बेरहम पाकिस्तानी फौज दस साल के बच्चे पर भी करती है जुल्म
   दिनांक 29-अगस्त-2019
क्वेटा से हुनक बलोच
 पाकिस्तान नहीं चाहता कि बलूचिस्तान के लोग पढ़-लिखकर यह जानें कि उनके साथ अलग-अलग हुकूमतों ने कैसा सुलूक किया, कितने जुल्म ढाए। इसी सोच के तहत पिछले कुछ दिनों के भीतर फौज ने यहां के विभिन्न इलाकों से कई छात्रों को अगवा कर लिया। और तो और फौजी एक दस साल के मासूम को भी उठा ले गए

अली, नईम साबिर एवं पीरजन बशीर पाकिस्तानी फौज की बर्बरता के शिकार (बाएं से)
दहशतगर्दी और खौफ के बूते बलूचिस्तान में आजादी की जद्दोजहद को कुचलने का मंसूबा पाले पाकिस्तान को कागज-कलम के हथियार से डर लगता है। वह नहीं चाहता कि यहां के लोग तालीम का इल्म हासिल करें; जो सुनते-देखते आए हैं, उसकी जड़ें दस्तावेजों में तलाश सकें। यही वजह है कि नौजवान शुरू से ही पाकिस्तान की बदनाम फौज के निशाने पर रहे हैं, खासकर वे लोग जो पढ़ने-लिखने का जज्बा रखते हैं। अभी पिछले कुछ दिन छात्रों पर भारी रहे। फौज और खुफिया एजेंसियां बलूचिस्तान के अलग-अलग इलाकों से छात्रों को उठा ले गर्इं।
15 अगस्त को पाकिस्तानी फौज ने अवारान के बजदाद इलाके से नईम साबिर को अगवा कर लिया। नईम स्कूल में तालीम ले रहा था। उसके वालिद का नाम मोहम्मद साबिर है। इलाके में ही रहने वाले अख्तर करीम ने कहा, ‘नईम के परिवार वालों का बुरा हाल है। वे समझ नहीं पा रहे कि क्या करना चाहिए। उन्होंने ऐसे तमाम मामलों को देखा है जहां रिपोर्ट लिखाने में ही लोगों के पसीने छूट गए और हुआ कुछ भी नहीं। इससे पहले उनके दूर के एक रिश्तेदार को भी अगवा किया गया था, जिसका आज तक कोई अता-पता नहीं है। ऐसा लगता है कि साबिर भी उन तमाम लोगों में शुमार हो जाएंगे जिन्होंने अपनी एक औलाद को इंसाफ दिलाने की कोशिशों के बजाय परिवार के बाकी लोगों की खैरियत को तरजीह दी।’ इस इलाके से पाकिस्तानी फौज और उसकी खुफिया एजेंसियों ने दो और लोगों को अगवा किया। ये हैं छोटन कीलकोर के रहने वाले इल्मदीन मुस्तफा और बेरोन्त कीलकोर के पीरजान बशीर।
इसके अलावा फौज केच जिले के पहाड़ी इलाके होशाब से 18 अगस्त को तमाम नौजवानों को उठा ले गई। कितने लोग उठाए गए, इसका ठीक-ठीक पता तो नहीं, लेकिन चार के बारे में पुख्ता तौर पर जानकारी मिली है। इनमें से तीन को तो दांब इलाके से ही अगवाकिया गया। ये हैं कहूर (वालिद-मयर), जाला और आलम (वालिद- बहोत)। इनके अलावा होशाब के ही गरोक इलाके से मंजूर को भी उठा लिया गया, जिसके वालिद का नाम वजु है। इसी इलाके के रहने वाले हैं 26 साल के सरफराज, जो क्वेटा में रहकर तालीम हासिल कर रहे हैं। वे कहते हैं, ‘बलूचिस्तान के लिए पाकिस्तानी फौज और एफसी (फ्रंटियर कॉर्प्स) के हाथों अगवा हो जाना कोई नई बात नहीं है। ऐसा अक्सर सुनने को मिल जाता है। लेकिन मुझे लगता है कि एक कौम के लिहाज से यह बड़ी बात है कि 70 साल से सरकारी दहशतगर्दी का शिकार होने के बाद भी इसकी जमीन पर हथियार थामने वाले हाथ कम ही हैं। इसे आप मजबूती कह सकते हैं और कमजोरी भी। मजबूती इसलिए कि तमाम मुश्किलों के बाद भी एक कौम ने अपनी पहचान बनाए रखी, अमन की हामी रही। और कमजोरी इसलिए कि क्या पता अगर पूरी कौम ने हथियारबंद जद्दोजहद का रास्ता अख्तियार किया होता तो आज बलूचिस्तान आजाद हो चुका होता?’ सरफराज की बातें वैसी ही थीं, जैसी किसी भी उस इनसान की होतीं जिसमें अपनी कौमी तारीख की समझ हो, सरकारी दहशतगर्दी के तमाम वाकयों को सरकारी-गैरसरकारी दस्तावेजों से जाना हो। बहरहाल, अब रुख करते हैं एक ऐसे वाकये की ओर जो यह जाहिर करने के लिए काफी है कि बलूचिस्तान को लेकर पाकिस्तान की सोच क्या है और वह किस हद तक बर्बर हो सकता है। उसका नाम है अली। केच जिले के तुरबत इलाके में रहता था। वालिद का नाम अकबर। उम्र महज 10 साल। तालीम के लिए स्कूल में दाखिला लिए ज्यादा वक्त नहीं गुजरा था कि फौज ने उठा लिया। फिर उसे छोड़ दिया गया। लेकिन 10 दिन बाद उसे फिर अगवा कर लिया गया। एक 10 साल के मासूम बच्चे पर जुल्म होने वाले कितने पत्थर दिल होंगे। इसका अंदाजा लगाना कोई मुश्किल काम नहीं है। तुरबत में ही रहने वाले माजिद बलोच कहते हैं, ‘जब फौज ने पहले अली को रिहा कर दिया तो हमने राहत की सांस ली थी। लेकिन दोबारा उसी बच्चे को अगवा कर लिए जाने से एक बात साफ है कि पाकिस्तानी फौज ने उसे किसी गलतफहमी के तहत नहीं उठाया था। वह अली को ही उठाना चाहती थी। क्यों, इसका जवाब तो वही बेहतर दे सकती है। शायद फौज अली को चारे की तरह इस्तेमाल करना चाहती हो, उसके जरिए बलूचों को आगाह करना चाहती हो कि वे आजाद बलूचिस्तान का ख्वाब देखना बंद कर दें, नहीं तो उनके साथ ऐसा ही बुरा सुलूक होगा, जिसका उन्हें इल्म भी नहीं होगा।’ माजिद बलोच उन लोगों में हैं जिन्हें स्कूल-कॉलेज में तालीम हासिल करना नसीब नहीं हुआ। वह जो भी कह रहे हैं, अपने आसपास आए दिन हो रहे वाकयों के मद्देनजर कह रहे हैं। लेकिन उनका कहना काफी हद तक सही है क्योंकि पाकिस्तानी फौज बलूचों के साथ जिस तरह का वहशी सुलूक करती है, उसे देखते हुए यही कहा जा सकता है कि वह चाहती है कि बलूचों पर खौफ का ऐसा माहौल छा जाए जो आजादी के लिए लड़ने की उनकी हिम्मत को तोड़ दे।
इसी मसले पर हमने क्वेटा के बलूचिस्तान विश्वविद्यालय के एक कॉलेज में पढ़ा रहे एक शिक्षक से बात की। वह नरम सोच के और अमन के पैरोकार माने जाते हैं। उनकी सलाह पर हम उनका नाम जाहिर नहीं कर रहे। उन्होंने कहा, ‘अगर कोई ताकत महिलाओं और बच्चों को भी न बख्शे, तो इसका सीधा-सा मतलब यह होता है कि वह सामने वाले को खौफजदा करके उसके हौसले को तोड़ना चाहती है। अफसोस की बात है कि बलूचों के साथ ऐसा ही हो रहा है। फौज ने पाकिस्तान के सियासी हलके को कभी भी बलूचिस्तान के बारे में फैसला करने का हक नहीं दिया। इसी का नतीजा है कि इस्लामाबाद में जिसकी भी हुकूमत रही, बलूचिस्तान की किस्मत में कोई फर्क नहीं आया। यह तो किसी नासमझ की भी समझ में आने वाली बात है कि एक 10 साल का बच्चा दहशतगर्द नहीं हो सकता।’ तो फिर, उस बच्चे को उठाने के पीछे फौज की मंशा क्या हो सकती है, इसके जवाब में वे कहते हैं, ‘इसके लिए आपको तारीख में थोड़ा पीछे जाना होगा। 1971 तक। पाकिस्तान के सियासी लोग और खास तौर पर फौज, बांग्लादेश के वजूद पाने को भुला नहीं पाई है। वह नहीं चाहती कि बलूचिस्तान में वही सब हो जो कभी बांग्लादेश में हुआ। इसी वजह से वह बलूचिस्तान में आजादी की आवाज को सख्ती से बंद करना चाहती है। इसी सिलसिले में वह महिलाओं और बच्चों को निशाना बनाती है जिससे कि बलूचों को दिमागी तौर पर इतना तोड़ दिया जाए कि वे कौमी- आजादी की बात भूल जाएं।’ आपको क्या लगता है, पाकिस्तान इसमें कितना कामयाब हुआ है? वे माथे पर उभर आई शिकन के साथ कहते हैं, ‘अफसोस है कि पाकिस्तान के फौजी नुस्खे से बलूचिस्तान का जो इलाज किया जा रहा है, उसका उलटा असर हुआ है। मर्ज बढ़ गया है और मरीज का सब्र चुकने लगा है। इसे आप खुद महसूस कर सकते हैं।
पाकिस्तानी फौज और चीनी लोगों पर हमले खतरनाक तरीके से बढ़े हैं। बलूचों में हथियार उठाने का जुनून बढ़ता जा रहा है और जान कुर्बान करने वालों की तादाद बढ़ती जा रही है। आपको यह याद रखना चाहिए कि किसी भी मसले का हल बातचीत से ही हो सकता है। लेकिन दिक्कत की बात यह है कि आपने बातचीत की सूरत ही नहीं छोड़ी। बातचीत का माहौल बनाने में भी आपको काफी मशक्कत करनी पड़ेगी।’ यह सही है कि फौजी बूटों ने बड़ी सख्ती से बलूचिस्तान में अमन की किसी भी कोशिश को दबा रखा है और उससे बाहर निकलने के लिए छटपटाती बलूच कौम भी पूरी ताकत लगा रही है। ऐसे में आने वाले समय में आजादी की आवाज और बुलंद ही होगी।