कथित एजेंडे पर चलती सेकुलर पत्रकारिता
   दिनांक 16-सितंबर-2019
 
 
विदेशी मीडिया के एक वर्ग का भारत विरोध का रोग पुराना है जो मौका पाते ही अपनी असलियत दिखाने लगता है
 
बीते सप्ताह मीडिया में चंद्रयान-2 मिशन से जुड़ी खबरें छाई रहीं। जब पूरा देश अपने वैज्ञानिकों को लेकर गर्व की अनुभूति कर रहा था, तभी एनडीटीवी का विज्ञान संपादक भरी प्रेस वार्ता में वैज्ञानिकों पर चिल्ला रहा था। क्या यह एक सामान्य घटना थी, जिस पर माफी मांग लेना काफी है? या फिर इसके पीछे कुछ और है? जिन पल्लव बागला नाम के पत्रकार ने वैज्ञानिकों के साथ अभद्रता की, उनके बारे में यह जानकारी सामने आई है कि वे इसरो के वैज्ञानिकों और अंदर के दूसरे चित्र एक विदेशी फोटो एजेंसी को बेचा करते थे। ऐसा करके उन्होंने लाखों रुपये कमाए। प्रश्न उठ रहा है कि क्या यह पत्रकार के तौर पर मिली पहुंच के अनुचित लाभ का मामला नहीं है? इसरो और ऐसे दूसरे संस्थान बेहद संवेदनशील माने जाते हैं। इनकी जासूसी का खतरा रहता है। यह याद रखना चाहिए कि एनडीटीवी वह चैनल है जिसे पठानकोट आतंकवादी हमले के समय 'लाइव रिपोर्टिंग' के जरिए पाकिस्तान की सहायता का दोषी पाया जा चुका है।
 
काफी समय से राजनीति के समाचारों में डूबी भारतीय पत्रकारिता को चंद्रयान के बहाने विषयांतर का मौका मिला। ज्यादातर चैनलों और अखबारों ने इसे लेकर बहुत अच्छी रिपोर्टिंग की। अगर पूरा देश इस वैज्ञानिक उपलब्धि से खुद को जुड़ा हुआ महसूस कर रहा है तो इसमें बड़ा योगदान मुख्यधारा मीडिया का भी माना जाएगा। लेकिन इस गौरव के क्षण में भी कुछ जाने-पहचाने मीडिया संस्थान वही कर रहे थे जिसके लिए वे जाने जाते हैं। कुछ ने चुप्पी साध रखी थी, लेकिन कुछ अपनी घृणा को छिपा नहीं पा रहे थे। उदाहरण के लिए बीबीसी हिंदी ने एक कार्टून प्रकाशित किया, जिसमें दिखाया गया है कि चंद्रयान को देखकर चांद पर मौजूद दो एलियन (दूसरे ग्रह के जीव) डरे हुए हैं और कह रहे हैं कि कोई पूछे तो वंदेमातरम बोल देना। यह जताने की कोशिश थी कि चंद्रयान उन्हें आकर पीट-पीटकर मार देगा।
 
विदेशी मीडिया के एक जाने-पहचाने वर्ग का भारत विरोध का रोग पुराना है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में पाकिस्तान ने कश्मीर को लेकर जो कुछ भी झूठ-सच बोला, उसे बीबीसी हिंदी ने खूब महत्व दिया। पाकिस्तान के विदेश मंत्री ने कहा कि '80 लाख कश्मीरी कैद में जी रहे हैं।' तो यह भी बीबीसी हिंदी की 'पहली खबर' थी। जबकि इसी बैठक में भारत की प्रतिक्रिया बीबीसी हिंदी के लिए छोटी खबर थी। समझना मुश्किल नहीं है किस राजनीतिक विचारधारा के लोग पत्रकार के चोले में वहां पर काम कर रहे होंगे। यही कारण है कि कश्मीर मुद्दे पर बीबीसी की रिपोर्टिंग शुरू से ही भारत विरोधी रही है।
कश्मीर में धारा 370 हटने के बाद इंटरनेट और फोन पर पाबंदी से कुछ मीडिया संस्थानों में काफी बेचैनी है। उन्हें कश्मीरी लोगों के मानवाधिकार की बहुत चिंता है। लेकिन जब उत्तरी कश्मीर में एक सेब कारोबारी के घर में घुसकर आतंकवादियों ने ढाई साल की एक बच्ची समेत 4 लोगों को गोली मार दी तो किसी तथाकथित मानवाधिकारवादी चैनल, अखबार या न्यूज पोर्टल ने खबर नहीं दी। अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच झूल रही उस छोटी कश्मीरी बच्ची की तस्वीर कहीं पहले पन्ने पर नहीं दिखी। आम लोगों पर हमले की ऐसी कई घटनाएं हो चुकी हैं और किसी को भी राष्ट्रीय मीडिया ने महत्व नहीं दिया। फर्जी खबरों के लिए कुख्यात वेबसाइट 'द वायर' ने बताया कि कश्मीर में अखबार नहीं छप रहे, तो डीडी न्यूज ने बाकायदा सबूत के साथ उसके झूठ की पोल खोल दी।
 
उधर तिहाड़ जेल की हवा खा रहे चिदंबरम के लिए मीडिया का प्रेम बराबर झलक रहा है। आईएनएक्स रिश्वतखोरी के मामले में आए दिन नई जानकारियां सामने आ रही हैं, लेकिन मीडिया का एक जाना-पहचाना वर्ग इन खबरों को छू तक नहीं रहा। दूसरी तरफ राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर यानी एनआरसी को लेकर झूठ फैलाने में राजदीप सरदेसाई जैसे तथाकथित बड़े पत्रकार जी-जान से जुटे हैं। बीते सप्ताह ही आर्यों के आक्रमण के दशकों पुराने झूठ की पोल खुली। इस बारे में हुए डीएनए अध्ययन की रिपोर्ट आई, जिसमें साबित हुआ कि आर्य कहीं बाहर से नहीं आए थे। मुख्यधारा मीडिया ने इस महत्वपूर्ण समाचार को दबा दिया। ज्यादातर चैनलों और अखबारों में यह जानकारी देखने तक भी नहीं मिली। *