स्वामी विवेकानन्द का सन्देश विश्व के लिए अनमोल उपहार
   दिनांक 11-सितंबर-2019
शीघ्र ही सारे प्रतिरोधों के बावजूद, प्रत्येक धर्म की पताका पर यह स्वर्णअक्षरों में लिखा होगा-‘युद्ध नहीं, सहायता’, ‘विनाश नहीं, सृजन’, ‘कलह नहीं, शांति’ और‘मतभेद नहीं, मिलन!’ 11 सितम्बर, 1893 को अमेरिका के शिकागो में विश्व धर्म सम्मेलन के पहले दिन स्वामी विवेकानन्द ने अपने सात मिनट के छोटे से व्याख्यान से दुनिया को जीत लिया था
 
अपने ओजस्वी वाणी से भारत की महिमा को विश्वपटल पर आलोकित करनेवाले स्वामी विवेकानन्द का सन्देश समूची मानवता की अनमोल धरोहर है। दुनियाभर के महान ज्ञानी,विज्ञानी, चिंतकों, कलाकारों और विशेषकर युवाओं के हृदय को स्वामीजी के शक्तिदायी विचार आंदोलित करते रहे हैं। फिर भी आज भारत सहित विश्व के बहुसंख्यक लोग स्वामीजी के संदेशों से अवगत नहीं हैं। इसलिए अमेरिकी लेखिका एलिनोर स्टार्क अपने पुस्तक “The Gift Unopened : A new American Revolution” में लिखती हैं कि “क्रिस्टोफर कोलम्बस ने अमेरिका की भूमि का आविष्कार किया, परन्तु स्वामी विवेकानन्द ने अमेरिका की आत्मा का आविष्कार किया।’’
लेखिका के अनुसार, स्वामी विवेकानन्द की सबसे बड़ी देन वेदान्त है, जो अमेरिकनों की अपूर्णता को दूर कर देगा। परन्तु दुर्भाग्य यह है कि वह ‘Gift’ (भेंट) अब भी‘Unopened’ (अनखुली) ही रह गई। यह अनमोल ‘Gift’ क्या है ? इस बात पर सम्पूर्ण विश्व को विचार करना होगा, विशेषतः भारत को। शिकागो में हुए ‘विश्वधर्म सम्मलेन’ में स्वामीजी द्वारा दिए गए सन्देश को सही परिप्रेक्ष्य में समझकर उसे जनमानस तक पहुंचना होगा।
विश्वधर्म महासभा और स्वामीजी का सन्देश
विश्वधर्म महासभा में स्वामी विवेकानन्द द्वारा दिए गए विश्वबंधुत्व के सन्देश का जिस प्रकार विश्व ने स्वागत किया, उससे यह स्पष्ट हो गया कि आवश्यकता है और इसलिए भारत को अपने दायित्व के प्रति सचेत होना होगा। कोलंबस के अमेरिका की खोज की 400वीं शताब्दी मनाने के उपलक्ष्य में विश्वधर्म महासभा का आयोजन किया गया था। इस धर्म महासभा के आयोजन का मूल उद्देश्य केवल ईसाई धर्म का वर्चस्व सिद्ध करना था। इस प्रकार की निषेधक (Exclusive) एवं दुराग्रही विचारधारा केवल स्वयं के मत को सही मानती है। ऐसी धारणा बनने पर दूसरे मतों के प्रति द्वेष निर्माण होता है। इसी हठधर्मिता के कारण ही उसके अनुयायी जोर-जबरदस्ती से मतांतरण में लग जाते हैं। ‘केवल हमारा ही मत सर्वश्रेष्ठ है बाकी सब गलत’, ईसाई और मुस्लिमों की ऐसी कट्टरता ही मानव इतिहास में रक्तपात और हत्याआं के लिए कारणीभूत है, इस बात से स्वामी विवेकानन्द अवगत थे।
11 सितम्बर, 1893 को अमेरिका के शिकागो में विश्व धर्म सम्मेलन के पहले दिन स्वामी विवेकानन्द ने अपने सात मिनट के छोटे से व्याख्यान से दुनिया को जीत लिया। “मेरे अमेरिका के बहनों और भाइयों...” कहकर उन्होंने अपना उद्बोधन प्रारंभ किया। स्वामीजी के इस प्रसिद्ध एवं प्रथम उदबोधन का यह प्रथम वाक्य, जिसने वहां के श्रोताओं के हृदय में मानों एक अदभुत विद्युत तरंगों को प्रवाहित कर दिया। यह केवल उद्बोधन की मात्र एक शैली नहीं थी, अपितु स्वामीजी के उन शब्दों में भारत की महान आध्यात्मिक शक्तियां ही मुखरित हुईं। अपने इस भाषण में स्वामीजी ने कहा कि, “मुझे ऐसे देश का धर्मावलम्बी होने का गौरव है, जिसने संसार को ‘सहिष्णुता’ तथा ‘सभी धर्मों को मान्यता प्रदान’ करने की शिक्षा दी है। मुझे एक ऐसे देश का व्यक्ति होने का अभिमान है, जिसने इस पृथ्वी की समस्त पीड़ित और शरणागत जातियों तथा विभिन्न धर्मों के बहिष्कृत मतावलम्बियों को आश्रय दिया है।”
हिंदुओं की इसी वैश्विक विचारधारा के कारण, जिस ईश्वर की मैं पूजा करता हूं, ‘केवल वही एकमात्र ईश्वर है’ ऐसा उन्होंने कभी नहीं कहा, अपितु वे कहते हैं कि विश्व में केवल ‘ईश्वर’ ही है। वही एक ईश्वर अनेक रूपों में प्रगट हुआ है। इसलिए हमारा ही ईश्वर सत्य है और दूसरों का ईश्वर झूठ है, ऐसा हम नहीं कहते। हम अन्यों के देवताओं को भी ईश्वर कहते हैं। यह हमारा सर्वसमावेशक चिंतन है। कट्टर विचारधारा कहती है- ‘केवल यही’, सर्वसमावेशक चिंतन कहता है ‘यह भी’। सर्वसमावेशक चिंतन के कारण हिंदुओं ने दूसरों की मान्यताओं को नष्ट करने का प्रयास कभी नहीं किया। विश्वबंधुत्व की स्थापना के लिए सभी मान्यताओं व मताबलम्बियों द्वारा इस ‘यह भी’ को स्वीकार करना आवश्यक है। सृष्टि के प्रति एकात्मभाव से जुड़ने के कारण ही हिन्दू इस ‘यह भी’ को मनाता है। सृष्टि को उस ‘एक’ की ही अभिव्यक्ति मानकर हिन्दू सबका आदर करते हैं, उसे स्वीकार करते हैं और इसलिए उनके द्वारा अनेकता का भी आदर होता है। इसी कारण मनुष्यात्मा पापी नहीं, अपितु अमर्त्य है, पूर्ण है। यही भारत का संदेश है जो उसे विश्व को देना है। अपने दर्शनों और सर्वसमावेशक दृष्टि के कारण ही नियति ने भारत को बंधुत्व स्थापित करने के लिए चयन किया है।
अमेरिका का वह श्रोता समाज जो केवल हठधर्मिता का दावा ही सुनते आया था, उन्होंने प्रथमतः स्वामी विवेकानन्द के द्वारा धार्मिक एकता का संदेश सुना- ‘...किन्तु,यदि यहां कोई यह आशा कर रहा कि यह एकता किसी एक धर्म की विजय और बाकी सब धर्मों के विनाश से सिद्ध होगी, तो उनसे मेरा कहना है कि ‘भाई, तुम्हारी यह आशा असंभव है।’ ...इस सर्वधर्म महासभा ने जगत के समक्ष यदि कुछ प्रदर्शित किया है,तो वह यह है कि - शुद्धता, पवित्रता और दयाशीलता किसी सम्प्रदाय विशेष की एकान्तिक सम्पत्ति नहीं है, एवं प्रत्येक धर्म ने श्रेष्ठ एवं अतिशय उन्नत-चरित्र के स्त्री-पुरुषों को जन्म दिया है। अब इन प्रत्यक्ष प्रमाणों के बावजूद भी यदि कोई ऐसा स्वप्न देखे कि अन्यान्य सारे धर्म नष्ट हो जाएंगे और केवल उसका धर्म ही जीवित रहेगा, तो उसपर मैं अपने हृदय के अन्तःस्थल दया करता हूं और उसे स्पष्ट बता देता हूं कि शीघ्र ही सारे प्रतिरोधों के बावजूद, प्रत्येक धर्म की पताका पर यह स्वर्णअक्षरों में लिखा होगा- ‘युद्ध नहीं, सहायता’, ‘विनाश नहीं, सृजन’, ‘कलह नहीं, शांति’ और‘मतभेद नहीं, मिलन!’

पहली बार स्वामी विवेकानन्द के रूप में पश्चिमात्य श्रोता समाज ने विश्वबंधुत्व का संदेश उचित समय पर सही परिप्रेक्ष्य में समझा। इसलिए विवेकानन्द केंद्र के संस्थापक श्री एकनाथजी रानडे यह चाहते थे कि यह दिन ‘विश्वबंधुत्व दिन’ के रूप में मनाया जाए। केवल बाहरी एकता से समाज में विश्वबंधुत्व नहीं जागेगा, बल्कि अधिक कलह और विनाश ही होगा। विविध मतों में एकात्मता और अन्य मतों का भी स्वीकार करने से ही विश्वबंधुता प्रस्थापित होगा। बनावटी एकता अपने व्यक्तित्व और परम्परागत मूल्यों को नष्ट करती है। किन्तु एकात्मता विविध समुदायों की विशेषताओं को बनाए रखते हुए बंधुत्व के सूत्र में बांधती है। इसलिए इस दिन का संदेश उनके लिए भी है जो हठधर्मी है और मतांतरण के माध्यम से विविध जनजाति समुदायों की मान्यताओं और संस्कृति को करते हैं।
 स्वामी विवेकानन्दजी ने विश्वपटल पर जहां भारत को गौरवान्वित किया, वहीं उन्होंने भारत आकर भारतीय जनमानस को झंझोर कर जगाया। इतना ही नहीं उन्होंने भारत में विद्यमान सभी मत-सम्प्रदायों और जातियों में व्याप्त दोषों से जनसामान्य को अवगत कराया और बताया कि मैं उस धर्म में विश्वास नहीं करता जो किसी भूखे को रोटी न दे सके। उनका स्पष्ट कहना था कि देश की गरीबी, अज्ञानता, विषमता और नारी समाज की उन्नति के बिना भारत का उत्थान संभव नहीं है।
स्वामी विवेकानन्द ने अग्रेजों के अत्याचारों से त्रस्त और हताशा में डूबे भारतवर्ष में स्वतंत्रता की चाह उपजायी। गुलामी की जंजीरों में जकड़े भारतीय समाज को स्वतंत्रता का मंत्र देते हुए उन्होंने कहा, “आगामी पचास वर्ष के लिए यह जननी जन्मभूमि भारतमाता ही मानो आराध्य देवी बन जाए। तब तक के लिए हमारे मस्तिष्क से व्यर्थ के देवी- देवताओं के हट जाने में कुछ भी हानि नहीं है। अपना सारा ध्यान इसी एक ईश्वर पर लगाओ, हमारा देश ही हमारा जाग्रत देवता है। सर्वत्र् उसके हाथ हैं, सर्वत्र् उसके पैर हैं और सर्वत्र उसके कान हैं। समझ लो कि दूसरे देवी-देवता सो रहे हैं। जिन व्यर्थ के देवी-देवताओं को हम देख नहीं पाते, उनके पीछे तो हम बेकार दौडें और जिस विराट् देवता को हम अपने चारों ओर देख रहे हैं, उसकी पूजा ही न करें? जब हम इस प्रत्यक्ष देवता की पूजा कर लेंगे, तभी हम दूसरे देव-देवियों की पूजा करने योग्य होंगे, अन्यथा नहीं।”
आज जब हम स्वामी विवेकानन्दजी के विचारों का अध्ययन करते हैं तो ज्ञात होता है कि स्वामीजी एक संन्यासी होने के बावजूद देश की वास्तविक स्थिति पर सूक्ष्म दृष्टि रखते थे। अध्यात्म को व्यावहारिक जीवन में प्रगट करने पर वे विशेष जोर देते थे। उन्होंने कहा भी कि, “त्याग और सेवा ही भारत का राष्ट्रीय आदर्श है।” बिना त्याग और सेवा के देश का उत्थान नहीं हो सकता। इसलिए आज की आवश्यकता है कि हम हमारे देशवासियों को इससे अवगत कराएं ताकि सब लोग अपने व्यक्तिगत जीवन में त्याग और सेवा को चरितार्थ कर सकें। इस विश्वबंधुत्व दिन के उपलक्ष्य में हमें विश्वधर्म महासभा में स्वामी विवेकानन्दजी द्वारा दिए गए संदेश का स्वाध्याय करना चाहिए। केवल प्रथम दिवस के सुप्रसिद्ध व्याख्यान का ही नहीं अपितु ‘हिन्दू धर्म पर निबंध’ का भी अध्ययन आवश्यक है, और उसके अनुसार कार्य करने में ही ‘विश्व बन्धुत्व दिन’ की स्मृति की सार्थकता है।