विश्व में बढ़ती भारत की आर्थिक हैसियत
   दिनांक 10-सितंबर-2019
जो लोग पचास साल की उम्र से ऊपर के हैं, उनके लिए यह खबर दो बार पढ़ने जैसी है। भारत ने रुस को एक अरब डॉलर का कर्ज देने की घोषणा की। सत्तर और अस्सी के दशक में बड़े हो रहे बच्चों ने इस आशय़ की खबरें बहुत पढ़ी हैं कि रूस ने भारत की ऐसे मदद की , वैसे मदद की। पर भारत रूस की मदद करने की आर्थिक हैसियत में है, यह बात एकदम नई है

 
भारत ने रूस के संसाधन संपन्न सुदूरी पूर्वी क्षेत्र (फार ईस्ट रीजन) के विकास के लिए 1 अरब डॉलर का कर्ज देने का ऐलान किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हाल में रूस गए थे। भारत द्वारा विदेशों को दिया जाने वाला कर्ज पिछले वर्षों में ढाई गुना से भी ज्यादा हो गया। भारत ने 2013-14 में विदेशों को 11 अरब डॉलर कर्ज दिए थो जो पिछले वित्त वर्ष 2018-19 में बढ़कर 28 अरब डॉलर हो गए। हालांकि, भारत ज्यादातर कर्ज एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के देशों को देता है जो आर्थिक रूप से रूस के मुकाबले कमजोर हैं। रूस को इस स्तर की मदद की घोषणा एकदम नए आयाम पेश करती है, खासकर ग्लोबल अर्थव्यवस्था और ग्लोबल राजनीति में। दूसरे शब्दों में कहें, तो इससे भारत की एक नई समग्र हैसियत का रेखांकन भी होता है।
रूस की अर्थव्यवस्था 2014 से ही मुश्किलों का सामना कर रही है। क्रीमिया पर रूस के कब्जे के कारण लगी अंतरराष्ट्रीय पाबंदियों और पांच वर्ष पहले कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट ने रूस के लिए भारी समस्याएं पैदा की हैं। मंदी से जूझती रूसी अर्थव्यवस्था में रूसी कामगारों की आमदनी घटी और टैक्स बढ़ा। यह अनायास नहीं है कि कश्मीर और धारा 370 के मसले पर रूस भारत के साथ इतनी मुखरता और आक्रामकता के साथ खड़ा रहा कि पूरी दुनिया को समझ में आया कि रूस और भारत के बीच के रिश्तों की गर्मजोशी में वही सत्तर और अस्सी के दशकों की छाया देखी जा सकती है।
कर्ज और मदद का असर
चीन ने पूरी दुनिया में अपना जो असर बनाया है, उसके पीछे एक बड़ी वजह यह भी है कि उसने धुआंधार गति से तमाम देशों को कर्ज और खास तौर पर आसान कर्ज बांटे हैं। यह बात पता करने के लिए अर्थशास्त्री होना जरुरी नहीं है कि जो आपसे कर्ज लेता है, वह आम तौर पर आपके खिलाफ कदम या आवाज नहीं उठाता। जिस देश को भारत से मदद लेनी हो, वह भारतीय हितों का पूरा ख्याल रखेगा, ऐसा माना जा सकता है। मालदीव में पिछले वर्ष सरकार बदलते ही भारत ने उसे दी जा रही मदद बढ़ा दी गयी। मोटे तौर पर कर्ज देना ग्लोबल राजनीति का हिस्सा है, जिसका ताल्लुक भले ही अर्थनीति से हो।
 
हाल में अफ्रीकन देशों-जांबिया, रवांडा, घाना ने भारत के सामने यह प्रस्ताव रखा है कि तांबा और सोना ले लो, और सड़क, रेल वगैरह बना दो। भारत के पास पर्याप्त क्षमताएं हैं इस तरह की परियोजनाओं के सफल क्रियान्वन की। तो कुल मिलाकर भविष्य में भारत की इस तरह की क्षमताएं और भारत की आर्थिक क्षमताएं भारत को दुनिया भर में एक नया स्थान दिलवाएंगी।
अर्थ का अर्थ
अर्थ का अर्थ क्या होता है, यह समझने के लिए इन दिनों पाकिस्तान के टीवी चैनलों को देखना चाहिए। पाकिस्तानी चैनलों पर कुछ पेनलिस्ट बराबर पूछते हैं कि आखिर क्या बात है कि सऊदी अऱब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे इस्लामिक देश भी कश्मीर और धारा 370 के मसले पर भारत के साथ दिखाई दिये। जबकि पाकिस्तानी भी इस्लामिक मुल्क है और सऊदी अऱब, संयुक्त अरब अमीरात भी इस्लामी देश है। इस बहस में कुछ समझदार लोग नरम या तीखे शब्दों में जो समझाते हैं उसका आशय यह है कि एक ही बिरादरी का होने का मतलब यह नहीं है कि हम एक ही हैसियत के लोग हैं। सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के आगे पाकिस्तान की हैसियत भिखारी की है। भीख मांगने जाते हैं पाक के लोग इन देशों में। भारत के इन देशों के साथ कारोबार के रिश्ते हैं, आर्थिक स्तर के रिश्ते हैं। सऊदी अऱब के निवेश का ताल्लुक भारतीय कंपनी रिलायंस से है। संयुक्त अरब अमीरात में भारत के आर्थिक हित हैं और बदले में संयुक्त अरब अमीरात के भारत में आर्थिक हित हैं। ये कारोबारी रिश्ते हैं, पाक का रिश्ता संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब से भीख का है। बतौर भिखारी पाकिस्तान संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब से यह नहीं कह सकता कि किसके साथ कारोबार करो, कैसे कारोबार करो। दो कारोबारियों के बीच में एक भिखारी की बात को जितना महत्व मिल सकता है, उतना ही महत्व पाकिस्तान को मिलता है। किसी के दरवाजे पर खड़ा भिखारी भीख देनेवाले को यह ताकीद नहीं दे सकता है कि हम तो एक ही बिरादरी के हैं, आप किसी और बिरादरी के लोगों से कारोबार ना करो। अर्थ की बुनियाद पर राजनीति के अर्थ बदल जाते हैं। फ्रांस को अरबों के राफेल बेचने हैं भारत को, तो भारत के खिलाफ नहीं जा सकते। तमाम अमेरिकन कंपनियों को भारत में अपना कारोबार करना है, तो भारत के खिलाफ लगातार नहीं जा सकते। भारत की बात में यह वजन तब आता है, जब उसकी आर्थिक हैसियत के एक खास मायने हो जाते हैं।