राज्य/ झारखंड: बिखरा विपक्ष, एकजुट भाजपा
   दिनांक 16-सितंबर-2019
 
एक कार्यक्रम में जनता का अभिवादन करते हुए मुख्यमंत्री रघुवर दास 
 
 
झारखंड में चुनाव की आहट सुनाई दे रही है। ऐसे में वहां सत्तारूढ़ भाजपा के विरुद्ध विपक्ष बिखरा हुआ है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि इसका लाभ भाजपा को मिलेगा।इतना ही नहीं, राज्य की जनता प्रधानमंत्री मोदी के कामों से भी प्रभावित है।
आने वाले कुछ दिनों में झारखंड में विधानसभा चुनाव का बिगुल बज सकता है। इसकी आहट भर से राज्य के राजनीतिक दलों में हलचल पैदा हो गई है। सत्तारूढ़ भाजपा एक बार फिर से चुनाव जीतने का दावा कर रही है, वहीं विपक्षी दल, खासकर झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) कह रहा है कि इस बार उसकी सरकार बनेगी। इसी विश्वास के साथ झामुमो नेता और पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन इन दिनों राज्य में बदलाव यात्रा कर रहे हैं। इस यात्रा से झामुमो को कितना लाभ मिलेगा, यह तो वक्त आने पर पता चलेगा। पर एक बात सच है कि राज्य में इन दिनों विपक्ष बहुत ही कमजोर है। झामुमो को छोड़कर बाकी विपक्षी दल जैसे- कांग्रेस, झारखंड विकास मोर्चा (झाविमो), राजद आदि की हालत बहुत ही पतली है। इसलिए इनके नेता झामुमो की अगुवाई में विपक्ष को चुनावी मैदान में उतारने की कोशिश कर रहे हैं, पर यह उतना आसान नहीं है। ऊपर से जदयू भी अपनी चालें चल रहा है। हालांकि झारखंड में जदयू का कोई खास प्रभाव नहीं है, पर वह भी चुनाव में उतरने की तैयारी कर रहा है। कहा जा रहा है कि जो नीतीश कुमार बिहार में भाजपा के समर्थन से सरकार चला रहे हैं, वही झारखंड में भाजपा के खिलाफ अभियान चलाएंगे। इससे भाजपा को कितना नुकसान होगा, यह तो कहना मुश्किल है, पर विपक्षी दलों की हवा खराब हो जाएगी, इसमें कोई दो राय नहीं है।
 
वहीं दूसरी ओर भाजपा का हौंसला ऊंचा है। उसने इस बार 65 से अधिक सीटें जीतने का लक्ष्य तय किया है। वरिष्ठ भाजपा नेता और राज्य के श्रम मंत्री राज पालीवार कहते हैं, ''राज्य सरकार ने सवा तीन करोड़ मतदाताओं के लिए कई कल्याणकारी योजनाओं का क्रियान्वयन सफलतापूर्वक किया है। सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य सहित सभी बुनियादी आवश्यकताओं को झारखंड के हर घर तक पहुंचाया गया है। 68,00000 परिवारों को बिजली मुहैया कराई गई। उग्रवाद पर बहुत हद तक लगाम लग चुकी है। स्थानीय नीति पर भी सकारात्मक कदम उठाए गए हैं। इन सबका लाभ भाजपा को जरूर मिलेगा।''

 
 
हेमंत सोरेन रामेश्वर उरांव
Introहेमंत सोरेन अपने को महागठबंधन का नेता मान रहे हैं, लेकिन कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष रामेश्वर उरांव उन्हें नेता नहीं मान रहे हैं। वे कहते हैं कि महागठबंधन का नेता सभी विपक्षी दलों से बात करके तय होगा।
 
 
 
 
केंद्र सरकार की कल्याणकारी नीतियों से भी झारखंड सरकार को फायदा मिलता दिख रहा है। वैसे विधानसभा चुनाव में स्थानीय मुद्दे हावी रह सकते हैं। पारा शिक्षकों की नाराजगी, आरक्षण, वनवासी और गैर-वनवासी मुख्यमंत्री जैसे मुद्दों को विपक्ष धार देने की कोशिश कर रहा है। झारखंड मुक्ति मोर्चा के केंद्रीय प्रवक्ता अभिषेक प्रसाद कहते हैं, ''इस बार के चुनाव में पलायन, भूख, भ्रष्टाचार, स्थानीय नीति, सीएनटी-एसपीटी एक्ट सहित कई स्थानीय मुद्दे हावी रहेंगे। भाजपा सरकार द्वारा स्थानीय लोगों को नौकरी में प्राथमिकता नहीं दी जा रही है जिससे लोगों में काफी नाराजगी है। झामुमो बदलाव यात्रा में इन्हीं मुद्दों को उठा रहा है।''
भले ही झामुमो कुछ मुद्दों को उठा रहा है, लेकिन विपक्ष के अन्य दल उसके साथ खड़े नहीं दिख रहे। विपक्ष आपस में ही इस कदर बंटा हुआ है कि जनता उनके वायदों और बातों पर भरोसा नहीं कर पा रही है। हेमंत सोरेन अपने को महागठबंधन का नेता मान रहे हैं, लेकिन कांग्रेस के नए प्रदेश अध्यक्ष रामेश्वर उरांव उन्हें नेता नहीं मानते हैं। उनका कहना है कि महागठबंधन का नेता अभी तक तय नहीं किया गया है और यह फैसला विपक्षी दलों से रायशुमारी के बाद ही लिया जाएगा। वहीं झामुमो की ओर से कहा जा रहा है कि लोकसभा चुनाव में ही सब कुछ तय हो गया था कि विधानसभा चुनाव में किसे नेता माना जाएगा। झाविमो के बाबूलाल मरांडी भी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। 2014 के विधानसभा चुनाव में झाविमो के आठ विधायक चुने गए थे, लेकिन इनमें से छह ने भाजपा का दामन थाम लिया था। इस कारण झाविमो राज्य में लगातार कमजोर होता गया। रही-सही कसर 2019 के लोकसभा चुनाव में पूरी हो गई थी। खुद बाबूलाल मरांडी चुनाव हार गए थे। इसलिए लोग मान रहे हैं कि राज्य में झाविमो नाममात्र की पार्टी रह गई है। कांगे्रेस का भी यही हाल है। लोकसभा चुनाव के बाद झारखंड कांग्रेस में जबर्दस्त गुटबाजी रही। तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष डॉ. अजय कुमार के विरुद्ध प्रदेश के अनेक वरिष्ठ नेता खुलेआम बयानबाजी करते थे। अंतत: अजय को अपना पद छोड़ना पड़ा। अब रामेश्वर उरांव को प्रदेश की कमान दी गई है। वे पुराने कांग्रेसी हैं, लेकिन उनकी राह भी आसान नहीं है। पार्टी के कार्यकर्ताओं को फिर से सक्रिय करना उनकी सबसे बड़ी चुनौती है। अब जब चुनाव सिर पर है तब वे कार्यकर्ताओं को मनाएं या लोगों के बीच जाएं, यही सबसे बड़ा सवाल है।
 
विपक्षी दलों की इस स्थिति से भाजपा आश्वस्त है। चुनावी जीत से भी उसके हौंसले बुलंद हैं। लोकसभा चुनाव में भाजपा ने पूरे झारखंड में शानदार जीत हासिल की थी। 14 लोकसभा क्षेत्रों में से 11 पर भाजपा और एक क्षेत्र पर उसके सहयोगी आजसू ने जीत प्राप्त की थी। यहां तक कि शिबू सोरेन जैसे दिग्गज भी दुमका में भाजपा के सामने नहीं टिक पाए। राज्य में अभी भी भाजपा के लिए कमोबेश लगभग यही स्थिति है। सुदेश महतो की अध्यक्षता में ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन (आजसू) अभी भी भाजपा के साथ है। उल्लेखनीय है कि झारखंड में आजसू को कुर्मियों की पार्टी माना जाता है। कुछ लोग यह भी कहते हैं कि पूरे राज्य के कुर्मियों के बीच आजसू अभी नहीं पहुंच पाई है, पर रांची और उसके आसपास के कुर्मी आजसू के निकट हैं। इस बात का आभास भाजपा को भी है। इसलिए उसने लोकसभा चुनाव में विद्युत चरण महतो जैसे कुर्मी नेता को जमशेदपुर से टिकट देकर लोकसभा पहुंचाया है।
 
जनता के बीच मुख्यमंत्री रघुवर दास की छवि अच्छी है। उनके नेतृत्व में राज्य में पहली बार भाजपा सरकार पांच साल पूरा करने जा रही है। इससे पहले भाजपा के नेतृत्व में गठबंधन की सरकारें होती थीं, जिनके सामने बहुत सारी मजबूरियां होती थीं। रघुवर दास को इस तरह की मजबूरियों का सामना नहीं करना पड़ा है। इसलिए उन्होंने कई ऐसे निर्णय लिए हैं, जिनका लाभ चुनाव में भाजपा को मिलता दिख रहा है।
 
इन समीकरणों को देखते हुए कहा जा सकता है कि इस बार भी झारखंड में विपक्षी दलों की दाल शायद ही गले। *