मुसलमानों को अपना ‘हीरो’ बदलना होगा
   दिनांक 27-अगस्त-2019
               
        आक्रांताऔरंगजेब को रहबर यानी पैगम्बर बताता एक पोस्टर
ताबिश सिद्दिकी
जब तारिक फतेह ने भारत में अपना शो ‘फतेह का फतवा’ शुरू किया था, तो लगभग हर एपिसोड में कोई इस्लामिक आलिम कहता था कि वह ‘सेक्युलर’ है। जवाब में वे इस्लामिक आलिमों से एक ही बात बार-बार पूछते थे, ‘‘आप गौरी, औरंगजेब, तैमूरलंग को अपना हीरो मानते हैं कि नहीं?’’ पहले तो आलिम बिदकते थे। बाद में इतना गुस्सा हो जाते कि शो बंद हो जाता था। फतेह का हर शो में यह पूछना मुझे अजीब लगता था। मगर आलिमों की छटपटाहट से समझ आने लगा कि वे ऐसा क्यों कर रहे हैं। जाहिर है 70 साल के तारिक फतेह को हम और आपसे ज्यादा ‘अतिवादियों’ की समझ है। इन्हीं मजहबी जुनूनियों ने उन्हें देश से भागने पर मजबूर किया। वे बेहतर समझते हैं कि इनके जूनून की जड़ कहां है?
औरंगजेब पर मैंने पोस्ट लिखी। औरंगजेब न तो पैगम्बर है, न औलिया। पर बहुत से मुसलमान उसे ‘रहमतुल्लाह अलैह’ बोलते हैं। यह वो लकब/टाइटल है जो किसी संत को दिया जाता है। औरंगजेब पर पोस्ट लिखने का मेरा यही मकसद था कि उसे ‘संत’ क्यों घोषित किया गया, जबकि वह जालिम था? उसका भाई दारा शिकोह कहीं अधिक ‘इनसान और संत तुल्य’ था। उसे क्यों नहीं ‘रहमतुल्लाह अलैह’ बोला जाता है? मेरी बात उनको खल गई जो तारिक फतेह के इसी सवाल से बावले हो जाते थे। कितना भी लीप-पोत लें, मगर एक बात स्वीकार करनी ही पड़ेगी कि दुनिया में मुसलमान ही ऐसे होते हैं जिनके संत, हीरो, मजहबी रहनुमा ‘अत्यधिक हिंसक’ होते हैं। प्रेम, भाईचारा व इंसानियत सिखाने वालों को यह कौम व इसके रहनुमा कभी अपना हीरो नहीं बनाते हैं। चाहे रूमी हों या कलाम, सरमद हों या मंसूर। इनके बारे में किसी मदरसे और इस्लामिक स्कूल में भी नहीं पढ़ाया जाता है। इस्लामिक इतिहास की गौरवगाथा तैमूर, गजनवी, औरंगजेब की कहानियों से भरी मिलती है। मैंने आज तक किसी मस्जिद, किसी मदरसे में रूमी की कभी तारीफ नहीं सुनी। न किसी मौलाना को कहते सुना कि ‘रूमी की तरह बनो।’ इस कौम में ‘अच्छाई’ जोड़ने-घटाने का पैमाना ‘मजहब’ होता है। किस संत ने सबसे ज्यादा लोगों को ‘मुसलमान’ बनाया, वह इनका सबसे बड़ा संत होता है। किस बादशाह ने सबसे ज्यादा लोगों को जबरदस्ती ‘इस्लाम’ कुबूल करवाया, वह इनका सबसे बड़ा बादशाह होता है। जो भाईचारा व दो धर्मों को जोड़ने की बात करता है, वह इनका हीरो नहीं होता है। अकबर को कभी ये रहमतुल्लाह अलैह नहीं कहेंगे, न दारा शिकोह को। कलाम को कभी अपना हीरो नहीं मानेंगे, न ही उसके आगे ‘रहमतुल्लाह अलैह’ लगाएंगे।
तारिक फतेह, हसन निसार जैसे लोग इस बात को समझते हैं। तभी वे इस बात पर जोर देते हैं कि मुसलामानों को अपना हीरो बदलना चाहिए। ये जहनियत बदली जानी चाहिए कि खूनी, कातिल, लुटेरे हमारी कौम के हीरो कहलाएं व जिन्होंने इंसानियत की बात की, उन्हें इस्लाम के इतिहास से बाहर फेंक दिया जाए। जब तक आप ‘हीरो’ सही नहीं चुनेंगे, तब तक सही रास्ते पर नहीं चलेंगे। जाहिर है औरंगजेब यदि आपके लिए ‘संत’ है तो आपके बच्चे वैसा ही ‘संत’ बनना चाहेंगे। उन्हें रूमी व कलाम कायर दिखाई देंगे। एक वीडियो में जावेद अख्तर बता रहे थे कि एक बार वे मुंबई के मुस्लिम इलाके में किसी समारोह में हिस्सा लेने गए। क्षेत्र के आलिम व काबिल मंच से चिल्ला-चिल्ला कर बता रहे थे कि ‘‘ओसामा बिन लादेन निर्दोष है। उसने कोई गुनाह नहीं किया। अमेरिका उन्हें फंसा रहा है।’’ जब अख्तर की बारी आई तो उन्होंने लोगों से कहा, ‘‘मानता हूं कि ओसामा निर्दोष है, उसने कुछ नहीं किया। मगर बताइये कि उसने ऐसा किया क्या है जिसकी वजह से आपने उसकी तस्वीरें घरों में टांग रखी हैं? उसने ऐसा क्या किया है जिसकी वजह से आप उसे हीरो समझ रहे हैं?’’ उनकी बात सुनकर सब चुप हो गए। इसलिए मैं कहता हूं पाठ्यक्रम से लुटेरों-हत्यारों की गौरव गाथाओं को बाहर फेंका जाए। ये खुद नहीं बदलेंगे, प्रशासन को ये काम काम करने होंगे।
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