गलतियों को सुधारा है। आज करोड़ों मुस्लिम माताओं-बहनों की जीत हुई है और उन्हें सम्मान से जीने का हक मिला है। सदियों से तीन तलाक की कुप्रथा से पीड़ित मुस्लिम महिलाओं को आज न्याय मिला है।’
प्रधानमंत्री के ये सारे ट्वीट बिल्कुल सही थे। प्रधानमंत्री के नाते ऐसे समय वे इसी प्रकार का संदेश दे सकते थे। किंतु एक ऐसी घृणित प्रथा, जिसे उच्चतम न्यायालय गैर इस्लामिक और संविधान विरोधी करार दे चुका है उसे कानून का रूप देने में हमारे राजनीतिक दलों ने जितनी बाधाएं खड़ी कीं वे इतिहास का निस्संदेह, शर्मनाक और डरावना अध्याय हैं। इससे इन दलों और नेताओं का वास्तविक चेहरा उजागर होता है। सेकुलरवाद के झंडाबरदार बनने वाले दलों और नेताओं ने इसके विरुद्ध जिस तरह का मोर्चा खोला उसे याद रखना जरूरी है। अगर इन्होंने तष्टीकरण और वोट बैंक की गंदी राजनीति न की होती तो मोदी सरकार-1 के दौरान ही यह कानून बन गया होता। ध्यान रखिए, यह विधेयक उस दौरान भी लोकसभा में दो बार पास हो चुका था- पहली बार 28 दिसंबर, 2017 को तथा दूसरी बार 27 दिसंबर, 2018 को। राज्यसभा में दोनों बार बहुमत न होने के कारण भाजपा मजबूर हो गई। हालांकि सुकुलर दलों का रवैया इस बार भी यही था। आखिर राज्यसभा में भी 84 मत इसके विरोध में तथा 99 पक्ष में पड़े। ये 84 सांसद कौन हैं? सारे सदस्यों ने मतदान में हिस्सा क्यों नहीं लिया? सच कहा जाए तो यदि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हर हाल में इसे पारित कराने का संकल्प नहीं दिखाया होता तो मुस्लिम मतों के लालची दलों ने इस मजहबी, संवैधानिक और लैंगिक अपराध को जारी रखने के लिए कोई कसर नहीं उठा रखी थी। लोकसभा में तो इसे पेश करने में ही बाधा डाली गई। अंतत: अध्यक्ष को इसे पेश कराने के लिए मतदान कराना पड़ा। ये कौन दल हैं? कांग्रेस का नंबर इसमें सबसे ऊपर आता है। पिछली सरकार के दौरान पहली बार उसने लोकसभा से बहिर्गमन किया लेकिन राज्यसभा में नीति बदलकर विरोध कर दिया। इस बार वह दोनों सदन में विरोध में खड़ी थी तथा अन्य दलों को इसके लिए प्रेरित कर रही थी कि किसी तरह इस अपराध का अंत न हो। तृणमूल कांग्रेस, एनसीपी यानी राकांपा, बसपा, सपा, टीआरएस, तेलुगू देशम, द्रमुक, वामदल, आम आदमी पार्टी ही नहीं भाजपा के साथी दलों अन्नाद्रमुक, जद-यू जैसे ने भी इसके खिलाफ ऐसे भाषण दिए मानो यह अपराध का अंत नहीं, अपराध को बढ़ावा देने वाला, महिलाओं के साथ न्याय नहीं अन्याय करने वाला, इस्लाम की मान्यता के अनुसार नहीं उसकी मान्यता को नकारने वाला कानून बन रहा हो।
अनुच्छेद-370 का अंत करने वाले विधेयक को तो राज्यसभा मेंं पेश करते ही कोहराम मच गया था। कोई आरंभ में समझने के लिए तैयार नहीं था कि यह देश की एकता-अखंडता को सुनिश्चित करने का विधायी कदम है। पाकिस्तान का विरोध तो बाद में आया। हमारे राजनीतिक दलों ने इसके विरोध में दुष्प्रचार पहले आरंभ कर दिया। पूरा माहौल ऐसा बनाया गया जिससे केवल पाकिस्तान, चीन, जम्मू-कश्मीर के भारत विरोधी अलगाववादी और आतंकवादी समर्थकों को लाभ पहुुंचा। इसके पहले भी भाजपा ने आंतकवाद के विरुद्ध संघर्ष को ताकत देने के लिए जो दो विधेयक पेश किए थे उसमें भी इनका रवैया ऐसा ही था। इनमें एक था, एनआईए यानी राष्ट्रीय जांच एजेंसी को थोड़ा ज्यादा अधिकार देने व उसकी कार्यप्रणाली को सहज बनाने वाला तथा गैर कानूनी गतिविधियां निरोधक कानून में संशोधन संबंधी। इनका जिस तरह से विरोध हुआ वह दिल दहलाने वाला था। एनआईए का गठन 26 नवंबर, 2008 को मुंबई हमले के बाद संप्रग सरकार ने ही किया था। अगर एनआईए पिछले एक दशक से ज्यादा समय तक काम करने के अनुभवों से कुछ बदलाव चाहती थी तो इसमें समस्या क्या हो सकती थी? उसके लिए गैर कानूनी गतिविधियां निरोधक कानून में भी संशोधन जरूरी था। यहां भी वे सारे दल विरोध में खड़े हो गए, जिनका उल्लेख ऊपर किया गया। यह तो गृह मंत्री अमित का ठोस वक्तव्य था कि उन्होंने दोनों सदन में उनके भाषण से माहौल ऐसा बन गया कि जो भी इसका विरोध करेगा उसे आतंकवाद का समर्थक माना जाएगा। ऐसा न होता तो ये दल राज्यसभा में इन विधेयकों को भी पारित न होने देते।
यहां एआईएमआईएम के नेता असदुद्दीन ओवैसी की चर्चा इसलिए करना आवश्यक नहीं है क्योंकि उनका पक्ष पहले से सामने है। वे देश में मुसलमानों के सबसे बड़े नेता बनने की महात्वाकांक्षा के साथ सांप्रदायिक वातावरण निर्मित करने के लिए अपने भड़काऊ भाषणों तथा संघ और भाजपा के अंध विरोध में आग उगलने का रिकॉर्ड बना रहे हैं। इसलिए उनका पक्ष तो जाना हुआ है। किंतु कांग्रेस ने तो सबसे ज्यादा समय तक इस देश में शासन किया है। उसकी भूमिका सामाजिक बदलाव, आतंकवाद विरोधी लड़ाई और जम्मू-कश्मीर के वास्तविक एकीकरण की विरोधी क्यों हुई? तीनों मामलों पर उनके नेताओं के भाषण सुनिए तो आपको आश्चर्य होगा कि कई बिंदुओं में ओवैसी और उनके बीच बिल्कुल समानता थी। जद (यू) बिहार में भाजपा के साथ सरकार चला रही है। वह लोकसभा चुनाव भाजपा के साथ लड़ी तथा मोदी के नाम पर ही उसके ज्यादातर सांसद जीत कर आए हैं। नीतीश कुमार कहते हैं कि वे सेकुलरवाद, सामाजिक न्याय, लैंगिक समानता और देशहित से कभी समझौता नहीं कर सकते। तो फिर एक साथ तीन तलाक जैसे सेकुलर विरोधी, मुस्लिम महिलाओं के प्रति अन्याय को खत्म करने वाले विधेयक का समर्थन उन्होंने क्यों नहीं किया? जद (यू) के लोकसभा सांसद राजीव रंजन सिंह ने इसके विरोध में जो भाषण दिया उसे पूरे देश ने सुना। इसी से साफ हो गया कि जद (यू) का निशाना कहां था।
जद (यू) तो एक उदाहरण है। इस विधेयक का विरोध करने वाले सारे दलों का एकमात्र मकसद यही था कि खूद को सेकुलर दिखाते हुए राष्ट्रहित से जुड़े इन विधेयकों में बाधा डालें। यह जानते हुए कि तीन तलाक को कड़े कानून बनाए बगैर नहीं रोका जा सकता। वे केवल मुस्लिम वोट के कारण सरकार का विरोध करते रहे। वामदल समान नागरिक कानून की वकालत करते रहे हैं। तो फिर इस विधेयक के विरोध करने का कोई कारण नहीं होना चाहिए था। कितु उन्होंने किया। इन सारे दलों के नेताओं से यह तो पूछा जाना चाहिए कि क्या आपका सेकुलरवाद यही है? मुस्लिम महिलाएं एवं मुसलमानों के अंदर उदारवादी तबके को इसका संज्ञान अवश्य लेना चाहिए। उनको सोचना चाहिए कि क्या ऐसे दलों का समर्थन किया जाए? मजे की बात देखिए कि कुछ दलों ने विरोध किया तो विरोध में मतदान भी किया लेकिन कुछ ने विधेयक का विरोध किया और दूसरी और मतदान के समय सदन से बाहर निकल गए। क्यों? क्योंकि इनमें से ज्यादातर का ध्यान सामाजिक सुधार और सकुलरवाद नहीं केवल वोटों पर था। यह कट्टरपंथी मुस्लिम नेताआेंं की नजर में उनका विरोधी नहीं बनना चाहते थे लेकिन एक भय यह भी था कि कहीं हिन्दू मत ही न खिसक जाए। इसलिए ये दो नावों की सवारी करते रहे। इस तरह विरोधी दलों के साथ सपा, तृणमूल कांग्रेस, द्रमुक, बसपा, टीआरएस, जद (यू), अन्नाद्रमुक, तेदेपा दलों का असली चेहरा देश के सामने आ गया है। कई बड़े नेता दोनों सदन में अनुपस्थित रहे। किस भय से? कुछ पार्टियों में मतभेद हो गया। क्यों?
अब आएं अनुच्छेद-370 पर। जद (यू) के ही कई नेता निजी बातचीत में कहते रहे कि समझ नहीं आता कि नीतीश कुमार को अनुच्छेद-370 पर क्या समस्या है। इसका न तो सेक्युलरवाद से संबंध था न मुस्लिम मतों से। यह तो जम्मू- कश्मीर के संदर्भ में संविधान का एक अस्थायी प्रावधान था जो घातक रूप से देश के अलगाव का कारण बना हुआ था। देश का माहौल देख लीजिए। जनता का अपार बहुमत इस अनुच्छेद के खत्म करने का समर्थन कर रहा है। नेपथ्य से स्वयं प्रधानमंत्री ने विपक्षी दलों के नेताओं से लगातार संवाद कायम रखा और उसके परिणाम आए। कई भाजपा विरोधी दलों ने इस पर अपना मत बदल लिया जिसने नहीं बदला उसमें भी दो खेमे हो गए। बसपा, आम आदमी पार्टी तक ने इसका समर्थन कर दिया तो सपा के मुलायम सिंह ने विधेयक के पक्ष में मतदान किया। कांग्रेस के अंदर दो स्वर थे। यह अलग बात है कि दोनों सदनों में पार्टी ने विरोध में मतदान किया। वामदलों की भी यही स्थिति रही। वामदल अपनी नीतियों और व्यवहार के कारण देश में अपने अस्तित्व बचाने के पीड़ादायी दौर से गुजर रहे हैं। किंतु उनके नेताओं को लगता है कि संघ-भाजपा विरोध का एजेंडा चलाते रहना है।
वास्तव में जिन चार विधेयकों की हमने चर्चा की वे सब अब पारित हो गए तो इसमें विरोधियों की कृपा नहीं है। सेकुलरवाद और प्रगतिशीलता तथा जनहित और देशहित का उनका पाखंड देश के सामने आ गया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार के लंबे समय के परिश्रम के कारण देश में इस समय मजहबी तुष्टीकरण व आतंकवाद के खिलाफ ऐसा वातावरण बना हुआ है जिससे राजनीति में परिवर्तन का दौर देखने में आ रहा है।