(व्यापार) युद्ध में भारत
   दिनांक 17-सितंबर-2019
 
चीन और अमेरिका के व्यापार युद्ध में भारत की स्थिति के बारे में भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने जो कहा, उसका आशय है कि चीन-अमेरिका व्यापार युद्ध बुरा नहीं है, अगर इससे विश्व के बाजारों में ज्यादा उचित पहुंच बनाने में मदद मिलती हो। भारत खुद चीन से शिकायत करता रहा है कि चीन के बाजारों में भारत को सही पहुंच नहीं दी जाती। एस जयशंकर के कहने का आशय यह है कि चीन खुद को दुनिया भर के बाजारों में अपना माल बेचकर कमाना चाहता है, पर अपने बाजारों में वह बाहर वालों को जगह नहीं देता।
सारे युद्ध बम और बंदूक से नहीं लड़े जाते, बहुत से युद्ध व्यापार के जरिये लड़े जाते हैं। व्यापार के जरिये युद्ध होता है और युद्ध के जरिये व्यापार होता है। इस समय विश्व की दो ताकतों के बीच व्यापार युद्ध चल रहा है-चीन और अमेरिका भिड़े हुए हैं।
 
अमेरिकन राष्ट्रपति चीन को चोर कहते हैं, अमेरिकन अर्थव्यवस्था के साथ बलात्कार करनेवाला बताते हैं।
 
जो चीन अपनी अर्थव्यवस्था को बंद रखता है, पर अपने हितों के लिए यह कह रहा है कि ग्लोबल अर्थव्यवस्था खुली होनी चाहिए। इसका आशय यह है कि पूरी दुनिया में चीनी साज सामान बिक सके, इस बात की आजादी होनी चाहिए।
चीन द्वारा मौत
2011 में एक किताब 2011 में पीटर नवारू और ग्रेग आट्री की एक किताब आई थी-डैथ बाय चायना, इसमें लेखकों ने बताया था कि किस तरह से चीन अमेरिकन अर्थव्यवस्था को तबाह कर रहा है, ट्रंप इस किताब से बहुत प्रभावित हुए थे। इस किताब में बताया गया था कि इन तरीकों से चीन अमेरिका को ठगने की कोशिश करता रहा है-
1-अवैध तरीके से दी जानेवाली निर्यात सब्सिडी

2-बहुत चतुराई से चीनी मुद्रा की धोखाधड़ी

3-अमेरिकन तकनीकी चीनियों द्वारा चोरी

4-पर्यावरण का भारी नुकसान

5-कामगारों की सेहत और सुरक्षा के साथ समझौता

6-गैर कानूनी तौर पर लगाया गया आयात शुल्क

7-बहुत कम कीमतों के जरिये बाजार पर कब्जा और फिर उपभोक्ताओँ का शोषण

8-विदेशी कंपनियों को चीन से दूर रखना
डैथ बाय चायना के लेखकोँं का संक्षेप में आशय यह था कि चीन जानबूझकर अपनी करेंसी युआन को सस्ता रखता है, ताकि उसके आइटम दूसरे देशों में सस्ते मिल पाएं। इसे यूं समझें कि जैसे अगर एक डॉलर में सात युआन आ रहे हैं तो सात युआन का कोई आइटम अमेरिका में एक डालर का मिलेगा। चीन अपने युआन की कीमत गिरा दे यानी एक डॉलर में चौदह युआन मिलने लग जायें, तो अमेरिका में वही आइटम आधा डॉलर का मिलेगा या एक डॉलर में वो आइटम दो मिलने लगेंगे। चीन विदेशी बाजारों में अपना माल खपाने के लिए इस तरह का फर्जीवाड़ा करता रहा है। खुद भारत भी इसका एक हद तक भुक्तभोगी है, चीनी मोबाइल चीनी आइटम इस कदर सस्ते मिलते हैं भारत में कि भारतीय उद्योगपतियों के लिए उनका मुकाबला करना मुश्किल हो जाता है। यह अनायास नहीं है कि भारत में बिकनेवाले स्मार्टफोनों में सात से ज्यादा चाइनीज ब्रांड के मोबाइल हैं।
तानाशाही बनाम लोकतंत्र की अर्थव्यवस्था
भारत में अगर कर्मचारियों को न्यूनतम वेतन नहीं मिलता, तो इस पर जुलूस धरना प्रदर्शन हो जाते हैं। चीन की तानाशाही में मजदूरों को आवाज उठाने की इजाजत नहीं है। यह अपने आप में विसंगति है कि जो चीन खुद को साम्यवादी होने का दावा करता है, उस चीन की अर्थव्यवस्था मजदूरों के भीषण शोषण पर टिकी है। एप्पल जैसी बड़ी कंपनियां भी चीन की स्थितियों का फायदा उठाती हैं। हाल में चाइना लेबर वाच नामक संगठन ने एक रिपोर्ट में बताया कि फौक्सकोन कंपनी जो एप्पल के लिए भी फोन बनाती है, ने अपने स्टाफ में करीब पचास प्रतिशत टेंपररी स्टाफ रखा, जो सस्ता पड़ता है। जबकि चीनी कानून के मुताबिक दस प्रतिशत से ज्यादा टेंपररी स्टाफ नहीं रखा जा सकता। एक मसला यह है कि चीन तो चलता है तानाशाही रूट पर, उसके राष्ट्रपति जिनपिंग ने खुद को आजीवन राष्ट्रपति घोषित कर दिया है। मतलब चीन में तो जिनपिंग जो चाहेंगे करवा लेंगे, पर भारत और अमेरिका जैसे लोकतांत्रिक देशों में यह छूट हासिल नहीं हैं। उन्हें बढ़ते असंतोष के प्रति जवाबदेह होना होता है।
भारत में चीन
चीन में कारोबार और सरकार कहां तक एक हैं, कहां अलग हैं, यह तय कर पाना मुश्किल है। इसे यूं समझा जा सकता है कि अगर भारत में एयरटेल और सीबीआई कोई समझौता कर लें, फिर कारोबार चलायें, इसके गहन घातक परिणाम हो सकते हैं, हरेक की बातचीत खुले तौर पर सीबीआई के सामने मौजूद होगी। व्यापार युद्ध के हल्ले में अमेरिका ने चीन की एक टेलीकाम कंपनी हुवावे पर प्रतिबंध लगा दिये हैं। इसी हुवावे कंपनी के भारत में निवेश हैं और 5 जी से जुड़े कारोबार में यह कंपनी बढ़कर चढ़कर भाग लेना चाहती है। इस कंपनी के भारतीय सीईओ-चेन मिंगजी ने कहा है कि हुवावे पर भारत सरकार को स्वतंत्र फैसला लेना चाहिए, यानी अमेरिका से प्रभावित होकर नहीं। मिंगजी ने कहा कि चीनी कंपनियों ने भारत में दो लाख से ज्यादा रोजगार पैदा किये हैं। देखना होगा कि भारत सरकार 5 जी से जुड़े मसलों पर किस तरह के फैसले लेती है। कुल मिलाकर चीन हमें अपना माल तो बहुत बेच रहा है, पर हमसे माल कम खऱीद रहा है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक चीन के साथ 2018 में भारत का व्यापार घाटा करीब 58 अरब डालर का था, जो 2017 में करीब 52 अरब डालर का था। यह व्यापार घाटा कैसे कम हो। इस पर भी सरकार को विचार करना होगा।