विश्वकर्मा जयंती (17 सितम्बर) पर विशेष चमत्कारी आविष्कारक
   दिनांक 16-सितंबर-2019
 
पूनम नेगी  
 

 
कहा जाता है कि विश्वकर्मा जल, विद्युत, प्रकाश व परमाणु ऊर्जा के साथ वनस्पति व पर्यावरण विज्ञान के भी अनूठे विशेषज्ञ थे। उन्होंने ऐसे-ऐसे यंत्र उपकरणों का निर्माण किया था
देवशिल्पी विश्वकर्मा प्राचीन भारत के चमत्कारी अविष्कारक माने जाते हैं। मन की गति से चलने वाले तथा यात्रियों की संख्या के अनुसार अपने आकार को बड़ा व छोटा कर लेने वाले पुष्पक विमान से लेकर ओडिशा के विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर तक अद्भुत शिल्प विज्ञान की सुदीर्घ श्रृंखला सदियों से इस देवशिल्पी के विलक्षण तकनीकी कौशल का यशोगान करती आ रही है। ऋग्वेद व अथर्ववेद से लेकर रामायण, महाभारत, ब्रह्मपुराण जैसे पौराणिक ग्रन्थों में विश्वकर्मा के शिल्प कौशल का विस्तृत उल्लेख मिलता है। विष्णु पुराण में उल्लेख है कि जगन्नाथ मंदिर की अनुपम शिल्प रचना से खुश होकर श्री हरि विष्णु ने उन्हें 'शिल्पावतार' के रूप में सम्मानित किया। इस तरह स्कंद पुराण में उन्हें देवयानों का सृष्टा कहा गया है। इसी पुराण में ही एक अन्य स्थल पर उल्लेख है कि विश्वकर्मा शिल्प शास्त्र के इतने बड़े मर्मज्ञ थे कि जल पर चल सकने योग्य खड़ाऊं बनाने की सामर्थ्य रखते थे। वास्तुशास्त्र ही नहीं, पुरा भारतीय साहित्य में विश्वकर्मा जी द्वारा बनाये गये ऐसे अनेक अस्त्रों-आयुधों व वैमानिक उपकरणों का उल्लेख मिलता है, जो वर्तमान के अत्याधुनिक यांत्रिक युग के विशेषज्ञों को भी विस्मित कर सकते हैं।
 
कहा जाता है कि विश्वकर्मा जल, विद्युत, प्रकाश व परमाणु ऊर्जा के साथ वनस्पति व पर्यावरण विज्ञान के भी अनूठे विशेषज्ञ थे। उन्होंने ऐसे-ऐसे यंत्र उपकरणों का निर्माण किया था जिन्हें किसी चमत्कार से कम नहीं कहा जा सकता। उदाहरण के तौर पर पुष्पक विमान को ही लें। इस अद्भुत विमान के कई किस्से पौराणिक विवरणों में विख्यात हैं। महर्षि वाल्मीकि कृत रामायण में उल्लेख है कि देव शिल्पी विश्वकर्मा द्वारा बनाया गया पुष्पक विमान मोर जैसी आकृति का आकाशचारी विमान था, जो अग्नि व वायु की समन्वयी ऊर्जा से चलता था। चालक की इच्छानुसार इसकी गति व दिशा को नियंत्रित किया जा सकता था। और आवश्यकतानुसार इसे छोटा व बड़ा भी किया जा सकता था। यह सभी ऋतुओं में आरामदायक यानी आधुनिक संदर्भों में कहें तो वतानुकूलित था। इस अद्भुत विमान की सीढि़यां, दरवाजे, खंभे व सिंहासन (कुर्सियां) स्वर्णधातु से बने थे, जिसमें मणि-मुक्तक जड़े थे। यह दिन और रात दोनों समय गतिमान रहने में समर्थ था। रामायण का उपरोक्त विवरण इस देवशिल्पी की उन्नत प्रौद्योगिकी और वास्तुशिल्प की विशेषज्ञता का परिचय देता है। उनके द्वारा निर्मित इस विमान की सबसे अनोखी विशेषता थी कि वह उसी व्यक्ति से संचालित होता था, जिसने विमान संचालन मंत्र सिद्ध किया हो।
 
पुरा भारतीय साहित्य के अध्येता डॉ. ओंकारनाथ श्रीवास्तव के अनुसार पुष्पक विमान की प्रौद्योगिकी का विस्तृत ब्यौरा महार्षि भारद्वाज लिखित पुस्तक 'यंत्र-सर्वेश्वम' के 'वैमानिक शास्त्र' खंड में मिलता है। यह ग्रंथ उनके मूल प्रमुख ग्रंथ 'यंत्र सर्वेश्वम' (जो अब उपलब्ध नहीं है) का एक भाग है। इस वैमानिक-शास्त्र में विमान निर्माण, उसके प्रकार एवं संचालन का संपूर्ण विवरण मिलता है। इस ग्रन्थ में आठ अध्याय, एक सौ अधिकरण, पांच सौ सूत्र (सिद्धांत) और तीन हजार श्लोक हैं। यह ग्रंथ वैदिक संस्कृत भाषा में है। इसके अतिरिक्त भारद्वाज ने 'अंशु-बोधिनी' नामक ग्रंथ भी लिखा था, जिसमें ब्रह्मांड विज्ञान का ही वर्णन था। उस समय के इसी ज्ञान से निर्मित व परिचालित होने वाले विमान, ब्रह्माण्ड के विभिन्न ग्रहों में विचरण किया करते थे। इन ग्रन्थों के अनुसार प्राचीन काल में सिद्धिप्राप्त लोगों के पास जड़ पदार्थों में भी चेतना उत्पन्न करने की क्षमता उपलब्ध थी, जिसके प्रयोग से ही वे विमान की भांति परिस्थितियों के अनुरूप ढलने वाले यंत्र का निर्माण कर पाते थे। रामायण काल में वैमानिकी प्रौद्योगिकी विकास के कितने चरम पर थी, यह इन तथ्यों से प्रमाणित होता है कि 'वैमानिक शास्त्र' में विमान चालक को किन गुणों में पारंगत होना चाहिए, यह भी उल्लेख इस शास्त्र में मिलता है। इसमें प्रशिक्षित चालक का 32 गुणों में निपुण होना जरूरी बताया गया है। इन गुणों में कौशल चालक ही 'रहस्यग्नोधिकारी' अथवा 'व्योमयाधिकारी' बन सकता था। यही नहीं, चालक को विमान-चालन के समय कैसी पोशाक पहननी चाहिए और इस दौरान किस प्रकार का आहार ग्रहण करना चाहिए, इस बात का रोचक विवरण वैमानिक शास्त्र ग्रन्थ के 'वस्त्राधिकरण' व 'आहाराधिकरण' अध्यायों में मिलता है।
 
डॉ. श्रीवास्तव का कहना है कि आज भी लंका की पहाडि़यों पर जो चौरस मैदान पाए जाते हैं, वे संभवत: उस कालखण्ड के वैमानिक अड्डे थे। श्रीलंका की रामायण शोध समिति का कहना है कि रावण ने अपने पुष्पक विमान को रखने के लिए चार विमान क्षेत्र बनवाये थे-उसानगोड़ा, गुरूलोपोथा, तोतूपोलाकंदा और वारियापोला। माना जाता है कि इन चारों में एक उसानगोड़ा हवाई अड्डे को हनुमान जी ने लंका दहन के समय जलाकर नष्ट कर दिया था। अन्य तीनों हवाई अड्डे सुरक्षित बच गये थे जिनके चिह्न आज भी मौजूद हैं। डॉ. ओंकारनाथ के मुताबिक ऋग्वेद में भी विश्वकर्मा विरचित अनेक प्रकार के विमानों का उल्लेख मिलता है। आर्य-अनार्य दोनों ही पक्षों द्वारा 'शकुन', 'सुन्दर', 'त्रिपुर' एवं 'रुक्म' सहित 25 तरह के विमानों के उपयोग का विवरण मिलता है। कहा जाता है कि 'त्रिपुर' विमान तीन खण्डों (तलों) वाला था तथा जल, थल एवं नभ तीनों में विचरण कर सकता था।
 
'विश्वकर्मा शिल्पशास्त्र' व 'मयमतम' पुरातन तकनीकी ज्ञान के अद्वितीय ग्रन्थ माने जाते हैं। इन ग्रंथों में इन्हें पदार्थ विज्ञान के आदि पुरोधा रूप में चित्रित किया गया है। पुरा साहित्य में विश्वकर्मा द्वारा निर्मित ऐसे अनेक रथों का भी विवरण मिलता है, जो वायुवेग से चलकर लक्ष्यभेद कर सकने में सक्षम थे। इनमें प्रमुख था अर्जुन का नन्दी घोष रथ। विभिन्न प्रकार के उपकरणों से सुसज्जित इस रथ में एक ऐसा अनोखा यंत्र लगा था, जो आसपास से महत्वपूर्ण सूचनाएं एकत्र करने में सक्षम था। इसी तरह अर्जुन का अक्षय तूणीर व द्रौपदी का अक्षयपात्र भी विश्वकर्मा के चमत्कारी निर्माण माने जाते हैं। इसी तरह चाहे श्री हरि विष्णु का सुदर्शन चक्र हो, इन्द्र का वज्र्र, शिवजी का त्रिशूल, मां दुर्गा का भाला, यमराज का कालदंड, हनुमान की गदा हो या फिर कर्ण के कवच-कुंडल; (पौराणिक संदर्भ के अनुसार) आदि के निर्माण का श्रेय भी विश्वकर्मा को ही देते हैं। प्राचीन काल में जितने भी सुप्रसिद्ध नगर और राजधानियां थीं, उनके वास्तुकार विश्वकर्मा ही थे।
 
देवराज इन्द्र्र की अमरावती, धर्मराज की यमपुरी, धनाध्यक्ष कुबेर की स्वर्णनगरी जो कालान्तर में असुरराज रावण की सुवर्ण लंका के नाम से लोकविख्यात हुई, से लेकर भगवान श्रीकृष्ण की समुद्र के मध्य बसी अनूठी द्वारिका तथा पांडवों की राजधानी इन्द्रप्रस्थ व सुदामापुरी जैसी सुंदरतम नगरियों का निर्माण देवशिल्पी ने ही किया था। यह जानना दिलचस्प हो कि विश्वकर्मा जी की भवन निर्माण शैली की विशद वर्णन 'मयशिल्पम' नामक ग्रन्थ में मिलता है। *
शिल्प शास्त्र के प्रणेता आचार्य
 
हिन्दू धर्म में भगवान विश्वकर्मा को सृष्टि के रचयिता प्रजापति ब्रह्मा का वंशज माना गया है। ब्रह्म पुराण में भगवान विश्वकर्मा के जन्म व वंशावली का रोचक विवरण है। ब्रह्मा के पुत्र धर्म तथा धर्म के पुत्र वास्तुदेव थे, जिन्हें शिल्पशास्त्र का आदि पुरुष माना जाता है। इन्हीं वास्तुदेव की अंगिरसी नामक पत्नी से विश्वकर्मा का जन्म हुआ। अपने पिता के पदचिन्हों पर चलते हुए विश्वकर्मा वास्तुकला के महान आचार्य बने। इनके पांच पुत्र हुए- मनु, मय, त्वष्टा, शिल्पी और देवज्ञ। इन पांचों पुत्रों को वास्तु शिल्प की अलग-अलग विधाओं का विशेषज्ञ माना जाता है। ब्रह्म पुराण में इनके पांच स्वरूपों विराटवंशी, धर्मवंशी, अंगिरावंशी, सुधन्वावंशी और भृगुवंशी विश्वकर्मा का उल्लेख मिलता है। इनके आधार पर शिल्प शास्त्र के प्रणेता विश्वकर्मा ऋषि को सभी प्रकार के वास्तु शिल्पों का भंडार माना जाता है जिन्होंने पदार्थों के आधार पर शिल्प विज्ञान को पांच प्रमुख धाराओं लौह, काष्ठ, ताम्र, प्रस्तर व हिरण्य (स्वर्ण) शिल्प में विभाजित कर मानव समुदाय को इनके ज्ञान से लाभान्वित किया। ऋग्वेद में भी विश्वकर्मा सूक्त के नाम से 11 ऋचाओं में इनका गुणगान मिलता है।