जब कश्मीर में स्वयंसेवकों ने बलिदान देकर की भारतीय सेना की मदद
   दिनांक 14-सितंबर-2019
नरेंद्र सहगल
देश विभाजन के समय संघ के तरुण स्वयंसेवकों ने कश्मीर की रक्षा के लिए जो बलिदान दिए, वे भारत के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखने योग्य हैं। 15 अगस्त, 1947 प्रात: श्रीनगर में पाकिस्तानी ने गड़बड़ करनी शुरू कर दी। सभी सरकारी भवनों पर पाकिस्तान के हरे झंडे फहरा दिए। संघ के स्वयंसेवकों ने तुरंत संघ कार्यालय पर योजना बनाई। देखते ही देखते पाकिस्तान के झंडे उतार फेंके गए।

संघ के दो प्रमुख प्रचारकों हरीश भनोट और मंगल सेन ने पाकिस्तान की सैनिक गतिविधियों और संभावित आक्रमण की सूचना प्रमुख कार्यकर्ता बलराज मधोक को दी। महाराजा ने बलराज मधोक को बुलाया सारी जानकारी प्राप्त करने के बाद महाराजा ने संघ के 200 स्वयंसेवक उपस्थित करने का निर्देश दिया।
प्रात: 6 बजे 200 से आधिक स्वयंसेवक वहां उपस्थित थे। थोड़ी देर बाद फौजी ट्रक आए और इन तरुणों को लेकर बादामीबाग सैनिक छावनी में पहुंच गए। वहां तुरंत स्वयंसेवकों को राईफल चलानी सिखायी गई।शाम तक ये युवक मोर्चे पर जा पहुंचे। भारतीय फौजों के आने तक 2 दिन तक इन स्वयंसेवक सैनिकों ने रियासती फ़ौज की मदद की।शेख अब्दुल्ला श्रीनगर पर आक्रमण होने की जानकारी मिलते ही कश्मीरी जनता को उनके हाल पर छोड़ कर परिवार सहित बंबई भाग गया था। घाटी को संभाला और बचाया था पहले संघ के स्वयंसेवकों ने बाद में भारतीय सेना ने, भगोड़े शेख अब्दुल्ला ने नहीं।
पाकिस्तान की सेना को खदेड़ते हुए भारतीय सैनिकों की अनेक प्रकार की कठिनाइयों को स्वयंसेवकों ने अपने परिश्रम तथा बलिदान से दूर कर दिया। जम्मू सम्भाग के कोटली नामक स्थान पर स्थित एक नदी के किनारे भारतीय सैनिकों के लिए गिराए गए बारूद के बक्से पाकिस्तानी फ़ौज के नियन्त्रण वाले क्षेत्र में गिर गये। भारतीय सैनिकों की मदद के लिए पाकिस्तानी फौज के इलाके में जा गिरे बारूद के बक्सों को उठाकर लाने का बीड़ा संघ के आठ युवा स्वयंसेवकों ने उठाया। वे जंगली रास्ते से रेंगते हुए वहां पहुंचे और बारूद के आठों बक्से उठा कर ले आये। इस काम में 6 स्वयंसेवक पाकिस्तान की गोलियों से वीरगति को प्राप्त हुए
विलय करवाने में श्री गुरुजी की भूमिका
महाराजा हरि सिंह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री गुरुजी गोलवलकर का बहुत सम्मान करते थे। गांधी जी एवं सरदार पटेल भी इस मित्रता को जानते थे। अत: उन्होंने श्री गुरु जी से इस समस्या के समाधान हेतु निवेदन किया। श्री गुरुजी सरदार पटेल की व्यवस्था के अंतर्गत सरकारी विमान से पहले दिल्ली पहुंचे। उन्होंने सरदार पटेल से संक्षिप्त बातचीत की और उसी दिन 17 अक्टूबर,1947 को वे श्रीनगर नगर पहुंच गए। उनके साथ संघ के पंजाब प्रांत प्रचारक माधवराव मूले तथा उत्तर प्रदेश के प्रांत संघचालक बैरिस्टर नरेंद्र जीत सिंह भी थे। ये सब लोग श्रीनगर में बैरिस्टर साहब की ससुराल में ठहरे तथा 18 अक्टूबर,1947 को महाराजा से भेंट हुई। इस भेंट के समय युवराज कर्णसिंह, रियासत के दीवान मेहरचंद महाजन एवं महाराज के निजी सहायक कैप्टन दीवान सिंह भी मौजूद थे।
बहुत ही प्रेमपूर्वक माहौल में हुए इस वार्तालाप में श्री गुरुजी ने महाराजा को सरदार पटेल के हवाले से आश्वस्त कराते हुए कहा,“आप हिन्दू राजा हैं”। पाकिस्तान में विलय करने से आपकी हिन्दू प्रजा को भीषण संकटों से संघर्ष करना पड़ेगा।यह ठीक है कि अभी हिंदुस्तान और कश्मीर के रास्ते में रेल लाइन नहीं है, परन्तु सब ठीक हो जाएगा। आपका और ‘जम्मू कश्मीर’ रियासत का भला इसी में है कि आप भारत में विलय करें।
गुरुजी वापस दिल्ली आए और सरदार पटेल को सारी जानकारी दे कर नागपुर लौट गए। इसके बाद महाराजा हरिसिंह ने 26 अक्टूबर को जम्मू कश्मीर के भारत में विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए। 27 अक्टूबर को भारत केगवर्नरजनरल लार्ड माउन्टबेटन ने विलय स्वीकार करते हुए जम्मू कश्मीर को भारत में शामिल कर लिया। परन्तु देश के दुर्भाग्य से भारत के प्रधानमंत्री पंडित जवाहर नेहरू ने जम्मू कश्मीर के महाराजा हरी सिंह को रियासत की सत्ता शेख अब्दुल्ला को सौंपने का आदेश दे दिया।महाराजा को जम्मू कश्मीर छोड़ देने की हिदायत दे दी। यहीं से जम्मू कश्मीर की समस्या का श्री गणेश हो गया। पाकिस्तान कीसेना श्रीनगर तक आ पहुंची। जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय होते ही भारतीय सेना ने कश्मीर की ओर कूचकर दिया।
स्वयंसेवकों ने तैयार की हवाई पट्टियां
भारतीय वायु सेना को जम्मू कश्मीर में उतारने के लिए हवाई पट्टियां तो दयनीय हालत में थीं। उन्हें शीघ्र ठीक करने की जरूरत थी। अतः फौजी अफसरों और नागरिक अधिकारियों की निगाह संघ के स्वयंसेवकों पर गई। संघ के अधिकारी से बातचीत की गई। हजारों स्वयंसेवकों ने कमर कस ली। श्रीनगर, पुंछ और जम्मू, इन तीन स्थानों पर हवाई पट्टियां बनाने और संवारने का काम शुरू हो गया। यह काम दिन को तो चला ही था, परंतु समय की कमी और जरूरत की वजह से रात को भी चलता रहा। जमीन साफ करने का सामान अर्थात् गेंती-फावड़ा-खुर्पे इत्यादि की व्यवस्था भी संघ ने ही की।'देश को सबकुछ देंगे, बदले में कुछ नहीं लेंगे' के सिद्धांत पर चलनेवाले स्वयंसेवकों ने न रात देखी और न दिन, अपने कड़े परिश्रम से निश्चित अवधि के भीतर तीनों हवाई पट्टियों को हवाई जहाजों के उतरने योग्य बना दिया।
डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी व स्वयंसेवकों का बलिदान
पंडित जवाहरलाल नेहरू के खास दोस्त मुस्लिम कॉन्फ्रेंस के संस्थापक शेख मुहम्मद अब्दुल्ला ने जम्मू कश्मीर के वजीरे आला (मुख्यमंत्री) बनते ही अपनी हिंदू विरोधी मानसिकता का प्रदर्शन करना प्रारंभ कर दिया। कश्मीर के अल्पसंख्यक हिंदुओं और जम्मू सम्भाग के हिंदुओं पर तरह-तरह के गैरकानूनी जुर्म ढाए जाने लगे। मुस्लिम कॉन्फ्रेंस के लाल झण्डे को रियासत का झण्डा बना दिया गया। हिंदुओं को उनके धार्मिक एवं मौलिक अधिकारों से भी वंचित किया जाने लगा।
शेख अब्दुल्ला के द्वारा की जाने वाली एकतरफा तानाशाही के विरुद्ध जम्मू के लोगों ने एक प्रचण्ड जनान्दोलन करने का फैसला किया। संघ के प्रांत संघचालक पंडित प्रेमनाथ डोगरा के नेतृत्व में प्रजा परिषद नामक एक संगठन बनाया। इस संगठन में शेख के तानाशाही शासन एवं उसकी हिन्दू विरोधी राजनीतिक कार्य-प्रणाली को समाप्त करने के उद्देश्य से धरने, प्रदर्शनों, सत्याग्रहों एवं मुस्लिम कॉन्फ्रैंस के झण्डे (रियासती झण्डे) को उतारकर तिरंगा लहराने जैसे कार्यक्रमों की झड़ी लगा दी। यह आंदोलन जम्मू-कश्मीर सहित पूरे देश में फैल गया।
संघ ने अपनी पूरी शक्ति इस आंदोलन को सफल बनाने में झोंक दी। उस समय संघ के 27 प्रचारकों को भी इस आंदोलन की बागडोर संभालने के आदेश दे दिए गए।सरकारी भवनों पर तिरंगा लहराते हुए 17 स्वयंसेवक पुलिस की गोलियों से वीरगति को प्राप्त हुए। हजारों कार्यकर्ताओं को जेलों में बंद कर दिया गया। बलिदान देने, जख्मी होने और अमानवीय यातनाएं सहते हुए भी आम जनता की भागीदारी बढ़ती गई। इतने पर भी भारत के प्रधानमंत्री पंडित नेहरू का दिल नहीं पसीजा।
इन परिस्थितियों में जनसंघ के अध्यक्ष डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने प्रजा परिषद के आंदोलन का समर्थन कर दिया। एक देश में दो प्रधान, दो निशान, और दो विधान नहीं चलेंगें के उद्घोष के साथ बिना परमिट लिए जम्मू कश्मीर में प्रवेश किया। कश्मीर मिलीशिया (पुलिस) ने शेख के आदेशानुसार डॉक्टर साहब को गिरफ्तार करके श्रीनगर की तन्हाई जेल में डाल दिया। वहां रहस्यमयी परिस्थितियों में डॉक्टर मुखर्जी की मृत्यु हो गई।
सारे देश में हाहाकार मच गया नेहरू घबरा गए। उन्होंने प्रजा परिषद की अधिकांश मांगें मान ली। परमिट सिस्टम समाप्त हो गया। सदर-ए-रियासत और वजीरे आला के स्थान पर राज्यपाल और मुख्यमंत्री नाम स्वीकार कर लिए गए। शेख अब्दुल्लाह को गिरफ्तार करके जेल में भेज दिया गया। परंतु नेहरू जी ने अनुच्छेद 370 को नहीं हटाया। अब केंद्र में स्थापित भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने डॉक्टर श्यामा प्रसाद के एजेंडे को सफल कर दिया है। इसे संघ के स्वयंसेवकों द्वारा दिए गए बलिदानों का फल कहने में कोई भी अतिश्योक्ति नहीं होगी।
संघ के स्वयंसेवकों ने गत 72 वर्षों में जम्मू कश्मीर की स्वतंत्रता, सुरक्षा और सम्मान के लिए निरंतर संघर्ष किया है। पाकिस्तान द्वारा किए गए आक्रमणों के समय स्वयंसेवकों ने समाज का मनोबल बढ़ाने के साथ प्रत्यक्ष सीमा पर जाकर सैनिकों की प्रत्येक प्रकार की सहायता भी की है। आतंकवादियों का सामना करने के लिए स्थापित की गई सुरक्षा समितियों में संघ का महत्वपूर्ण योगदान रहा।1989 में कश्मीर घाटी से निकाल दिए गए कश्मीरी हिंदुओं के देखभाल की जिम्मेदारी निभाई है।
(लेखक संघ के प्रचारक रहे हैं )