पाकिस्तान का पागलपन
   दिनांक 31-अगस्त-2019
जिस प्रकार अवसाद व्यक्ति को उनींदा या उन्मादी बना देता है उसी प्रकार नकारात्मकता ने पाकिस्तान को अपने घरेलू मसलों के प्रति उदासीन और भारत जैसे पड़ोसी के मुद्दों के प्रति पागलपन की हद तक संवेदनशील बना दिया है

 
भारत द्वारा जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने और इस राज्य के प्रशासनिक पुनर्गठन के बाद पाकिस्तान का तिलमिलाना इसी संदर्भ में समझने की आवश्यकता है। एक माह में अनगिनत देशों के चक्कर लगाने के अलावा संयुक्त राष्ट्र के दरवाजे चार बार खटखटाने से कश्मीर मुद्दे का अंतरराष्ट्रीयकरण तो नहीं हुआ, उलटे दूसरे देशों के मामलों में टांग अड़ाने के लिए पाकिस्तान का पागलपन दुनिया पर जाहिर जरूर हुआ है।
हैरानी नहीं कि इसके बाद दुनिया में पाकिस्तान के अस्तित्व से जुड़े बुनियादी पहलुओं पर मंथन शुरू हो जाए। इस मंथन का पहला सवाल यह होगा कि शेष विश्व के लिए पाकिस्तान क्या है?
आतंकवाद की विषबेल निर्यात करने वाली पौधशाला, परोक्ष सैन्य शासन की प्रयोगशाला या कुछ और..
इस बहस में पाकिस्तान के पक्षकार नि:संदेह उसे केवल एक 'इस्लामी देश' बताने की चेष्टा करेंगे, किंतु मज़हबी आधार पर देश का विभाजन हो जाने के बावजूद आज पाकिस्तान से ज़्यादा मुसलमानों को स्थान
देने वाले भारत का परिदृश्य इस तर्क को खारिज करेगा।
सवाल यह भी उठेगा कि यदि इस्लामी मुल्क का अर्थ 'पाकिस्तान' है तो कौन ऐसा मुल्क बनना चाहेगा, जैसा कि पाकिस्तान आज है।
वैसे, मुल्क के रूप में पाकिस्तान का अस्तित्व और मान्यता छलावा है या असलियत? आधुनिक दुनिया में 'देश' के लिए तय कसौटियों पर इस सवाल का आकलन भी जरूरी हो गया है।
पहली कसौटी भूगोल की है, जोकि किसी भी देश के लिए जरूरी है। पाकिस्तान का अपना भूगोल है, किंतु आप केवल भूखंड को देश नहीं मान सकते! क्योंकि भूगोल के साथ समाज को जोड़ने वाली संस्कृति की जड़ें वहां की संवेदनहीन, जड़ व्यवस्था ने कुचल डाली हैं।
देश के लिए जनसंख्या दूसरा आधारभूत घटकर है। किंतु जिस तरह मकान और घर में फ़र्क़ होता है उसी तरह की बात जनसंख्या और देशनिष्ठ समाज की है। हूजूम देश नहीं होते। देश के साथ उसके समाज को गूंथने वाले कारक परस्पर सौहार्द और देशप्रेम हैं । इनसे देश को सकारात्मकता और ऊर्जा मिलती है। किंतु देशभक्ति का अर्थ मजहबी पागलपन या दूसरे के लिए नफरत नहीं हो सकता। पाकिस्तान में देश के तौर पर उसका यह दूसरा घटक नकारात्मकता की भेंट चढ़ चुका है।इस्लामी कट्टरता और आतंकवाद का समर्थन ही जहां देशभक्ति का पर्याय हो जाए वहां क्या उम्मीद रह जाती है!
ध्यान दीजिए, अंतरराष्ट्रीय वित्त व्यवस्था के लिए खतरा बने धन शोधन, आतंकवाद के वित्त-पोषण आदि पर नजर रखने वाली अंतर सरकारी संस्था फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) ने पाकिस्तान के पेच कसे हैं। एफएटीएफ की नौ देशों वाली एशिया प्रशांत इकाई ने 40 में से 32 मानकों पर पाकिस्तान का आचरण ठीक नहीं पाया।
किसी देश के अस्तित्व के लिए तीसरा अहम अवयव है शासन व्यवस्था। पाकिस्तान में शासन है, परंतु व्यवस्था नहीं है। दुनिया में देशों के पास सेनाएं हैं, पाकिस्तान में सेना के पास एक देश है। लोकतंत्र को फौजी बूटों तले कुचलने का कुचक्र ही वहां अव्यवस्था की जड़ है। हाल में अमेरिकी कांग्रेस के अनुसंधान प्रभाग (सीआरएस) की रिपोर्ट बताती है कि इमरान खान भले कुछ दावा करें, लेकिन उनके शासन में भी सेना (पहले की ही भांति) प्रभावी हस्तक्षेप कर रही है।
सीरिया से श्रीनगर तक के लिए सुबकता और बलूचिस्तान से बेपरवाह पाकिस्तान अंतर्द्वंद्वों में उलझी ऐसी इकाई है, जहां उसे खुद की सुध नहीं, लेकिन दूसरे के मामले उसके बदन में सिहरन पैदा करते हैं।
सवाल है कि अल्पसंख्यकों को पीसने और इस्लामी आतंकवाद को पोसने वाला पाकिस्तान इस नकारात्मकता के सहारे और कितना चल सकता है? जिस देश में आज भी मिसाइलों के नाम भारत पर हमला करने वाले आक्रांताओं के नाम पर ही रखे जाते हों उसकी सोच का दायरा समझने के आपको प्रगतिशील नहीं ‘कबाइली’ दिमाग़ से सोचना होगा। हिंदू और हिंदुस्थान के लिए नफरत के अलावा पाकिस्तान के गति, प्रगति, बढ़त के सकारात्मक आयाम कौन से हैं? पाकिस्तानी सरकार और इसके मंत्री, जो अपनी आवाम के लिए दूध-सब्जी, पानी का इंतजाम करने में विफल रहे, भारत के साथ युद्ध की तिथियों का ऐलान कर रहे हैं। मिसाइलें दाग़ी जा रही हैं, समुद्री रास्ते से हल्लाबोल के मंसूबे बांधे जा रहे हैं...
जाहिर है, बीमारी अब हद से बढ़ रही है। ऐसे में क्या हो सकता है? वही, जो पागलपन के लक्षण उजागर होने पर किया जाता है।
पागलपन के मरीज का इलाज लंबा चलता है। कई बार उसे झटके दिए जाते है। कई बार तो उसका भला चाहने वाले चिकित्सक-परिवारजन ही उसे बांधकर रखते हैं, ताकि वह खुद को या अन्य को जख्मी न कर बैठे। ऐसी स्थिति पीड़ादायक परंतु उपचार का भाग होती है। एफएटीएफ तो बानगी है, पाकिस्तान का उन्माद उसे बाकियों से अलग-थलग, अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों की बेडि़यों की ओर ले जाए तो हैरानी नहीं होनी चाहिए। एक देश के तौर पर खुद को साबित करने के लिए पाकिस्तान को जो कुछ करना है, वह आज की परिस्थितियों में उसके लिए आसान नहीं है।