पहलू पर मातम, हरीश पर आंख बंद
   दिनांक 27-अगस्त-2019
राघवेंद्र सिंह

 
 
हरीश के पिता रत्तीराम , जिन्होंने आत्महत्या कर ली / मुसलमानों की भीेड़ द्वारा मारे गए हरीश जाटव
अलवर में मुसलमानों की भीड़ ने हरीश को पीट-पीट कर मार डाला। फिर उनके पिता रत्तीराम पर मामला वापस लेने का दबाव डाला। दबाव से टूट कर उन्होंने भी अपनी जान दे दी, लेकिन कांग्रेस सरकार खामोश है
 
 
मणिपुर के बाद राजस्थान में भीड़ द्वारा की जाने वाली हत्या (मॉब लिंचिंग) के खिलाफ कानून बनाने वाली कांग्रेस सरकार का दोहरा रवैया सामने आया है। एक तरफ पहलू खान मामले के आरोपियों की रिहाई के बाद मामला फिर से खोलने के लिए सरकार ने एसआईटी का गठन किया है, वहीं दूसरी ओर अलवर जिले में ही भीड़ की पिटाई से हुई हरीश जाटव की मौत को पुलिस ‘मॉब लिंचिंग’ नहीं मान रही है। एक ही जिले के इन दोनों मामलों में राजस्थान की कांग्रेस सरकार खुलेआम मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति कर रही है।
दर दर भटक रहा हिंदू परिवार
उल्लेखनीय है कि 16 जुलाई को अलवर जिले के झिवाना गांव निवासी हरीश जाटव अपनी मोटरसाइकिल से भिवाड़ी से अपने गांव जा रहे थे। रास्ते में उनकी मोटरसाइकिल एक मुस्लिम महिला से टकरा गई, जिसमें महिला को कोई खास चोट नहीं आई। लेकिन कुछ ही देर में मुस्लिम महिला के परिजन और मुस्लिम समुदाय के लोग एकत्रित हो गए और उन्होंने हरीश की बेरहमी से पीट-पीट कर हत्या कर दी। पर यह खबर सेकुलर मीडिया में जगह नहीं बना पाई। इसका एक ही कारण था हरीश हिंदू थे। यदि वे मुसलमान होते तो सेकुलर मीडिया इस खबर को मिर्च-मसाला डालकर छापता। लेकिन बीबीसी, द वायर, एनडीटीवी जैसे मीडिया संस्थानों के कथित सेकुलर पत्रकारों के मुंह पर ताले लग गए। हरीश की हत्या को लेकर स्थानीय हिंदू संगठनों ने आवाज उठाई तो समाज भी आगे आया और कार्रवाई की मांग को लेकर दबाव बनाने लगा। कई दिन तक चले विरोध प्रदर्शन के बाद आखिरकार हत्या का मामला दर्ज तो हुआ लेकिन कार्रवाई देखें तो ढाक के तीन पात। आरोपी मुस्लिम तत्व आज भी बेखौफ खुलेआम घूम रहे हैं। सरकार के इस दोहरे मापदंड पर विपक्ष के नेताओं का कहना है कि प्रदेश सरकार वर्ग विशेष के लिए काम कर रही है। सरकार एक तरफ तो ‘मॉब लिंचिंग’ के लिए कानून बना रही है, पहलू खान मामले की दोबारा जांच करा रही है, वहीं दूसरी तरफ अलवर के ही हरीश जाटव मामले में कार्रवाई नहीं कर रही है।
किसी का दिल नहीं पसीजा
हरीश के नेत्रहीन पिता रत्तीराम जाटव, उनकी पत्नी और भाई हत्यारों की गिरफ्तारी की मांग को लेकर गुहार लगाते रहे, लेकिन पुलिस ने कुछ नहीं किया। ऊपर से उन पर मुकदमा वापस लेने का दबाव भी बनाया गया। इसमें स्थानीय एक जनप्रतिनिधि की भूमिका संदिग्ध लगती है। बताया जा रहा है कि जमालुद्दीन नाम के एक व्यक्ति ने रत्तीराम को धमकी दी कि वे मामले को वापस ले लें, नहीं तो उन्हें परिवार सहित खत्म कर दिया जाएगा। रत्तीराम इस दबाव और अन्याय को झेल नहीं पाए और उन्होंने 15 अगस्त को जहर खाकर जान दे दी। लेकिन इस मौत पर भी सेकुलर चुप हैं। इसलिए , क्योंकि मरने वाले हिंदू थे।