कश्मीर पर शेख अब्दुल्ला का छल
   दिनांक 12-सितंबर-2019
 प्रो. कपिल कुमार
1947 में जब कश्मीर में कबाइलियों ने हमले शुरू किए तो सरदार पटेल ले मंत्रिमंडल की बैठक में प्रस्ताव रखा कि कबाइलियों के ठिकानों को वायुसेना द्वारा बम बरसा के नष्ट कर देना चाहिए पर नेहरू ने इस प्रस्ताव को नहीं माना

कश्मीर पर मोल-तोल?: तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के साथ शेख अब्दुल्ला (फाइल चित्र)
पिछले दिनों जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने अमेरिका में जाकर यह कहा कि 40,000 आतंकी पाकिस्तान में तैयार बैठे हैं, तो कुछ झूठ नहीं कहा था। वास्तव में 1947 से ही भारत के विरुद्ध पाकिस्तान ने आतंकियों को छोड़ा हुआ है। इसके लिए उसने अलग-अलग हथकण्डे अपनाए हैं। कश्मीर पर पाकिस्तान की नजर शुरू से ही रही है, पर उसके नेता जानते थे कि वे उसे सैन्य-बल से हासिल नहीं कर सकते। इसके अतिरिक्त पाकिस्तान उस समय घबराया हुआ था कि कहीं भारत सैन्य कार्रवाई से उसके अस्तित्व को न मिटा दे। उसके इस डर के पीछे एक महत्वपूर्ण कारण था जिसे पाकिस्तानी अधिकारियों ने निरंतर संयुक्त राष्ट्र के सामने रखा था। 1947 से पहले उत्तर-पश्चिमी सीमान्त प्रान्त और सीमावर्ती इलाकों को लेकर अफगानिस्तान और अंग्रेजों के बीच हमेशा तनातनी रही। 19वीं शताब्दी में अंग्रेजों को अफगानिस्तान के विरुद्ध किसी भी युद्ध में सफलता नहीं मिली थी। आज वह सीमा पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा है।
उत्तर-पश्चिमी सीमांत प्रान्त में अब्दुल गफ्फार खान जैसे राष्ट्रवादी पाकिस्तान के निर्माण का निरंतर विरोध करते रहे थे, परन्तु कांग्रेसी नेताओं ने उन्हें पाकिस्तान के हवाले कर दिया। स्वयं गांधी ने उनसे कहा था कि 'पाकिस्तान अब एक वास्तविकता है और आप जिन्ना के साथ सहयोग करें'। इस समय 'पठानिस्तान' की मांग भी उभर आई थी जिसे अफगानिस्तान का समर्थन प्राप्त था। पाकिस्तान को अपने अस्तित्व पर जो खतरा दिखाई दे रहा था, उससे निपटने के लिए उन्होंने एक भयंकर चाल चली। जहां एक तरफ गफ्फार बंधुओं को हिरासत में लेकर कांग्रेस की सरकार को भंग कर उनके समर्थकों को जेलों में डाला गया और विरोध करने पर गोलियों से भून दिया गया तो दूसरी तरफ 'इस्लाम खतरे में है' का नारा दिया गया। याद रहे कि यह नारा तालिबान बनाते समय भी दिया गया था और आज भी पाकिस्तान के पूर्व मंत्री पीरजादा वहां के टीवी चैनलों पर यह कह रहे हैं कि 'जो भी हिन्दू कश्मीर में जमीन खरीदने आए, मुसलमान उसकी हत्या कर दें'।
इमरान खान हिन्दुओं को हिटलर बता रहे हैं। वास्तव में 1947-48 में कबाइली पठानों द्वारा अपनी आजादी के लड़ाई के लिए अफगानिस्तान से सहायता लेने के बाद पाकिस्तान ने यह झूठा प्रचार किया कि 'कश्मीर का राजा हरिसिंह हिन्दू है और वहां मुसलमानों का कत्लेआम हो रहा है'। यही नहीं, उसने विभाजन की हिंसा को भी इससे जोड़ दिया और कबाइलियों को इस्लाम का वास्ता देकर कश्मीर के रास्ते पटियाला तक को जीतने की बात कही, जहां का राजा एक सिख था।
कबाइलियों को लाखों की संख्या में रेलगाडि़यों और लॉरी के द्वारा रावलपिण्डी लाया गया। उन्हें शस्त्र दिए गए और कश्मीर पर हल्ला बोला गया। उस समय पाकिस्तान में मौजूद सभी अंग्रेज अफसरों को यह मालूम था कि पाकिस्तानी हुकूमत, और उसके सैन्य अफसर प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से यह कार्य कर रहे हैं। यह हाल ही में प्रकाशित अंग्रेजों के गुप्त पत्र व्यवहार से सिद्ध है।
शीघ्र ही कबाइली हमले का आडम्बर छोड़ पाकिस्तानी सेना कश्मीर में सीधे आक्रमण करने लगी और वहां स्थित अंग्रेज सैनिक अफसर उसका नेतृत्व कर रहे थे। पाकिस्तान का तर्क था कि यदि वे ऐसा नहीं करते तो भारतीय सेना उनका अस्तित्व मिटा देती। अंग्रेज अफसर भारतीय नेताओं को यह समझाने की कोशिश कर रहे थे कि 'अब हैदराबाद तो तुमने ले लिया है, लेकिन कश्मीर पर उदार नीति अपनाओ'। परन्तु सरदार पटेल को यह स्वीकार्य नहीं था। उन्होंने तो कबाइली हमला होते ही मंत्रिमण्डल की बैठक में प्रस्ताव रखा था कि कबाइलियों के ठिकानों को वायुसेना द्वारा बम बरसा कर नष्ट कर देना चाहिए, परन्तु नेहरू ने इस प्रस्ताव को नहीं माना। यह ऐसा समय था जब जयप्रकाश नारायण ने 10 अगस्त 1947 को एक सभा में कहा था कि 'कश्मीर का फैसला संयुक्त राष्ट्र नहीं करेगा बल्कि दोनों देशों की सेनाएं युद्ध भूमि पर करेंगी'। यहां गौर करने की एक और बात है कि जब शुरू में यह हमला कबाइलियों ने किया था और कबाइली किसी देश के नहीं थे तो नेहरू इस मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र में क्यों ले गए? 1948 में अंग्रेजी हुकूमत यह भी प्रस्तावित कर रही थी कि 'डोगरा बहुल जम्मू का इलाका भारत को दे दिया जाए, लेह में जनमत कराया जाए और घाटी तथा अन्य इलाके मुस्लिम बहुल होने के कारण पाकिस्तान को दे दिए जाएं'।
उल्लेखनीय है कि भारतीय सेना ने कबाइलियों और पाकिस्तानी सेना को कश्मीर से खदेड़ना प्रारंभ कर दिया था। अंग्रेज भारत पर यह दबाव डाल रहे थे कि कश्मीर की जगह वह पंजाब और राजस्थान में युद्ध का मोर्चा न खोले, क्योंकि वह जानते थे कि पाकिस्तान भारतीय सेना से लड़ नहीं पाएगा। इसी समय जनरल थिमैया ने भारत सरकार को यह स्पष्ट कर दिया था कि युद्ध विराम तब तक न किया जाए जब तक कि भारतीय सेना पूरे कश्मीर से पाकिस्तानियों को खदेड़कर उसे भारत का हिस्सा न बना ले। परन्तु नेहरू ने सेना की इस राय को नहीं माना और युद्ध विराम स्वीकार कर लिया। इस प्रकार पाक-कब्जे वाले कश्मीर का जन्म हुआ। भारतीय सेना ने सरकार का निर्णय तो मान लिया था परन्तु जनरल थिमैया इससे नाराज थे क्योंकि कश्मीर को बचाने में भारतीय सेना ने कुर्बानियां दी और उनका बलिदान तभी सार्थक होता जब आगे बढ़ती भारतीय सेना पूरे कश्मीर को पाकिस्तान से मुक्त करा लेती।
नेहरू का यह समझौतावादी रवैया केवल यहीं नहीं रुका। दस्तावेज बताते हैं कि शेख अब्दुल्ला सबसे सांठगांठ कर रहे थे और पाकिस्तानियों से मिलकर यहां मंशा बना रहे थे कि पूरा को 'आजाद कश्मीर' बनवा दिया जाए। इस सबके बावजूद भारतीय संविधान में नेहरू ने कश्मीर के लिए अनुच्छेद 370 का विषेष प्रावधान करवाया। इतना ही नहीं, आगे चलकर नेहरू ने भारत की संसद को विश्वास में लिए बिना धारा 35ए भी केवल राष्ट्रपति के आदेश से इसमें जोड़ दी। डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने अनुच्छेद 370 के विरोध में कश्मीर जाकर प्रदर्शन किया था जिस पर उन्हें कैद कर लिया गया और जेल में उनकी रहस्यमय मृत्यु हो गई। परन्तु नेहरू ने डॉ. मुखर्जी की रहस्यमय मृत्यु की जांच नहीं कराई। और जब तक शेख अब्दुल्ला की करतूतें सामने आईं तो नेहरू ने उन्हें गिरफ्तार तो करवाया पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
आज भी पाकिस्तान वही राग अलाप रहा है। दुर्भाग्य से, हमारे देश के सेकुलर नेता और पत्रकार पाकिस्तान के समर्थन में खड़े हैं। पाकिस्तान की सेना कश्मीर में भारत के खिलाफ, हिन्दुओं के खिलाफ दुष्प्रचार कराती है, आतंकियों को पालती है। अंतत: इस अंतर पर ध्यान दें कि भारत की सेना एक प्रजातांत्रिक सरकार के आदेश पर चलती है, जबकि पाकिस्तान में पूरा देश सेना और वहां की खुफिया एजेंसी आईएसआई के आदेश पर चलता है।
(लेखक 'इग्नू' में स्वतंत्रता संघर्ष और प्रवासी अध्ययन केन्द्र के निदेशक और इतिहास विभागाध्यक्ष हैं)