जम्मू-कश्मीर: डल...और बदलाव का पल
    दिनांक 16-सितंबर-2019
दया सागर
 जम्मू-कश्मीर में विधानसभा क्षेत्रों के परिसीमन से पहले जिलों के पुनर्गठन की जरूरत है। वहां पहले जिले बनाने में भी कश्मीर घाटी को विशेष महत्व दिया गया था और जम्मू क्षेत्र की अनदेखी की गई थी। अब समय है उन गलतियों को सुधारने का

 
श्रीनगर की डल झील
साल 1951 में जम्मू-कश्मीर राज्य की प्रस्तावित विधानसभा में पाकिस्तान अधिक्रांत जम्मू-कश्मीर (पीओजेके) के लिए जो सीटें आवंटित की गईं, उनमें से ज्यादातर उन इलाकों में चली गईं जो कश्मीर घाटी में पड़ते थे। 1957 के बाद उसी अनुपात में सीटें राज्य की विधानसभा में भी रहीं। जम्मू क्षेत्र में 30 सीटें रहीं, जो 1975 में 32 हो गईं। वहीं कश्मीर घाटी में 43 सीटें रहीं, जो 1975 में 42 हो गईं और लद्दाख क्षेत्र को 2 सीटें दी गईं। उस वक्त सिर्फ अनुमानित आबादी के हिसाब से ऐसा किया गया। कहने के लिए तो 1941 की जनगणना को ही आधार बनाया गया था, क्योंकि 1951 में राज्य में जनगणना नहीं हुई थी। 1941 की जनगणना के अनुसार जम्मू क्षेत्र की आबादी 20,01,557, कश्मीर घाटी की 17,28,686 और लद्दाख क्षेत्र की आबादी 3,11,915 थी। 1947 के पाकिस्तानी हमले के बाद जनगणना का हिसाब लगाना कुछ कठिन जरूर था, पर फिर भी काफी हद तक नजदीकी अनुमान लगाए जा सकते थे पर ऐसा नहीं किया गया। अगर हम 1951 में किए गए सीटों के बंटवारे को देखें (जो उस समय के युवराज कर्ण सिंह के आदेश के अनुसार करीब-करीब 40,000 की आबादी पर एक सीट निर्धारित की गई थी) तो ऐसा लगता है कि कश्मीर घाटी का जो भाग पाकिस्तान के नाजायज कब्जे में चला गया, उसमें बहुत कम आबादी थी। वहीं दूसरी ओर जम्मू क्षेत्र का जो भाग पाकिस्तान ने नाजायज कब्जे में ले लिया, उसकी आबादी को बहुत ज्यादा माना गया। यह मानक किसी प्रकार से उचित नहीं माना जा सकता, क्योंकि पाकिस्तान इलाकों से एक बहुत बड़ी गैर-मुस्लिम आबादी (करीब 45,000 से 50,000 परिवार) भी बाहर (इस ओर) आ गई थी। जम्मू क्षेत्र से भी कुछ लोग अपनी इच्छा से पाकिस्तान चले गए थे। उस समय भी इस पर कोई एतराज नहीं किया गया था। उसके बाद कुछ आवाज जरूर उठी थी, पर वह बहुत नगण्य थी।
जम्मू-कश्मीर राज्य के बारे में एक बड़ी विडंबना यह रही है कि 1947 के बाद भी इस राज्य को करीब-करीब सभी भारतीय नेताओं ने कश्मीर घाटी और कश्मीर घाटी के नेताओं के कथन के अनुसार ही देखा-सुना है। यही कारण है कि 1957 में ‘दी जम्मू-कश्मीर रिप्रेजेंटेशन आफ पीपुल्स एक्ट-1957’ बन जाने के बाद भी उसमें विधानसभा के लिए परिसीमन कैसे किया जाना है, इसके साफ दिशा-निर्देश दिए गए थे, जिनमें पांच में से चार मानक जम्मू क्षेत्र के पक्ष में जाते थे और उसके साथ-साथ जम्मू-कश्मीर के विधान में धारा-50 के अनुसार जम्मू क्षेत्र को जम्मू-कश्मीर की विधान परिषद में 14 चुने हुए एमएलसी दिए गए थे और कश्मीर क्षेत्र को सिर्फ 12 एमएलसी मिले थे। ऐसे ही जम्मू क्षेत्र में 1979 से पहले तक छह जिले थे और कश्मीर घाटी में सिर्फ 3 जिले। आज भी सही मायने में परिसीमन नहीं हो सका है और न ही किसी ने न करने की कोशिश की है। 1994-95 में एक समय आया था जब न्यायमूर्ति के. के. गुप्ता की अध्यक्षता वाला परिसीमन आयोग काम कर रहा था, जिसको 1987 में किए गए संशोधन के अनुसार 76 में 11 और सीटें जोड़कर 87 विधायकों को विधानसभा में बांटना था, उस समय मैंने भी उनको परिसीमन पर एक बड़ा दस्तावेज दिया था। फिर भी वही कश्मीरी प्रभाव हावी रहा और आयोग ने 25 अप्रैल, 1994 को गलत ढंग से 46 विधायक कश्मीर घाटी को दे दिए और जम्मू क्षेत्र को केवल 37 विधायक दिए। लद्दाख को चार विधायक मिले। यदि सही तरीके से परिसीमन होता तो जम्मू क्षेत्र में 45-46 और कश्मीर क्षेत्र को 37-38 सीटें मिलतीं।

 
गत 5 सितम्बर को प्रेस क्लब आफ इंडिया (नई दिल्ली) में दिल्ली जर्नलिस्ट एसोसिएशन द्वारा कश्मीर पर आयोजित संगोष्ठी में (बाएं से) सुशील पंडित, पद्मश्री जवाहरलाल कौल, फारुख वानी (संपादक, ब्राइटर कश्मीर), अनुराग पुनैठा, आलोक वार्ष्णेय और हर्षवर्धन त्रिपाठी 
वर्तमान स्थितियों में जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित क्षेत्र के दूरदराज और पिछड़े हुए ज्यादातर इलाके जम्मू क्षेत्र में पड़ते हैं। प्रशासनिक एवं विधायिका में सही हिस्सा न दिए जाने के कारण दूरदराज के इलाकों में विभिन्न क्षेत्रों में अवहेलना होती रही है। अब संसद के 2019 के एक्ट नंबर 34 के पारित होने से जम्मू-कश्मीर रियासत की पुनर्व्यवस्था हो गई है, जो 31 अक्तूबर, 2019 से लागू होगी। इससे जम्मू-कश्मीर एक केंद्र शासित प्रदेश बन जाएगा, जिसमें विधानसभा भी होगी जबकि लद्दाख एक दूसरा केंद्र शासित प्रदेश होगा! अधिनियम-34 की धारा-60 में भी परिसीमन का प्रावधान है, जिसके अंतर्गत जम्मू-कश्मीर में इस समय राष्ट्रपति शासन है, में चुनाव करवाने से पहले परिसीमन किया जा सकता है और ऐसा करने की अति आवश्यकता भी है। यह एक सुखद समाचार है कि अधिनियम 34 में भी जेके आरपीए आफ 1957 की तरह आम जन के हित वाले परिसीमन करने के दिशानिर्देश हैं! लेकिन क्योंकि दिशानिर्देशों में जिलों की सीमाओं का भी जिक्र है इसलिए जम्मू-कश्मीर राज्य में परिसीमन से पहले जिलों के पुनर्गठन की जरूरत है। उल्लेखनीय है कि 1971 एवं 2006 में बहुत ही गलत और अनुचित ढंग से कश्मीर क्षेत्र में तीन से बढ़ाकर 10 जिले बना दिए गए थे, वहीं जम्मू क्षेत्र में छह से बढ़ाकर सिर्फ 10 जिले बनाए गए थे। कश्मीर घाटी की तर्ज पर जम्मू क्षेत्र में जिले बनें तो यहां 15 से 16 जिले बनाए जा सकते हैं। इसलिए लोग कह रहे हैं कि राज्य में चुनाव से पहले परिसीमन करने की जरूरत है और उससे भी पहले जिलों का पुनर्गठन होना चाहिए।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)