प्रधानमंत्री मोदी की धरती बचाने की मुहिम
   दिनांक 16-सितंबर-2019
 

 
 
कॉप-14 (कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज) अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
पिछले दिनों संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन टू कॉम्बैट डेजर्टिफिकेशन (United Nations Convention to Combat Desertification, UNCCD) के तहत अयोजित होने कॉप-14 (कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज) अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि भारत कुछ साल में सिंगल यूज प्लास्टिक का इस्तेमाल खत्म कर देगा। अब समय आ गया है कि विश्व के नेताओं को भी इसे गुडबाय कह देना चाहिए। उन्होंने कहा कि यह विश्वभर में स्वीकार्य है कि जलवायु परिवर्तन का नकारात्मक प्रभाव पूरा विश्व महसूस कर रहा है। सम्‍मेलन में मोदी ने विश्वभर के नेताओं को जलवायु परिवर्तन से लड़ने में योगदान देने को कहा। 2 से 13 सितम्बर तक चलने वाले इस महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय सम्मलेन में विश्व के 170 देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया ।
प्रधानमंत्री मोदी ने सम्मेलन में आए मेहमानों का स्वागत करते हुए कहा कि भारत दो साल के कार्यकाल के लिए कॉप प्रेसीडेंसी को संभालने में प्रभावी योगदान देने के लिए भी तत्पर है। पर्यावरण संरक्षण में हम हर तरह से सहयोग करने की कोशिश करेंगे। जलवायु परिवर्तन भी विभिन्न प्रकार के भूमि क्षरण का कारण बन रहा है। समुद्र के जलस्तर में वृद्धि, अनियमित वर्षा और तूफान के कारण ऐसा हो रहा है।
इस सम्मलेन का आयोजन दुनिया को बढ़ते मरुस्थलीकरण से बचाने की मुहिम के तहत किया गया है। इस बार भारत ने इस सम्मलेन की मेजबानी की जिसमें अभी तक दुनिया भर के वैज्ञानिक अपने अपने मुल्‍कों की समस्याएं और उनके निपटने को लेकर उठाए गए कदमों को साझा कर चुके हैं। इस सम्‍मेलन से जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता, मरुस्थलीकरण जैसी समस्‍याओं का सामना करने के लिए चर्चा हुई । इंसान की आने वाली पीढ़‍यों के लिए धरती भविष्‍य में भी सुरक्षित बनी रहे। भारत इसमें अग्रणी भूमिका निभा सकता है। यही वजह है कि कॉप-14 की मेजबानी भारत को सौंपी गई है। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, ‘‘जलवायु परिवर्तन का बायोडाइवर्सिटी और जमीन दोनों पर असर होता है। सब जानते हैं कि इसका दुनियाभर में नकारात्मक प्रभाव हो रहा है। सरकार ने कृषि के कई तरीके जैसे माइक्रो-इरीगेशन जैसी तकनीक से किसानों की आय को दोगुनी करने का काम किया है। हम बायो-फर्टिलाइजर्स के इस्तेमाल को बढ़ावा दे रहे हैं और केमिकल कीटनाशक के इस्तेमाल को कम करने के प्रयास में है।’’ 2015 से 2017 के बीच भारत में वन क्षेत्रों में 8 लाख हेक्टेयर की वृद्धि हुई है। मैं आपका ध्यान ऐसे बंजर जमीन की ओर ले जाना चाहूंगा जिसे कभी रिवर्स नहीं किया जा सकता। प्लास्टिक के इस्तेमाल से प्रदूषित हुई भूमि के तरफ भी मैं आपका ध्यान ले जाना चाहूंगा। हमने जलशक्ति मंत्रालय का गठन किया है जो जल संबंधी समस्याओं का सामाधान करता है।”
2 साल के लिए यूएनसीसीडी का अध्यक्ष बना भारत
जलवायु परिवर्तन, जैव-विविधता में कमी और भूमि के बंजर होने का कारण इंसानी दखल है। तीनों आपस में जुड़े हुए हैं। अब सकारात्मक दखल के जरिए इसे सुधारने और भावी पीढ़ी को बेहतर भविष्य देने का समय आ गया है। पिछले 200 साल में हमने पर्यावरण को जो नुकसान पहुंचाया है, उसे ठीक करना है। हर दो साल में बैठक शुरू होने के साथ ही भारत अगले दो साल के लिए यूएनसीसीडी का अध्यक्ष भी बन गया है।
पूरी दुनिया की जलवायु में तेजी से परिवर्तन हो रहा है ,बेमौसम आंधी तूफ़ान और बरसात से हजारों लोगों की जान जा रही है साथ ही सभी ऋतु चक्रों में तेजी से बदलाव देखने को मिल रहा है । सच्चाई यह है कि पर्यावरण सीधे सीधे हमारे अस्तित्व से जुड़ा मसला है ।
धरती को नुकसान पहुंचा रहा प्‍लास्टिक कचरा
कॉप-14 (कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज) में प्रधानमंत्री ने कहा कि प्‍लास्टिक का कचरा भी मरुस्‍थलीकरण को बढ़ा रहा है। प्‍लास्टिक का कचरा न केवल स्‍वास्‍थ्‍य का प्रभावित कर रहा है, यह धरती की उर्वरता के लिए भी समस्‍याएं पैदा कर रहा है। हमारी सरकार ने घोषणा की है कि वह आने वाले कुछ वर्षों के भीतर सिंगल यूज प्‍लास्टिक का प्रचलन खत्‍म कर देगी। हम पर्यावरण अनुकूल विकास के लिए प्रतिबद्ध हैं। हम प्‍लास्टिक के कचरे के निस्‍तारण पर काम कर रहे हैं। हमें उम्‍मीद है कि आने वाले वक्‍त में हम सिंगल यूज प्‍लास्टिक को अलविदा कह देंगे। दुनिया के लिए भी सिंगल यूज प्लास्टिक को अलविदा कहने का समय आ गया है।
संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, हर वर्ष दुनियाभर में 500 अरब प्लास्टिक बैग उपयोग होते हैं, जो सभी प्रकार के अपशिष्टों का 10 प्रतिशत है। हमारे देश में प्रतिदिन 15000 टन प्लास्टिक अपशिष्ट निकलता है, जिसकी मात्रा निरंतर बढ़ती जा रही है। प्लास्टिक के बढ़ते उपयोग का अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि पूरे विश्व में इतना प्लास्टिक हो गया है कि इस प्लास्टिक से पृथ्वी को पांच बार लपेटा जा सकता है। समुद्र में करीब 80 लाख टन प्लास्टिक बहा दिया जाता है, जिसका अर्थ है कि प्रति मिनट एक ट्रक कचरा समुद्र में डाला जा रहा है। यह स्थिति पृथ्वी के वातावरण के लिए बेहद हानिकारक हो सकती है क्योंकि प्लास्टिक को अपघटित होने में 450 से 1000 वर्ष लग जाते हैं। प्लास्टिक केमिकल बीपीए शरीर में विभिन्न स्त्रोतों से प्रवेश करता है। एक अध्ययन में पाया गया कि 6 साल से बड़े 93 प्रतिशत अमेरिकन जनसंख्या प्लास्टिक केमिकल BPA ( कुछ किस्म का प्लास्टिक साफ और कठोर होती है, जिसे बीपीए बेस्ड प्लास्टिक कहते हैं, इसका इस्तेमाल पानी की बॉटल, खेल के सामान, सीडी और डीवीडी जैसी कई वस्तुओं में किया जाता है ) को अवशोषित कर लेती है।
अरबों पाउंड प्लास्टिक पृथ्वी के पानी स्त्रोतों खासकर समुद्रों में पड़ा हुआ है। 50 प्रतिशत प्लास्टिक की वस्तुएं हम सिर्फ एक बार काम में लेकर फेंक देते हैं। प्लास्टिक के उत्पादन में पूरे विश्व के कुल तेल का 8 प्रतिशत तेल खर्च हो जाता है। प्लास्टिक को पूरी तरह से खत्म होने में 500 से 1,000 साल तक लगते हैं। प्लास्टिक के एक बेग में इसके वजन से 2,000 गुना तक सामान उठाने की क्षमता होती है।

प्लास्टिक नॉन-बॉयोडिग्रेडेबल होता है। नॉन-बॉयोडिग्रेडेबल ऐसे पदार्थ होते हैं जो बैक्टीरिया के द्वारा ऐसी अवस्था में नहीं पहुंच पाते जिससे पर्यावरण को कोई नुकसान न हो।कचरे की रिसायकलिंग बेहद जरूरी है क्योंकि प्लास्टिक की एक छोटी सी पोलिथिन को भी पूरी तरह से छोटे पार्टिकल्स में तब्दील होने में हजारों सालों का समय लगता है और इतने ही साल लगते हैं प्लास्टिक की एक छोटी सी पोलिथिन को गायब होने में।जब प्लास्टिक को कचरे के तौर पर फेंका जाता है यह अन्य चीजों की तरह खुदबखुद खत्म नहीं होता। जैसा कि हम जानते हैं इसे खत्म होने में हजारों साल लगते हैं यह पानी के स्रोतों में मिलकर पानी प्रदूषित करता है।
वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में कमी लाना जरुरी
नेचर क्लाइमेट चेंज एंड अर्थ सिस्टम साइंस डाटा जर्नल में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार चीन, अमेरिका और यूरोपीय संघ के वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में क्रम से 26 ,15 और 11 फीसद की हिस्सेदारी है जबकि भारत का आंकड़ा सात फीसद है। इसमें बताया गया है कि प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन के मामले में भारत की हिस्सेदारी 2.44 टन है जबकि अमेरिका, यूरोपीय संघ और चीन की प्रति व्यक्ति हिस्सेदारी क्रम से 19.86 टन, 8.77 और 8.13 टन है।यह रिपोर्ट ब्रिटेन के ईस्ट एंजलिया विश्वविद्यालय के ग्लोबल कार्बन परियोजना द्वारा किये गये एक अध्ययन पर आधारित है दुनिया भर में कार्बन उत्सर्जन की बढती दर ने पर्यावरण और खासकर जैव विविधता को बड़े पैमानें पर नुकसान पहुंचाया है , एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले एक दशक में विलुप्त प्रजातियों की संख्या पिछले एक हजार वर्ष के दौरान विलुप्त प्रजातियों की संख्या के बराबर है। जलवायु में तीव्र गति से होने वाले परिवर्तन से देश की 50 प्रतिशत जैव विविधता पर संकट है। अगर तापमान से 1.5 से 2.5 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होती है तो 25 प्रतिशत प्रजातियां पूरी तरह समाप्त हो जाएंगी। अंतरराष्ट्रीय संस्था वर्ल्ड वाइल्ड फिनिशिंग ऑर्गेनाइजेशन ने अपनी रिपोर्ट में चेतावनी दी है कि 2030 तक घने जंगलों का 60 प्रतिशत भाग नष्ट हो जाएगा। वनों के कटान से वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की कमी से कार्बन अधिशोषण ही वनस्पतियों व प्राकृतिक रूप से स्थापित जैव विविधता के लिए खतरा उत्पन्न करेगी। मौसम के मिजाज में होने वाला परिवर्तन ऐसा ही एक खतरा है। इसके परिणामस्वरूप हमारे देश के पश्चिमी घाट के जीव-जंतुओं की अनेक प्रजातियां तेजी से लुप्त हो रही हैं।
एक तिहाई से अधिक प्रजातियां विलुप्ति के कगार पर
समूचे विश्व में 2 लाख 40 हजार किस्म के पौधे और 10 लाख 50 हजार प्रजातियों के प्राणी हैं। इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजनर्वेशन ऑफ नेचर (आईयूसीएन) एक की रिपोर्ट में कहा कि विश्व में जीव-जंतुओं की 47677 विशेष प्रजातियों में से एक तिहाई से अधिक प्रजातियां यानी 15890 प्रजातियों पर विलुप्ति का खतरा मंडरा रहा है। आईयूसीएन की रेड लिस्ट के अनुसार स्तनधारियों की 21 फीसदी, उभयचरों की 30 फीसदी और पक्षियों की 12 फीसदी प्रजातियाँ विलुप्ति की कगार पर हैं। वनस्पतियों की 70 फीसदी प्रजातियों के साथ ताजा पानी में रहने वाले सरिसृपों की 37 फीसदी प्रजातियों और 1147 प्रकार की मछलियों पर भी विलुप्ति का खतरा मंडरा रहा है। ये सब इंसान के लालच और जगलों के कटाव के कारण हुआ है। गंदगी साफ करने में कौआ और गिद्ध प्रमुख हैं। गिध्द शहरों ही नहीं, जंगलों से खत्म हो गए। 99 प्रतिशत लोग नहीं जानते कि गिद्धों के न रहने से हमने क्या खोया। लोग कहते है कि उल्लू से क्या फायदा, मगर किसान जानते हैं कि वह खेती का मित्र है, जिसका मुख्य भोजन चूहा है। भारतीय संस्कृति में पशु पक्षियों के संरक्षण और संवर्धन की बात है। इसीलिए अधिकांश हिंदू धर्म में देवी-देवताओं के वाहन पशु -पक्षियों को बनाया गया है। एक और बात बड़े खतरे का अहसास कराती है कि एक दशक में विलुप्त प्रजातियों की संख्या पिछले एक हजार वर्ष के दौरान विलुप्त प्रजातियों की संख्या के बराबर है।
दुनिया भर के देशों की जलवायु और मौसम में परिवर्तन हो रहा है। पिछले दो सालों में देश के कई इलाकों में बेमौसम बरसात और सूखे की वजह से किसानों की बड़ी आबादी बेहद मुश्किल दौर से गुजर रही है । पिछले साल अचानक आई बेमौसम बारिश ने कहर ढाते हुए कई राज्यों की लाखों हेक्टेयर भूमि में खड़ी फसल बर्बाद कर दिया था । मौसम में तीव्र परिवर्तन हो रहा है ,ऋतु चक्र बिगड़ चुके है। मौसम के बिगड़े हुए मिजाज ने देश भर में समस्या पैदा कर दी है । सच्चाई यह है कि देश में कृषि क्षेत्र में मचे हाहाकार का सीधा संबंध जलवायु परिवर्तन से है । यह सब जलवायु परिवर्तन और हमारे द्वारा पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने की वजह से हो रहा है ।
जलवायु परिवर्तन संपूर्ण मानवता के लिये एक बहुत बड़ा खतरा है ।प्लास्टिक को न कहने के साथ ही एक अहम् बात और है कि सौर ,विंड जैसी वैकल्पिक ऊर्जा पर जोर देकर हम अपनी उर्जा जरूरतों के साथ साथ ग्लोबल वार्मिंग पर काबू कर सकतें है। बड़े पैमानें पर वैकल्पिक उर्जा के उपयोग और उत्पादन के लिए अब पूरे विश्व को एक साथ आना होगा तभी कुछ हद तक वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में कुछ कमी आ पायेगी । कुलमिलाकर देश के प्राकृतिक संसाधनों का ईमानदारी से दोहन और पर्यावरण के संरक्षण के लिए सरकारी प्रयास के साथ साथ जनता की सकारात्मक भागीदारी की जरुरत है । जनता के बीच जागरूकता फैलानी होगी, तभी इसका संरक्षण हो पायेगा । पर्यावरण संरक्षण का सवाल पृथ्वी के अस्तित्व से जुड़ा है। इसलिए हम सभी को इसके लिए संजीदा होना होगा
(लेखक राजस्थान के मेवाड़ यूनिवर्सिटी में डायरेक्टर हैं और टेक्निकल टूडे पत्रिका के संपादक है )