ट्रंप की मजबूरी है, यही मोदी की मजबूती है
    दिनांक 17-सितंबर-2019
परेशानहाल पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान अपने आर्मी चीफ के साथ व्हाइट हाउस पहुंचे थे. सारे प्रोटोकाल के खिलाफ जाकर पाकिस्तान के आर्मी चीफ बैठक में शामिल हुए. इस बैठक में इमरान ने ट्रंप को अफगानिस्तान में तालिबान से समझौते का झुनझुना थमाया, और ट्रंप झांसे में आ गए

 
हाउडी मोदी में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी शिरकत करेंगे. 22 सितंबर को अमेरिका के ह्यूस्टन में अमेरिका में बसे भारतवंशी नरेंद्र मोदी का स्वागत करने वाले हैं. पचास हजार से ज्यादा लोगों का जनसमूह जुटेगा. व्हाइट हाउस ने इस बात की पुष्टि कर दी है कि डोनाल्ड ट्रंप भी इस कार्यक्रम में नरेंद्र मोदी के साथ होंगे. डोनाल्ड ट्रंप कारोबारी हैं. वह बिना फायदे के कुछ नहीं करते. आप मानें या नाक भौं सिकोड़ें, ट्रंप ने दुनिया की कूटनीति को नया पैंतरा दिया है. वह है, अनिश्चितता. उनका अगला कदम क्या होगा, उनके सहयोगी तक नहीं जानते. तमाम इस वजह से साथ छोड़कर जा चुके हैं. भारत की भूमिका अब बहुत व्यापक हो गई है. एशिया ही नहीं, दुनिया में भारत को साथ रखना अमेरिका की मजबूरी बन चुकी है. हम इस बात बिंदूवार गौर करेंगे कि दुनिया में चंद दिनों में ऐसा क्या बदला है-
तालिबान से बातचीत का पाकिस्तानी सपना टूटा
सोमवार को डोनाल्ड ट्रंप ने आखिरकार ऐलान कर दिया कि अफगानिस्तान में तालिबान के साथ चल रही अमेरिका की बातचीत टूट गई है. अफगानिस्तान में तालिबान के साथ ट्रंप की बातचीत इस कदर एकतरफा फैसला था कि अफगानिस्तान की सरकार खुद इस बातचीत के खिलाफ थी. अफगानिस्तान में अब भारत एक अहम ताकत है. ट्रंप की इस बातचीत को लेकर नई दिल्ली भी नाराज थी. ट्रंप अफगानिस्तान में तैनात 5400 से ज्यादा अमेरिकी सैनिकों की जल्द से जल्द वापसी की कोशिश में थे. ये उनका चुनावी वादा था और अगले चुनाव से पहले वह चाहते थे कि कम से कम एक वादा पूरा हो जाए. ट्रंप इसी जल्दबाजी में पाकिस्तान के झांसे में आ गए. परेशानहाल पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान अपने आर्मी चीफ के साथ व्हाइट हाउस पहुंचे थे. सारे प्रोटोकॉल के खिलाफ जाकर पाकिस्तान के आर्मी चीफ बैठक में शामिल हुए. इस बैठक में इमरान ने ट्रंप को अफगानिस्तान में तालिबान से समझौते का झुनझुना थमाया, और ट्रंप झांसे में आ गए. पाकिस्तान अमेरिका और तालिबान के बीच बातचीत का सूत्रधार बन गया. इस बातचीत की जरूरत ट्रंप को थी, पाकिस्तान को भी थी. पाकिस्तान अमेरिका के विश्वसनीय सहयोगी का दर्जा खो चुका है. पिछले कुछ समय में भारत के साथ अमेरिका का रक्षा, सामरिक और हर क्षेत्र में सहयोग बढ़ा है. अमेरिका पाकिस्तान में बने दहशतगर्दी के अड्डों को लेकर पाकिस्तान को सार्वजनिक रूप से दुत्कारता रहा है. 
अमेरिका ने सैन्य सहायता और अन्य मदद पर भी लगभग रोक लगा रखी है. पाकिस्तान को उम्मीद थी कि तालिबान के साथ बातचीत कराकर वह अमेरिका की नब्ज दबाए रखेगा. भारत की दलील थी कि अफगानिस्तान पर बात हो, तो अफगानिस्तान के सभी तबकों को शामिल किया जाएगा. हर पक्ष को शामिल किए बगैर सिर्फ तालिबान से बातचीत करके अफगानिस्तान में राजनीतिक स्थिरता नहीं लाई जा सकती. बातचीत की मेज पर आने के बाद तालिबान का भी हौसला बढ़ गया था. उसे अपनी इस विचारधारा पर और यकीन पुख्ता हो गया कि दहशतगर्दी से बड़ी से बड़ी ताकत को झुकाया जा सकता है. अमेरिका से बातचीत टूटने पर तालिबान के प्रवक्ता की प्रतिक्रिया से इसे समझा जा सकता है. तालिबान के प्रवक्ता ने कहा कि हमें इससे फर्क नहीं पड़ता. इस्लामिक अमीरात अपना काम जारी रखेगी. मतलब ये कि हम दहशतगर्दी फैला रहे थे, फैला रहे हैं और फैलाते रहेंगे. यह बातचीत अगर सफल हो जाती, तो अफगानी तालिबान सत्ता में होते. जिनकी चाबी पाकिस्तान के हाथ में होती. पाकिस्तान इस चाबी से अमेरिका को भी नचाता और अफगानिस्तान को भी. अफगानिस्तान एक बार फिर अल कायदा और इस्लामिक स्टेट जैसे चरमपंथी संगठनों की पनाहगाह बन जाता और इसका सबसे बड़ा खतरा भारत को होता. खुद ट्रंप के तमाम वरिष्ठ सहयोगी इस बातचीत के खिलाफ थे. कैंप डेविड में जिस तरीके से इन तालिबानी आतंकवादियों की आवभगत की गई, उससे नाराज राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने इस्तीफा दे दिया था. अब ट्रंप को अफगानिस्तान से निपटने में भारत का साथ चाहिए. आम अफगानियों, पख्तूनों में पाकिस्तान के लिए नफरत है. भारत की फिल्मों से लेकर शिक्षा तक, अफगानिस्तान के नागरिकों की पहुंच में है. अफगानिस्तान की मौजूदा सरकार और प्रशासन का झुकाव भारत की तरफ है. भारत अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण में एक अहम ताकत है. ट्रंप को मोदी के साथ तो आना ही होगा.
चीन का डूबता जहाज, भारत एक मजबूरी
देश में आर्थिक मंदी का रोना रोने वालों को ये खबर पसंद नहीं आएगी. उनके आका चीन का जहाज डूब रहा है. दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाने वाले चीन को अमेरिका के साथ ट्रेड वॉर ने गहरा जख्म दिया है. चीन का औद्योगिक उत्पादन 17 साल के न्यूनतम स्तर पर आ गया. चीन के औद्योगिक उत्पादन की वृद्धि दर गिरकर 4.4 प्रतिशत रह गई है. जबकि भारत की औद्योगिक विकास दर पर दुनिया भर में पड़ रहे ट्रेड वॉर का कोई खास असर नहीं पड़ा है. भारत यदि ऐसे समय में अमेरिका के साथ खड़ा हो सकता है, तो चीन की आर्थिक विकास दर पर बहुत बुरा असर पड़ेगा. चीन के लिए भारत चौथा सबसे बड़ा बाजार है. भारत के विदेश मंत्री पहले ही कह चुके हैं कि चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा बहुत ज्यादा है. इस बयान में भी संकेत छिपे हैं कि चीन से होने वाले आयात पर लगाम लगने वाली है. भारत के कुल निर्यात में चीन को जाने वाले सामान की हिस्सेदारी सिर्फ चार प्रतिशत है. ट्रंप प्रशासन भारत को इस बात के लिए प्रेरित कर रहा है कि इस चार प्रतिशत का मोह छोड़कर भारत ज्यादा फायदे में रहेगा. इस बात को एक उदाहरण से समझना होगा. चीन के औद्योगिक उत्पादन में यदि गिरावट बनी रहती है तो चीन की कंपनियों को भारत जैसे देशों का रुख करना होगा. जबकि भारतीय कंपनियों के सामने ऐसी कोई मजबूरी नहीं है. औद्यगिक उत्पादन में गिरावट दर्शाती है कि भारत को सस्ते उत्पादों से पाट देने वाले चीन के छोटे और मझोले उद्योग बर्बादी के कगार पर हैं. इस तरह मेक इन इंडिया उत्पादों की खपत भारत में बढ़ेगी.
सामरिक एवं कूटनीतिक संतुलन
 मोदी सरकार ने बहुत संतुलित तरीके से रूस के साथ संबंधों को भी सामान्य बना दिया है. भारत अपनी रक्षा जरूरतों के आयात का कुल अस्सी फीसद रूस से मंगाता है. अमेरिका भी जानता है कि भारत सबसे बड़ा रक्षा उत्पाद बाजार है. अमेरिकी कंपनियां अगले दस साल में भारत को होने वाले रक्षा निर्यात को दोगुने से अधिक करने के लक्ष्य पर काम कर रही हैं. एक और पहलू चीन की विस्तारवादी रणनीति है. चीन के अपने हर पड़ोसी देश के साथ सीमा विवाद है. भारत चीन के हर पड़ोसी देश के साथ मिलकर काम कर रहा है. भारतीय कंपनियां इन देशों में निवेश कर रही हैं. ऐसे में अमेरिका के सामरिक हितों के साथ ही भारत के सामरिक हित भी जुड़े हैं. हिन्द महासागर, बंगाल की खाड़ी या फिर अरब सागर, अमेरिका को हर किस्म की चुनौतियों से निपटने के लिए भारत की जरूरत है. सामरिक हो या कूटनीतिक, हर कदम पर अमेरिका को भारत की जरूरत है. इसलिए ट्रंप की भलाई इसी में है कि वह भी कहें- हाउडी मोदी...