कश्मीर में अलगाववादी डरे हुए हैं आम कश्मीरी नहीं
   दिनांक 04-अगस्त-2019
कश्मीरी अलगाववाद की कहानी है - नारा जेहाद का, रणनीति गीदड़ भभकी की और ताकत पैसे की. लेकिन अब कश्मीर में बहुत कुछ ऐसा हो रहा है जो देश के लिए अच्छी खबर है और विघटनकारियों का एक दुस्वप्न है. प्रधानमंत्री मोदी ने अलगाववाद को हलक से पकड़ लिया है

 
 कानून की धार पर अलगाववादी : गीदड़ भभकियों का दौर ख़त्म
कश्मीर में बहुत कुछ नया हो रहा है. दशकों की रक्षात्मक नीति का स्थान आक्रामक नीति ने ले लिया है. सक्रियता ने प्रतिक्रियावाद को विस्थापित कर दिया है. उधर कश्मीर के अलगाववादी नेता (और फारुख अब्दुल्ला, महबूबा मुफ़्ती व कश्मीर कांग्रेस के सैफुद्दीन सोज़ अदि ) धमकाते रहे कि “धारा 370 और 35 ए को हाथ लगाया, तो कश्मीर अलग हो जाएगा, जलजला आ जाएगा,” इधर मोदी सरकार ने अलगाववादियों की मुश्कें कसनी शुरू कर दीं और 35 ए पर मुक्त चर्चा भी प्रारंभ कर दी है. लोकसभा में गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि 'विपक्ष के लोग कहते हैं कि धारा 370 संविधान में है, लेकिन यह भूल जाते हैं कि धारा 370 के आगे अस्थाई शब्द भी जुड़ा है.' अलगाववादी नेता बदहवास हैं, यहां क़ानून पीछे पड़ा है, वहां आईएसआई. ऐशोआराम की नेतागिरी के दिन लद चुके हैं. पाकिस्तान अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर बार-बार रुसवा हो रहा है. कश्मीर मामले पर उसकी मुहिम पर दुनिया कान नहीं दे रही है. कश्मीर मुद्दे को उछालने के पाकिस्तानी प्रयास औंधे मुंह गिर गए हैं, जबकि कश्मीर में जिहाद का नारा देने वाला हाफ़िज़ सईद अंतर्राष्ट्रीय आतंकी घोषित कर दिया गया है. सर्जिकल स्ट्राइक के सदमे से पाकिस्तान फौजी अभी भी उभर नहीं पाए हैं, इधर कश्मीर में भारतीय सेना के हाथ खोल दिए गए हैं. सेना ताबड़तोड़ कार्रवाई कर रही है. आतंकी नेतृत्व का लगभग सफाया हो चुका है. सर्जिकल स्ट्राइक ने आतंकियों के भी हौसले को तोड़ा है. एनआईए रोज छापे मार रही है. नया क़ानून बनाकर उसकी ताकत को कई गुना बढ़ा दिया गया है. कांग्रेस व अन्य विपक्षी बयान दे रहे हैं कि सरकार कश्मीर में भय फैला रही है, लेकिन सचाई यही है कि बरसों से कश्मीर में अलगाववाद का धंधा कर रहे लोग ही भयभीत हैं, और पाकिस्तान परेशान है, क्योंकि उसके घाटी में उसके प्यादे पिटते जा रहे हैं.
एक निर्णायक मोड़ 

 
 कश्मीर में ठोस काम निर्णायक प्रहार
हुर्रियत और जेकेएलएफ के लोग 2019 के लोकसभा चुनाव से भी बड़ी उम्मीद लगाए बैठे थे. उन्हें लग रहा था कि मोदी सरकार जाएगी और कांग्रेस के नेतृत्व में तथाकथित सेकुलर दल केंद्र में सरकार बनाएंगे, और उनके अच्छे दिन फिर से लौटेंगे. उनकी सुविधाएं वापस लौटाई जाएंगी, मुकदमे वापस लिए जाएंगे, और बातचीत के लिए कालीन बिछाया जाएगा. लेकिन चुनाव परिणामों ने उन्हें गहरा झटका दिया है. कल तक पाकिस्तानी दूतावासों की महफिलों की शोभा बढ़ाने वाले और भारत को दुत्कारने वाले हुर्रियत तथा दूसरे अलगाववादी नेता, आज उम्मीद लगाए बैठे हैं कि उन्हें बातचीत के लिए बुलाया जाएगा, लेकिन मोदी सरकार उन्हें रत्ती भर भी भाव नहीं दे रही है. सरकारी एजेंसियां उनके कालेधन और आतंकी फंडिंग के मामलों को लेकर हाथ धोकर पीछे पड़ गई है. बरसों से मीडिया में सुर्खी बना रहे इन विघटनकारियों के चेहरे आज खुद सुर्ख हैं. हिरासत, नज़रबंदी और जेल में उनके दिन कट रहे हैं. पहली बार, उनके काले कारनामों का चिट्ठा खोल दिया गया है. नई व्यवस्था की उनके प्रति क्या सोच है ये राज्य के राज्यपाल सत्यपाल मालिक के इस बयान से पता चलता है कि “हुर्रियत के लोग पाकिस्तान से इजाजत लिए बिना टॉयलेट भी नहीं जाते.” यानी कश्मीर के प्रतिनिधि होने के उनके दिखावे का भ्रम तोड़ दिया गया है. उनकी असलियत दुनिया के सामने है कि वो सिर्फ आईएसआई के पिट्ठू हैं. हुर्रियत के नेता कहते थे कि कश्मीर पर पाकिस्तान से भी बात की जाए. लेकिन अब न तो हुर्रियत से बात की जा रही है न ही उसके आका पाकिस्तान से.
पोल खोल दी गई है 
कश्मीर को समस्या बनाए रखने में की गई गलतियों में एक अन्य गलती यह भी है कि पूर्ववर्ती सरकारों ने गली मोहल्ले की राजनीति करने वाले अलगाववादी नेताओं को, जो अपने विधानसभा क्षेत्र से विधायक बनने की भी हैसियत नहीं रखते, भाव दे दे कर, सर चढ़ाया, (प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से )पैसा दिया और मशहूर किया. ये एक तरह की रिश्वत थी . ये लोग पैसा लेते रहे भारत विरोधी प्रदर्शनों की नौटंकी सजाते रहे. उनकी दुकान चलती रही. घाटी की अलगाववाद की समस्या को समझने में बहुत बड़ी भूल रही , अलगाववादियों की क्षमता को आंकने में की गई गलती. वार्ड, गली, मोहल्ले के नेता कश्मीर के नेता बनाकर प्रस्तुत किए जाते रहे. चुनी हुई कुछ सड़कों पर टायर जलते, पत्थर चलते, नारे लगते, लेकिन तस्वीर ऐसी बनाई जाती कि सारा कश्मीर जल रहा है. देश का सामान्य नागरिक और विश्व समुदाय यह समझता रहा कि सारा जम्मू कश्मीर राज्य ही अलगाव ग्रस्त है. सचाई इसके बिलकुल विपरीत है. राज्य के तीन हिस्से हैं - कश्मीर घाटी, जम्मू और लद्दाख . जम्मू और लद्दाख में नाम मात्र का भी अलगाववाद नहीं है. सिर्फ कश्मीर घाटी के 10 में से 5 में जिलों अलगाववाद रहा है. यानी राज्य के 22 में से 5 जिलों में अलगाववाद का आन्दोलन चला. वह भी इन जिलों के कुछ मोहल्लों, चंद इलाकों तक सीमित है.
 

 
सलाखों के पीछे आसिया अंद्राबी : ठेके के जिहाद पर प्रहार  
कश्मीर के मुस्लिमों में बड़ा हिस्सा अलगाववादियों के खिलाफ और भारत के साथ है. यहां के शिया, बकरवाल, गुर्जर आदि मुस्लिम समुदाय मजबूती से देश के साथ खड़े हैं. वह तो पाकिस्तान और अलगाववादियों को अपने अस्तित्व के लिए खतरा मानते हैं. उन्हें याद है 1947- 48 में कश्मीर को आजाद करवाने के नाम पर जो पाकिस्तानी और कबायली आए थे, उन्होंने किस तरह यहां लूट, हिंसा और बलात्कार का दावानल फैलाया था. दिल्ली की अदूरदर्शी दब्बू नीतियों और वोटबैंक की राजनीति के चलते जनाधारविहीन लोग देश को चुनौती देते रहे. आज उनके प्रहसन पर से पर्दा खींचकर उतार दिया गया है.
सांसत में धौंसबाज 
माफिया पर बनी मशहूर हॉलीवुड फिल्म गॉडफादर का एक संवाद है कि पैसा बंदूक है, और राजनीति इस बात का ज्ञान कि कब ट्रिगर दबाना है. यह संवाद कश्मीर की अलगाववादी राजनीति पर बिल्कुल सही बैठता है. मोदी सरकार ने अलगाववादियों के हाथ से यह भरी हुई बंदूक छुड़ा ली है. क़ानून की किताब खुल गई है.. इसलिए कल तक जो दहाड़ते थे, आज मिमिया रहे हैं.
कश्मीरी अलगाववादियों ने पैसा इस्लामाबाद और दिल्ली दोनों से लिया, लेकिन वफादारी निभाई केवल पाकिस्तान से. साल जून में एनआईए ने खुलासा किया कि उसकी पूछताछ में अनेक बड़े अलगाववादी नेताओं ने स्वीकार किया है कि उन्हें पाकिस्तान से रकम मिलती रही है. जिसका इस्तेमाल उन्होंने व्यक्तिगत उपयोग और घाटी में अलगाववाद को उभारने में किया. इन नेताओं में हुरिर्यत कॉन्फ्रेंस के भी कई नेता शामिल है.
16 जून को एनआईए ने खुलकर पाकिस्तान परस्ती दिखलाने वाली और सालों से भारत के खिलाफ जहर उगल रही दुख्ताराने मिल्लत की आसिया अंद्राबी से पूछताछ की. अंद्राबी ने अपने बेटे मोहम्मद बिन कासिम की पढ़ाई की मलेशिया में करवाई है. जब एनआईए ने उससे पूछा कि उसके पास इतना धन कहां से आया तो उसने स्वीकार किया कि यह धन पाकिस्तानी स्रोतों से आया था. अंद्राबी घाटी में भारत विरोधी महिला रैलियां आयोजित करती रही है. शब्बीर शाह से उसकी संपत्ति और पहलगाम में उसके होटल के बारे में पूछताछ की गई. पूछताछ में एनआईए ने जब पाकिस्तान से रकम मिलने के सबूत रखें, शब्बीर शाह की बोलती बंद हो गई. एनआईए के हाथ एक हवाला कारोबारी जहूर वताली लगा है, जो पाकिस्तान और यूएई की संस्थाओं से पैसा लेकर फर्जी कंपनियों और दिखावे की व्यापारिक गतिविधियों के माध्यम से अलगाववादियों और पत्थरबाजों तक पहुंचाता था. वताली के पकड़े जाने से सभी बड़े अलगाववादी नेताओं के चेहरों पर हवाइयां उड़ रही है.
दशकों से अलगाववाद का सिरमौर बना यासीन मलिक हिरासत में है, और पटापट अपने और दूसरों के राज उगल रहा है. यासीन मलिक ने बताया है कि उसने ही हुरिर्यत कॉन्फ्रेंस के अलग अलग धड़ों को साथ लाकर संयुक्त प्रतिरोधी नेतृत्व ( जेआरएल) तैयार किया था. जेआरएल ने 2016 में घाटी में एक महीने तक हिंसक प्रदर्शन और हड़ताल करवाई थी. जिसमें अनेक नागरिक और सुरक्षाकर्मी मारे गए थे. इसके लिए जेआरएल तथा हुरिर्यत कॉन्फ्रेंस ने बाहरी स्रोतों से पैसा इकट्ठा किया था. मसरत आलम ने भी आर्थिक अनियमितताओं तथा हवाला कारोबार के जरिए आ रहे पैसे के बारे में कई राज उगले हैं. मसरत आलम ने सैयद शाह गिलानी के खिलाफ सबूत दिए हैं.
बंद हुआ फायदे का धंधा 
कश्मीरी अलगाववाद की कहानी है - नारा जेहाद का, रणनीति गीदड़ भभकी की और ताकत पैसे की. पिछले चार दशकों से घाटी में अलगाववाद फायदे का धंधा बना हुआ था. अलगाववादी नेता दोनों हाथों से कमाते रहे. दिल्ली में बैठी ' सेकुलर' सरकारें भारतीय करदाताओं के पैसे से उन्हें सुविधाएं देती रही. सुरक्षा देती रही. सेवा में चौपहिया वाहन दौड़ते रहे. होटलों के महंगे बिल भरे जाते रहे. सर चढ़े अलगाववादी घाटी में सरकारी और निजी जमीनों पर अवैध कब्जे करते रहे. अवैध दुकाने, मॉल्स और भवन बनाते रहे. स्थानीय बैंकों के माध्यम से अपने काले धन को सफेद करते रहे. दिल्ली और श्रीनगर जानबूझकर इन सब हरकतों से आंखें फेरे रहे. इसे अलगाववादियों को दी जाने वाली रिश्वत के तौर पर देखा जाता रहा. कुल मिलाकर रणनीति यही रही कि इन लोगों के मुंह में पैसा ठूंसते जाओ, ताकि वो मुंह ही न खोलें.
घाटी में शांति खरीदने की यह नीति बुरी तरह नाकाम रही. अलगाववादी भारत सरकार से चंपी-मालिश भी करवाते रहे और भारत के खिलाफ आईएसआई द्वारा लिखी पटकथा भी बांचते रहे. यानी इतने बरसों से भारत सरकारें भारत विरोधी अभियान के लिए ही पैसा साधन और सुविधाएं मुहैया करवाती रहीं. आईएसआई की तरफ से गड्डियाँ तो आ ही रही थीं. फायदे का ये धंधा अब चौपट हो चुका है.
घाटी के जिहादी कलमगीर

 
तुष्टीकरण की इस नीति से घाटी के मीडिया और पत्रकारों ने भी खूब चांदी काटी. वो विज्ञापन और सुविधाएं लेते रहे. और घाटी में घटने वाली हर घटना को तिल का ताड़ बना कर दुनिया के सामने परोसने रहे. एक रोचक घटना घाटी में केंद्रित मीडिया के कारनामे को उजागर करती है. 2016 में जब कश्मीर के कुछ इलाकों में बंद और हड़ताल की नौटंकी की जा रही थी, वहां का मीडिया दिल्ली के मीडिया केंद्रों को फोटो वीडियो और रिपोर्ट भेज रहा था, तब एक बात ध्यान में आई, कि जब भी घाटी में बंद का आह्वान होता, तो हर बार एक-दो इलाकों की निश्चित आठ-दस दुकानों के ही गिरे हुए शटर दिखाए जाते. दिल्ली मीडिया के लोगों को उन दुकानों के नाम भी याद होने लगे. यह आंखें खोलने वाला रहस्योद्घाटन था. कुछ गलियां और चंद दुकानों को सारा कश्मीर बता कर देश और दुनिया को भ्रमित किया जा रहा था. इन अखबारों में खुल्लम-खुल्ला भारत विरोधी सामग्री छापी जाती थी. घाटी के भ्रष्ट तंत्र से ये पत्रकार भी रकम ऐंठ रहे थे. ऐसे खबरियों का पर्दाफाश होना बहुत बड़ी राहत है. अब सब पर नज़र रखी जा रही है. जवाबदेही तय हो रही है.
तुष्टीकरण और दिशाहीनता के दौर का खात्मा
कश्मीर समस्या को बिगाड़ने में छद्म सेकुलर राजनीति ने अक्षम्य गलतियां की हैं. कश्मीर से युवा केवल आतंक का प्रशिक्षण लेने के लिए ही पाकिस्तान नहीं गए, बल्कि पाकिस्तान के कॉलेजों में पढ़ने के लिए भी जाते रहे. जहां उन्हें पाकिस्तानी मंसूबों के अनुरूप ढाला गया . कश्मीरी अलगाववादी पाकिस्तान में जाकर हाफिज सईद और मसूद अजहर के साथ मंच साझा करते थे. पाकिस्तान और दूसरे इस्लामी देशों में कश्मीरी युवाओं के मिलन कार्यक्रम आयोजित किए गए. गलत रास्तों से हासिल किए गए पैसों से कश्मीरी अलगाववादियों के बेटे-बेटियां विदेशों में महंगी उच्च शिक्षा प्राप्त करते रहे, मोटी तनख्वाह वाली नौकरियां करते रहे, और उनके मां-बाप घाटी में विद्यालयों को जलाते रहे. युवाओं के हाथों में पत्थर थमाते रहे.सिनेमाघरों को आग के हवाले करते रहे
कांग्रेस तथा कांग्रेस समर्थित अल्पजीवी सरकारों की नीति भी अलगाववाद के तुष्टीकरण की रही. 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने कश्मीर घाटी के ' सभी पक्षों' से बातचीत करने का वादा अपने घोषणा पत्र में किया था. हुरिर्यत कॉन्फ्रेंस से बातचीत की समर्थक कांग्रेस तथा अन्य विपक्षी दलों से सवाल पूछा जाना चाहिए कि हुरिर्यत कॉन्फ्रेंस से वह क्या बातें करते? ऐसे कौनसे अधिकार कश्मीरियों को दे देते, जो उन्हें प्राप्त नहीं है? कश्मीर की समस्या अधिकारों की नहीं है, बल्कि ' विशेषाधिकारों' की मांग की है. क्या कांग्रेस के नेता हुरिर्यत कॉन्फ्रेंस को देश की अखंडता से समझौता करके कुछ दे देते? क्या वह संविधान के दायरे से बाहर आकर कोई बातचीत, कोई वादा कर सकते थे? प्रारंभ से समस्या यही रही है कि सेकुलर राजनीति के नाम पर कश्मीर प्रश्न को सांप्रदायिक नजरिए से ही देखा जाता रहा. यूपीए सरकार के समय दिल्ली से वार्ताकारों का एक दल कश्मीर भेजा गया था, जिस की अनुशंसाएं हुर्रियत की मांगों के साथ तालमेल में थी. पी चिदंबरम तो वहां जाकर यह भी बोल आए कि ' हमारा एक खूबसूरत संविधान है, आजादी का रास्ता भी निकल सकता है.' अलगावादियों का वो स्वर्णकाल जा चुका है.
अब आगे
कश्मीर को शांत होने में कुछ समय और लगेगा. लेकिन कई बातों पर तेज़ी से काम हो रहा है. कश्मीरी हिंदुओं के पुनर्वास के लिए कार्य योजना तैयार हो रही है. इस्ररायल और अमेरिका की तर्ज पर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल के लिए एक अलग कार्यालय बनाया जा रहा है, जहां सुरक्षा संबंधी फैसले एक ही छत के नीचे लिए जा सकेंगे. विदेश विभाग इस कार्यालय के साथ तालमेल में रहेगा, ताकि कश्मीर मामले पर बेहतर तरीके से काम हो. कश्मीरियों को “और अधिकार” देने कि मांग को खारिज कर दिया गया है, और बेवजह के विशेषाधिकारों कि खात्मे का दौर शुरू हो रहा है. घाटी के युवाओं को स्वरोजगार और स्थानीय उद्योग धंधे विकसित करने के लिए प्रोत्साहन दिया जाएगा. पाकिस्तान की गोलाबारी से प्रभावित गांवों में नागरिकों के लिए सुरक्षा बंकर बनाने का कार्य अपने अंतिम चरण में है. इन गांवों के लोगों को जो आरक्षण दिया गया था उसमें पहले जम्मू के जिलों को बाहर रखा गया था, मोदी सरकार ने क़ानून में संशोधन करके इन जिलों को भी शामिल कर लिया गया है.प्रारंभ से जम्मू व लद्दाख के साथ हो रहे घोर अन्याय को समाप्त करने के लिए प्रशासनिक व्यवस्थाओं में स्थायी परिवर्तन किए गए हैं.
भारत पाकिस्तान सीमा की आधुनिक फेंसिंग का काम जारी है, और घाटी के अंदर छिपे हुए आतंकियों को चुन-चुन कर मारा जा रहा है. कूटनीतिक तौर पर पाकिस्तान पस्त है. आतंकी फंडिंग को लेकर पाकिस्तान की आर्थिक घेराबंदी कसती जा रही है. पाकिस्तान की माली हालत खराब है. दुनिया भारत के साथ है. रफाल जैसा अत्याधुनिक लड़ाकू विमान मिलने से भारत कि बालाकोट जैसी कार्रवाई करने की क्षमता और अधिक बढ़ जाएगी. इन सब कदमों से राज्य में भारत समर्थक नागरिकों का उत्साह बढ़ा है. भविष्य आशास्पद दिख रहा है. महबूबा मुफ़्ती और उनके प्रतिद्वंदी उमर व फारुख अब्दुल्ला बयान दे-देकर खुद को खबरों में बनाए हुए हैं. हवा के रुख के साथ वो कैसे पलट जाते हैं, ये सारे देश ने देखा है. सो, इंतजार कीजिए...