खड़ी बोली के प्रथम कवि संत गंगादास
   दिनांक 12-सितंबर-2019
डॉ. चन्द्र पाल शर्मा
बहुआयामी प्रतिभा के धनी संत गंगादास खड़ी बोली के पहले कवि माने जाते हैं, लेकिन दुर्भाग्य से उन्हें हिंदी साहित्य में वह स्थान नहीं मिला, जिसके वे अधिकारी थे। उनका काव्य अनूठा माना जाता है। अब कुछ साहित्यकारों ने उन पर शोध करना शुरू किया है

जो लोग अपने पूर्वजों को भूल जाते हैं उनका अतीत धूमिल हो जाता है। कभी मेरठ जनपद का भाग रहे रसलपुर-बहलोलपुर में 1823 ई. में जन्मे गंगाबख्श (बाद में संत गंगादास) भी अपनी मृत्यु के लगभग 75-80 वर्ष तक साहित्य-समाज में अपरिचित ही रहे। संत गंगादास को साहित्य-जगत में स्थापित करने का कार्य मेरठ के दो सपूतों क्षेमचन्द्र सुमन और डॉ. जगन्नाथ शर्मा 'हंस' ने किया। क्षेमचन्द्र सुमन ने मेरठ से प्रकाशित पत्रिका 'साहित्यिक चेतना' में संत गंगादास पर पहला लेख लिखा और फिर अपने अनुपम ग्रंथ 'दिवंगत हिन्दी-सेवी' में उन पर महत्वपूर्ण सामग्री दी। डॉ. जगन्नाथ शर्मा 'हंस' ने 1970 ई. में संत गंगादास के काव्य पर प्रथम शोध प्रबंध प्रस्तुत किया। फिर तो हंस जी के निर्देशन में 16 शोधार्थियों ने संत गंगादास के साहित्य पर अपने-अपने शोध प्रबंध प्रस्तुत किए। दु:ख की बात है कि हिंदी के इतिहास-लेखकों ने संत गंगादास का उल्लेख तक नहीं किया।
डॉ. जगन्नाथ शर्मा 'हंस' के ग्रंथ के शोध परीक्षक डॉ. राम कुमार वर्मा ने अपनी रपट में लिखा था, ''ज्ञान, भक्ति और काव्य की दृष्टि से संत कवि गंगादास विशेष प्रतिभावान रहे हैं, परंतु इनका काव्य अनुपलब्ध होने के कारण हिंदी-साहित्य के इतिहास में इनका उल्लेख नहीं हो सका था।'' वहीं आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा, ''हिंदी साहित्य के इतिहास में एक महत्वपूर्ण भूमिका के अतिरिक्त संत काव्य की सौंदर्य दृष्टि और कला पर संत गंगादास का काव्य सुंदर प्रकाश डालता है।'' दूसरे परीक्षक डॉ. विजयेन्द्र स्नातक ने अपना मत इस प्रकार दिया, ''संत कवि गंगादास का काव्य भारतेंदु पूर्व खड़ी बोली हिंदी काव्य का उच्चतम निदर्शन है और हिंदी-साहित्य के इतिहास की अनेक पुरानी मान्यताओं के परिवर्तन का स्पष्ट उद्घोष भी करता है।'' पद्मश्री क्षेमचन्द्र सुमन लिखते हैं, ''संत गंगादास खड़ी बोली के पितामह, आधुनिक काव्य के प्रेरणास्रोत और कुरुप्रदेश के गौरव हैं। कबीर का फक्कड़पन, सूर की भक्ति, तुलसी का समन्वय, केशव की छंद योजना और बिहारी की कला एक ही स्थान पर देखनी हो, तो संत गंगादास का काव्य उसका उदात्त उदाहरण है।''
हिंदी साहित्य का सामान्य विद्यार्थी यही जानता आया है कि खड़ी बोली साहित्य का प्रारंभ भारतेंदु युग से हुआ, किंतु भारतेंदु का जन्म संत गंगादास के जन्म के 27 वर्ष बाद हुआ। भारतेंदु ने बड़े संकोच और भय के साथ 1881 में खड़ी बोली में 'भारतमित्र' में प्रकाशन के लिए कविता भेजी थी, जो बहुत ही सामान्य स्तरीय रचना थी। इस समय संत गंगादास की आयु 58 वर्ष थी और वे खड़ी बोली में विविध विषयों पर श्रेष्ठ काव्य रचना कर रहे थे। अत: हिंदी के आधुनिक पाठक का यह दायित्व है कि वह क्षेमचन्द्र सुमन के उपरिलिखित कथन को हिंदी के छात्रों तक पहुंचाएं कि संत गंगादास खड़ी बोली काव्य के प्रथम रचनाकार हैं।
डॉ. जगन्नाथ शर्मा ने संत गंगादास की हस्तलिखित पांडुलिपियों एवं प्रकाशित पुस्तकों की सूची देते हुए उनकी संख्या क्रमश: 21 व 15 बताई है।
संत गंगादास के काव्य में भक्ति, दर्शन, वैराग्य, गुरु-महिमा, रहस्यवाद, लोक साहित्य, समाज-सुधार, नीति आदि के विविध रूपों का विस्तार से वर्णन है। उनका काव्य गंभीर से गंभीर अध्येता के लिए भी चिंतन का विषय है और सामान्य से सामान्य पाठक को भी अपने साथ जोड़ने की सामर्थ्य रखता है। हमारी संस्कृति में गुरु का बहुत महत्व है। गुरु को ब्रह्मा, विष्णु, महेश के समकक्ष बताया गया है। कबीर तो गुरु को ईश्वर से पहले प्रणम्य मानते हैं। 'आचार्य देवोभव' को मानने वाले संत गंगादास भी गुरु को महा मोह के सिंधु से पार लगाने वाला
मानते हैं-
बह जाते सतगुरु तार दिए।
महा मोह सिंधु की धारा॥
उनका विश्वास है कि संसार रूपी नौका को गुरु ही किनारे लगा सकता है।
बिन सतगुरु को पार लगैया।
ना नैया ना मिले खिवैया।
'गंगादास' सत्य कहूं भैया।
भक्ति में कवि का मन रमता है। कवि निर्गुण-सगुण के खेमे में अपने आराध्य को नहीं बांटता। ईश्वर के दोनों रूप ही उसका मन मोह लेते हैं। वह गोस्वामी तुलसीदास के मत से सहमत है- अगुनहिं सगुनहिं नहिं कछु भेदा। उसकी तो केवल इतनी इच्छा है।
राजपाट धन माल ना चाहिए,
ना सुख भोग विलास।
जो पिया मिलें यही वर मांगू,
बसो हमारे पास॥
तुलसी से तुलना करके देखिए -
अरथ न धरम न काम रुचि
गति न चहौं निर्वान।
जनम-जनम रति राम पद
यह वरदान न आन॥
भगवान से भक्त व्यक्तिगत संबंध जोड़ता है। कबीर अपने को 'राम की बहुरिया' कहते थे तो तुलसी को 'राम का गुलाम' होने का गर्व है। मीरा तो डंके की चोट पर कहती है, 'जाके सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई।' इसी प्रकार संत गंगादास भी अपने परमात्मा रूपी पति के वियोग से क्लेश पाते हैं -
सजन बिन सूने सारे देस,
सखी मैं कैसे भरूं क्लेश॥ टेक॥
खोज फिरी पिया कहीं न पाए,
घर-घर नाना भेस॥
कवि का भगवान संसार के कण-कण में व्याप्त है, वह उसकी शरण में ही रहना चाहता है। अत: वह हर समय प्रिय के दर्शन की ललक लिए रहता है -
उठकर झटपट पट खोल पिया,
तेरे दर्शन की प्यासी मैं।
कवि अपने इष्ट के सामने अपनी दीनता प्रकट करते हुए, अपने को उसका पशु मान लेता है। अब उसके ऊपर निर्भर करता है कि वह चाहे बेच दे, बांध ले, खोल दे, उसे कोई गुरेज नहीं है-
उजर नहीं है आपसे, बेचो या लो मोल।
हाथ आपके नाव है, बांधों या दो खोल॥
बांधो या दो खोल पशु हैं आज तुम्हारे।
जो चाहो सो करो दास महाराज तुम्हारे॥
जगन्नाथ दास 'रत्नाकर' की गोपियां कृष्ण को संदेश भेजते समय कहती हैं-
भली है, बुरी है, सलज है,
निलज है, जो कहौ, सो निहारी है।
ये परिचारिका तिहारी है।
वैराग्य भक्ति का अंतिम पड़ाव है। सबसे पहले जगत् के मिथ्यात्व का अनुभव करना होता है-
सब जगत काल का चारा,
कोई अमर रहे ना रहे गये।
सारा संसार माया का खेल है। अत: पहले वैराग्य लेना पड़ता है, तभी संन्यास का अवसर मिलता है, व्यक्तिक्रम उचित नहीं है-
जब तलक तीव्र वैराग्य नहीं, पागल! संन्याय लिया क्यों?
माया ही सारे संसार को घुमा रही है। कबीर को माया महा ठगनी लगती है और तुलसी मोर-तोर को माया मानते हैं। संत गंगादास को सारा जगत माया के चक्र में बहता प्रतीत होता है-
सब जगत आत्माराम की,
माया में बहे फिरैं हैं।
संत गंगादास इस माया को जगठगनी मानते हैं, 'जग ठगनी के परताप में, कर लिए नुकसान घरी मैं।' यह सारा संसार स्वप्नवत् है, माया के कारण ही सत्य भासित हो रहा है- 'सब जग सुपने की माया है।'
वैराग्य से संन्यास की भावना जाग्रत होती है, तो संन्यास व्यक्ति को दार्शनिक बना देता है। इस स्थिति में पहुंचकर संत गंगादास कहते हैं -
व्यापक हूं सब संसार में,
मुझमें संसार नहीं है।
कवि वेद का पक्षधर है, योग व वेदांत उसके प्रिय दर्शन हैं। उसने अष्टांग योग का अनेक पदों में वर्णन किया है। योग की शब्दावली का काव्य में खुल कर
प्रयोग है-
पूरक, रेचक, कुंभक करके।
सोहम् शब्द निशाना धरके।
जाय बसें बेगमपुर हर कै॥
सोहम् सोहम् शब्द अराधै।
भवरी कोई खेचरी साधे।
उडि़यान जलंधर मूलबन्द की।
निरखै है गति रवि चन्द की॥
साधना के उच्च शिखर पर पहुंचने के बाद कवि रहस्यवादी बन जाता है। उसे वैराग्य में संसार असार लगता है, तो यह शरीर मिट्टी का ढेला प्रतीत होने लगता है। उसकी जिज्ञासा प्रबल हो उठती है-
खबर नहीं हम कहां से आए।
कहां जाएंगे, भेद न पाए।
ना मालूम कहां भरमाए।
ए सोच है बारम्बार हमें,
पहले घर बार कहां है?
यह सोच बार-बार विचलित करती है-
जड़ जगत कहां से आया और फिर कहां जाता है?
ऐसे में कवि संसार को जगाने का कार्य करना चाहता है। वह मन की चंचलता को समझ गया है, 'मन ने बड़े नाच नचाए।' सभी भक्त मन के नचाए जाने से परेशान रहे हैं। सुरदास ने लिखा है, 'अब मैं नाच्यौ बहुत गुपाल।' अत: कवि अपने मूर्ख मन को रोकने का प्रयास करता है। वह आत्मनिरीक्षण करता है।
मत तकै पराये दोष तू,
सब दोेष देख आपे में।
ऐसा प्रतीत होता है कि संत गंगादास संत परंपरा के श्रेष्ठ कवि कबीर से बहुत प्रभावित हैं। अत: भक्ति, वैराग्य, दर्शन के साथ वे समाज-सुधारक के रूप में भी दिखाई देते हैं। वह कबीर के समान हिंदू-मुसलमान दोनों पर चोट करते हैं-
हिंदू मिथ्यापन में हारे तुर्क
हार गये तूफान में।
ना ऊंचे पै बसै खुदा
ना समझो वहां पर गहरा है।
मुल्ला पढ़े मुनारे पै तू
ऐसा क्या वो बहरा है॥
कबीर भी ठीक ऐसा ही कह गए थे -
मस्जिद चढ़ के, मुल्ला पुकारे क्या साहिब तेरा बहरा है?
वह पूछता है कि 'खुदा फकत मक्केई रहता है।' ऐसा नहीं है, वह सब जगह समाया हुआ है। खुदा को पाने के लिए अपने अहंकार का त्याग करना पड़ता है-
खुदी जाय तब खुदा को पावे।
खुदी में खुदा हाथ नहीं आवे॥
कबीर भी यही कहते हैं- 'जब मैं था तब हरि नाहिं अब हरि है मैं नाहिं।' ये अहंकारी जीव आशारूपी गंभीर नदी के प्रवाह में बह जाते हैं -
'आसा गंभीर नदी में,
बह गये जीव हंकारी।'
हिंदुओं को अपनी जाति, आश्रम व वर्ण व्यवस्था पर बड़ा गर्व रहता है। उनको समझाते हुए गंगादास कहते हैं -
देह वर्ण आश्रम जात पै,
मत अटकै सोग सहेगा।
कबीर ने ब्राह्मण-तुर्क, पुरोहित-मुल्ला को खुलकर फटकारा था। संत गंगादास गेरुए कपड़े पहनकर संन्यासी समझने वालों को फटकारते हुए कहते हैं -
'दिल रंगा नहीं उस रंग में,
क्या है कपड़े रंगने में।'
समाज-सुधारक का काम केवल दोष-दर्शन करना ही नहीं होता, अपितु वह मार्ग भी बताता है। गंगादास भी अनेक नीतिपरक बात कहते हैं -
खोटे की संगत दुखदाई।
जो कोई करै सो भरे तबाई।
भला करे सो देय बुराई।
अत: अच्छे कर्म करो, बुरे कमार्ें का फल तो बुरा ही मिलेगा -
बोए पेड़ बबूल के, खाना चाहे दाख।
ये गुन मत परकट करै,
मन के मन में राख॥
व्यक्ति यदि सुख चाहता है तो वह जीवों पर दया करे। सत्य को व्यवहार में लाए, संतों की सेवा करे, पर-उपकार में लगा रहे-
चारों, चारों युग से, सुखदायक हैं चार।
दया, सत्य अरु संत ये,
चौथ पर-उपकार॥
मनुष्य को मान-बड़ाई, ईर्ष्या, आशा और तृष्णा को त्यागकर ही जप-तप में लगना चाहिए। क्रोध, लोभ, मोह और काम को तस्कर समझकर त्याग देना चाहिए। तुलसी कहते हैं-'धीरज-धरम मित्र अरू नारी। आपतकाल परखिये चारी॥' संत गंगादास भी इसी सुर में सुर मिलाते हैं -
इनकू चाहिए जांचना वक्त पड़े
जब आन।
धर्म, मित्र, धीरज, वधू, विपता में पैछान॥
कवि अपने काल की दशा को देखकर बहुत दु:खी है। उसे सब पथ से भटके दिखाई दे रहे हैं -
पाप परायन नर अरु नारी।
भये गयी सब की मति मारी।
जोगी, संन्यासी, ब्रह्मचारी।
बुरे कर्म से ना डरते हैं,
कहीं लेश रही ना धरम की
समस्त प्रजा पाप से पीडि़त है। उसका उद्देश्य केवल पेट भरना रह गया है। ऊंच-नीच कमार्ें का ध्यान ही मिटा दिया है। धर्म-कर्म सब समाप्त हो गए हैं, पुत्र पिता से वाद-विवाद करते हैं। एक-दूसरे का सम्मान समाप्त हो गया। इसे कलियुग का प्रताप ही कहेंगे-
नीति हीन राजा अन्याई।
वेद विरोधी सठ दुखदाई।
पंथ चले अब तौल ना पाई।
कवि का भाव-पक्ष क्षेत्र बहुत विस्तृत है। उसने सभी रसों पर लेखनी चलाई है। भाषा कहीं संस्कृतनिष्ठ है, तो कहीं एकदम बोलचाल की है। कवि खड़ी बोली का सर्वप्रथम कवि है, किंतु उसमें हरियाणवी व पंजाबी के पुट को भी देखा जा सकता है। कहीं-कहीं ठेठ देशज शब्दों का प्रयोग है। शब्द निर्माण की क्षमता भी है। वह सुहागन की तर्ज पर विलोम के रूप में दुहागन का प्रयोग करता है। कभी के लिए बहुधा कदी का प्रयोग हुआ है। अनेक अलंकार देखे जा सकते हैं। अभिधा में कहने के साथ लक्षणा-व्यंजना का भी खुलकर प्रयोग हुआ है। छंद प्रयोग में तो वह केशव दास के वंशज मालूम पड़ते हैं। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि खड़ी बोली के इस प्रथम कवि के काव्य में प्रौढ़ता है, और विविध विषयों का सविस्तार वर्णन है। अत: इस कवि को उसका उचित स्थान मिलना चाहिए।
(लेखक हिन्दी के ख्यात विद्वान हैं)