कौन हैं ये लोग?
   दिनांक 05-अगस्त-2019
 
कोई धर्म चोरी नहीं सिखाता। चोर का क्या धर्म! लेकिन चोर, लफंगे, आतंकी जब अपनी पहचान छिपाने के लिए धर्म को लबादा या औजार बनाने लगें तो सोचना जरूरी हो जाता है कि ऐसा क्यों है, और इसके पीछे कौन-सी मंशा पल रही है? झारखंड के धनबाद जिले में चिरकुंडा स्थित तालडंगा हाउसिंग कॉलोनी में इसी माह जनता ने एक चोर को रंगे हाथ पकड़ लिया। अपना नाम राजू बताने वाले इस चोर ने हाथ में कलावा भी बांध रखा था। बाद में पता चला कि राजू का असली नाम नसीम अंसारी है। यह बात सामान्य होती यदि राजू, राजू ही होता। जो बुरा काम वह कर रहा है उसे ढकने के लिए अलग धार्मिक पहचान क्यों जरूरी है? इसी झारखंड में कुछ रोज पहले जिस तबरेज की चोरी के आरोप में पिटाई और बाद में मौत हुई उसने भी अपना नाम 'सोनू' ही बताया था। जो पहली नजर में हिंदू नाम ही लगता है। ये घटनाएं अपवाद हो सकती थीं, किंतु ऐसे एक नहीं, अनेक उदाहरण मिल जाएंगे। मुंबई हमले का सबसे कुख्यात चेहरा याद है! अजमल आमिर कसाब। याद कीजिए छत्रपति शिवाजी टर्मिनस पर सीसीटीवी में आई फोटो में इस्लामी आतंकी के एक हाथ में कलावा और दूसरे में मशीनगन चमक रही थी!
लव जिहाद के मामलों में पहचान बदलकर प्यार का ढोंग रचाने और बाद में 'शिकार' को इस्लाम में घसीटने के इतने मामले खुले हैं कि अब गिनती से बाहर हैं।
यदि आज मुस्लिम पहचान अपराध-अनाचार से जुड़ रही है, पत्र-पत्रिकाओं में जेल में बंद मुसलमानों की भारी संख्या पर खबरें छप रही हैं तो इसका दोषी कौन है? न्यायप्रक्रिया अपराधी का धर्म देखकर दंड तय नहीं करती। फिर अपराध किसी खास मजहब के पालने में ज्यादा कैसे पल सकता है? इन सवालों की तह तक जाए बिना भी अपराधी का मजहबी पहचान बदलना इस बात का संकेत है कि अपनी मूल पहचान में उसे पकड़े जाने का ज्यादा खतरा है! लव जिहाद के 'शिकारी' जानते हैं कि हिंदू पहचान खुले विचारों की पहचान है। अपराध कम-ज्यादा हर ओर होंगे, लेकिन झूठमूठ को हाथ में कलावा बांधने वाला संभवत: इसे इस नीयत से लपेटता है कि हिंदू पहचान नैतिकता का भय मानने वालों की पहचान है, इस पहचान में दुबकते हुए अपराध आसान है। इसलिए घोर अनैतिकता-अनाचार फैलाने वाले तत्व इस पहचान को छल और ढाल की तरह बरतना चाहते हैं। इसमें क्या आश्चर्य कि फर्जी पहचानों के खुलासे से जुड़े मामले या आतंकी घटनाएं समाज के सामने इस्लाम का जो रूप लेकर आ रही हैं समाज उसी आपराधिक-जिहादी छवि को देखकर आक्रोशित प्रतिक्रिया दे रहा है। यह छवि या प्रतिक्रियाओं के अच्छा-बुरा होने का सवाल नहीं है। यह वस्तुस्थिति है!
गुस्से में तपता समाज किसी देश और व्यवस्था के लिए अच्छा संकेत नहीं। किंतु कुछ हैं, जिन्हें ऐसी स्थितियां ही रास आती हैं। समाज का गुस्सा, विभाजन और विद्वेष ही जिनकी राजनीतिक विचारधारा का खाद-पानी है उनके लिए ऐसी स्थितियां अच्छी हैं।
ये लोग कौन हैं! क्या इन्होंने भी कोई छद्म पहचान ओढ़ी हुई है? कौन हैं ये लोग! कसाब से लेकर राजू और तारा शाहदेव प्रकरण तक हिंदू पहचान से खिलवाड़ के खतरे न देखने वाले, लेकिन जबरन जय श्रीराम का नारा लगवाने की झूठी कहानियों को सच की तरह, गंभीर विमर्श के रूप में लगातार परोसने वाले लोग कौन हैं? खुद को प्रगतिशील कहने वाले, लेकिन तीन तलाक पर मध्ययुगीन मुल्ला सोच पर सिर हिलाने वाले तत्व कौन हैं? वे किस तरह के इस्लाम के सुरूर में हैं? यह सुरूर है या उन्माद को पोसती प्रगतिशीलता!
कुछ पहचानों और रिश्तों को बेपर्दा करती एक और खबर पर गौर कीजिए-पुणे पुलिस को पता चला है कि वामपंथी आंदोलनकारी की पहचान रखने वाले गौतम नवलखा और उनके संपर्क के नक्सलियों के तार इस्लामी आतंकी संगठन हिज्बुल मुजाहिदीन और घाटी के जिहादियों से जुड़े थे। पहचान से जुड़ा यह खुलासा भी झारखंड के किसी चोर की असल पहचान की तरह ही दिलचस्प है।
खुद ही, खुद को प्रगतिशील कहने वाले शहरी नक्सली किसे गच्चा देना चाहते हैं! हाथ में कलावा बांधने वाले चोर किसे गच्चा देना चाहते हैं? अपने आपको सेकुलर कहकर भी मजहबी तुष्टीकरण में गले तक डूबे लोग किसे धोखे में रखना चाहते हैं! ऐसे लोगों के लिए यह जानना जरूरी है कि जनता धोखा खाने के बाद दोगुनी-चौकन्नी हो जाती है, फिर कलावे का छल, प्रगतिशीलता का ठप्पा या सेकुलर नारे का भरम उसे रोक
नहीं पाते। नसीम, शहरी नक्सली या झूठे सेकुलर...पोल खुलना तय है!