पाक अधिक्रांत जम्मू-कश्मीर को वापस लेना अभी बाकी है
   दिनांक 05-अगस्त-2019
 संतोष कुमार वर्मा
 

 
 
नई दिल्ली में राष्ट्रीय युद्ध स्मारक पर शहीदों को सलामी देते (बाएं से)
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और सेना के तीनों अंगों के प्रमुख (फाइल चित्र)
जम्मू-कश्मीर ज्ञात ऐतिहासिक काल से भारत का अभिन्न अंग रहा हैै। पाकिस्तान द्वारा कब्जाए क्षेत्रों की वापसी से भारत की सामरिक स्थिति सुदृढ़ हो सकती है। भारत के अपने भागों को वापस लेने के लिए किये जाने वाले प्रयास नैतिक रूप से पूर्णत: उपयुक्त तथा राजनीतिक रूप से पूर्णत: तर्कसंगत होंगे
भारत एक राष्ट्र के रूप में सदियों से एक विशाल भूभाग पर प्रशस्त रहा है, परन्तु औपनिवेशिक शासन के दुष्प्रभावों के कारण इसे विभाजन की विभीषिका सहनी पड़ी। उस विभाजन के उपरान्त बने पाकिस्तान ने आक्रामक रुख अपनाकर भारत पर न केवल जबरन युद्ध थोपा बल्कि इसकी अखंडता का अतिक्रमण करते हुए एक क्षेत्र पर अवैध रूप से कब्जा भी कर लिया। आंतरिक राजनीति और अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य के चलते भारत अपने इस क्षेत्र को वापस लेने का प्रयास नहीं कर सका, हालांकि संसद ने एक प्रस्ताव पारित कर संपूर्ण जम्मू-कश्मीर सहित भारत की भौगोलिक अखंडता को अक्षुण्ण रखने की शपथ ली हुई है। परन्तु अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं। भारत अपने अंतरराष्ट्रीय सम्बन्धों, सामरिक और कूटनीतिक क्षमताओं से अब इस स्थिति में आ चुका है कि वह इस दिशा में प्रभावी कदम उठा सकता है।
और इसी क्रम में कारगिल विजय दिवस के अवसर पर भारत के थल सेनाध्यक्ष जनरल बिपिन रावत ने अपने एक संबोधन में भारत के अवैध रूप से अधिक्रांत किये गए हिस्सों अक्साई चीन और पाक अधिक्रांत जम्मू-कश्मीर का उल्लेख किया। सेनाध्यक्ष ने साथ ही यह भी कहा कि इसकी कार्यविधि क्या हो, इसका निर्णय देश के राजनैतिक नेतृत्व को लेना है, सेना किसी भी आदेश का पालन करने को सदैव तत्पर है। सेनाध्यक्ष का यह बयान, न केवल राष्ट्रवाद की भावना से प्रेरित करोड़ों भारतीयों की आकांक्षाओं को प्रतिबिंबित करता है, बल्कि देश की सामरिक आवश्यकताओं की ओर भी ध्यान आकर्षित कराता है।
 
कब्जे की पृष्ठभूमि
15 अगस्त 1947 को भारत में ब्रिटिश राज समाप्त हुआ, भारत और पाकिस्तान के रूप में दो अधिराज्यों की स्थापना हुई। अंग्रेजों के जाते ही भारत की तमाम रियासतों का भारत में अधिकृत विलय आवश्यक था। जम्मू-कश्मीर के महाराजा ने विलय सम्बंधी अपना निर्णय कुछ समय के लिए स्थगित कर दिया, क्योंकि राज्य में उस समय कुछ ऐसी परिस्थितियां बन गयी थीं। लेकिन पाकिस्तान ने वहां जनजीवन ठप करने के उद्देश्य से रावलपिंडी और सियालकोट से जम्मू-कश्मीर आने वाली सभी वस्तुओं की आपूर्ति रोक दी। साथ ही पूर्व निर्धारित तरीके से 3 सितम्बर 1947 से छापे मारने शुरू कर दिये जो 22 अक्तूबर तक चलते रहे, जिसके बाद जम्मू-कश्मीर पर आक्रमण कर दिया गया।

 
 28 अक्तूबर 1947 को एक अखबार ने कुछ यूं छापी जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय की खबर।
चित्र में हैं (बाएं से) महाराजा हरिसिंह, जवाहरलाल नेहरू और उनके पीछे शेख अब्दुल्ला
 
पाक अधिक्रांत जम्मू-कश्मीर
आज हम जिस पाकिस्तान अधिक्रांत जम्मू -कश्मीर (पीओजेके) की बात करते हैं उसे पाकिस्तान में 'आजाद कश्मीर' (एजेके) और 'गिलगित-बाल्टिस्तान' के नाम से जाना जाता रहा है। यह क्षेत्र जम्मू-कश्मीर राज्य का हिस्सा है, और इसलिए यह भारत का अभिन्न अंग है। यह 22 अक्तूबर, 1947 से पाकिस्तान के अवैध नियंत्रण में है, जब पाकिस्तान की सेना द्वारा समर्थित कबाइली समूहों ने जम्मू-कश्मीर की रियासत पर आक्रमण किया था। तथाकथित एजेके के नेताओं ने अप्रैल 1949 में कराची समझौते के तहत उत्तरी क्षेत्रों को पाकिस्तान को सौंप दिया। जिसे 2009 से गिलगित-बाल्टिस्तान कहा जाने लगा।
चीन के कब्जे में कश्मीर का हिस्सा
वहीं दूसरी ओर इसका एक हिस्सा 1963 में एक संधि के तहत पाकिस्तान द्वारा चीन को सौंप दिया गया। चीन-पाकिस्तान सीमा समझौता पाकिस्तान और चीन की सरकारों के बीच एक दस्तावेज है जो इन दोनों देशों के बीच सीमा की स्थापना करता है। इसके द्वारा पाकिस्तान ने जहां चीन को यह क्षेत्र तो अंतरित किया ही, साथ ही उत्तरी कश्मीर और लद्दाख में सैकड़ों वर्ग किलोमीटर भूमि पर चीनी संप्रभुता को मान्यता भी दी, और यह सब ऐसे क्षेत्र पर हो रहा था जहां खुद पाकिस्तान का दावा अवैध था।
चीन द्वारा हथियाया गया यह क्षेत्र है, ट्रांस-काराकोरम ट्रैक्ट जिसे शक्सगाम या शक्सगाम ट्रैक्ट के नाम से भी जाना जाता है। यह शक्सगाम नदी के दोनों किनारों के साथ 9,900 वर्ग किलोमीटर से अधिक का क्षेत्र है, जो काराकागम से कुनलुन रेंज तक फैला हुआ है। सिंक्यांग स्वायत्त क्षेत्र के काशगर प्रान्त में कारगिलिक काउंटी और टैक्सकोरगान ताजिक ऑटोनोमस काउंटी के एक हिस्से के रूप में यह पूरी तरह से पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना द्वारा प्रशासित किया जा रहा है। इस हिस्से का अधिकांश भाग शक्सगाम घाटी से बना है जिसे पूर्वकाल में बाल्टिस्तान क्षेत्र की शिगर घाटी के एक हिस्से के रूप में प्रशासित किया जाता था। इसी प्रकार का एक अन्य क्षेत्र अक्साई चिन है, जो अब होतान काउंटी के हिस्से के रूप में चीन द्वारा प्रशासित किया जाता है, जो सिंक्यांग स्वायत्त क्षेत्र के होतान प्रान्त के दक्षिण-पश्चिमी भाग में स्थित है। 1993 और 1996 में, चीन और भारत, दोनों ने वास्तविक नियंत्रण रेखा से सम्बंधित समझौतों पर हस्ताक्षर किए। इस भारतीय क्षेत्र के विषय में चीन निर्लज्जतापूर्वक दावा करता है है कि अक्साई चिन, सिंक्यांग उइगर स्वायत्त क्षेत्र का हिस्सा है।
क्षेत्र का सामरिक महत्व
पाकिस्तान 1958 में सैन्य तख्तापलट का शिकार हुआ और '60 के दशक की राजनीतिक आवश्यकताएं पाकिस्तान को चीन के निकट लाईं जिसने पाकिस्तान को समर्थन के बदले इस क्षेत्र का सौदा कर लिया। यह पूरा क्षेत्र, जो आज पाकिस्तान और चीन के कब्जे में है, सामरिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। यह वह महत्वपूर्ण क्षेत्र है जो दक्षिण, दक्षिणमध्य एशिया की भू-राजनीति को सीधे प्रभावित करता है। यह क्षेत्र पाकिस्तान, अफगानिस्तान के वाखान कॉरिडोर, पश्चिम में ताजिकिस्तान और उत्तर में पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना के सिंक्यांग प्रांत के साथ सीमा साझा करता है। पाक अधिक्रांत जम्मू-कश्मीर का यह क्षेत्र मध्य एशियाई गणराज्यों और उनके विस्तृत बाजारों के लिए प्रवेश द्वार है, जो प्राचीन काल के उसी सिल्क रूट का हिस्सा है जो मध्य एशिया और आगे चलकर कैस्पियन सागर से होते हुए यूरोप तक को जोड़ता था। साथ ही इस क्षेत्र पर अधिकार भारत की सुरक्षा के लिए एक प्राकृतिक तंत्र की रचना करता है। अगर आज ये क्षेत्र भारतीय नियंत्रण में होते तो इस महाद्वीप के साथ ही वैश्विक भू-राजनीति में भारत का स्थान अत्यधिक महत्वपूर्ण होता। चीन इस क्षेत्र के महत्व से भलीभांति परिचित है। पीओजेके में बढ़ते चीनी निवेश और विशेष रूप से क्षेत्र में बुनियादी ढांचे के विकास में इसकी भागीदारी, पीओजेके के रणनीतिक महत्व को रेखांकित करती है।
22 फरवरी 1994 को भारतीय संसद के दोनों सदनों ने पाकिस्तान द्वारा अधिक्रांत जम्मू-कश्मीर के संबंध में सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित किया था जिसमें स्पष्ट कहा गया था कि जो क्षेत्र पाकिस्तान ने 1947 में धूर्तता से कब्जाए हैं और जिनके एक भाग को 1963 में चीन को अंतरित किया वे भारत के विभिन्न अंग हैं ओर हम वापस लेकर रहेंगे।
 
 1994 का संकल्प-भारत की नीति
अधिक्रांत जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में जनरल रावत ने जो कुछ कहा है, वह कोई अति राष्ट्रभाव की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि जम्मू-कश्मीर पर भारत की आधिकारिक नीति से पूर्णत: सुसंगत है। 22 फरवरी 1994 को भारतीय संसद के दोनों सदनों ने पाकिस्तान द्वारा अधिक्रांत जम्मू-कश्मीर के संबंध में सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित किया था जिसमें स्पष्ट कहा गया था कि 'जो क्षेत्र पाकिस्तान ने 1947 में धूर्तता से कब्जाए हैं, और जिनके एक भाग को 1963 में चीन को अंतरित किया, वे भारत के अभिन्न अंग हंै और उनको हम वापस लेकर रहेंगे। इस बारे में किसी समझौते को स्वीकार नहीं करेंगे'। इस संकल्प में स्पष्ट रूप कहा गया है-
(1) पाकिस्तान अधिक्रांत जम्मू-कश्मीर भारतीय गणराज्य का अभिन्न अंग है और रहेगा। भारत अपने इस भाग के पुन: भारत में विलय का हरसंभव प्रयास करेगा।
(2) भारत में इस बात की पर्याप्त क्षमता और संकल्प है कि यह उन अलगाववादी और आतंकवादी शक्तियों का मुंहतोड़ जवाब दे, जो देश की एकता, प्रभुसत्ता और क्षेत्रीय अखंडता के खिलाफ हों और मांग करता है कि-
(3) पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर के उन क्षेत्रों को खाली करे, जिन्हें उसने कब्जाया और अतिक्रमण किया हुआ है।
(4) भारत के आंतरिक मामलों में किसी भी हस्तक्षेप का कठोर जवाब दिया जाएगा। और अब चूंकि पाकिस्तान ने अपनी किसी भी भारत विरोधी गतिविधि से हाथ नहीं खींचे हैं, बल्कि उनमें तीव्रता ही आई है तो ऐसी स्थिति में भारत को आत्मरक्षार्थ उपाय करने का अधिकार पूर्ण रूप से वैध है।
जम्मू-कश्मीर ज्ञात ऐतिहासिक काल से भारत का अभिन्न अंग रहा है, न केवल राजनैतिक रूप से बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से यहां सदैव एकरूपता रही है। कब्जाए क्षेत्रों की वापसी से भारत की सामरिक स्थिति सुदृढ़ हो सकती है। अत: इस स्थिति में भारत के अपने भागों को वापस लेने के लिए किये जाने वाले प्रयास नैतिक रूप से पूर्णत: उपयुक्त तथा राजनीतिक रूप से पूर्णत: तर्कसंगत होंगे। ये भारत की एकता, अखंडता, सुरक्षा और विकास के लिए महत्वपूर्ण प्रस्थानबिन्दु सिद्ध होंगे।