हिन्दू दर्शन में देह-त्याग के बाद भी जीवात्मा का अस्तित्व
   दिनांक 18-सितंबर-2019
पूनम नेगी
एक असुर के नाम पर बने इस मोक्ष धाम से जुड़ा पौराणिक कथानक अत्यंत प्रेरणादायी है। गयासुर को उसकी तपस्या के कारण यह वरदान मिला हुआ था कि जो भी उसे स्पर्श करेगा उसे यमलोक नहीं जाना पड़ेगा

श्राद्ध तर्पण की परम्परा वैदिक संस्कृति की सबसे अनूठी परम्परा है। किसी भी अन्य देश-संस्कृति में इसकी मिसाल नहीं मिलती। इस परम्परा में सनातन भारतीय संस्कृति की जिस समग्र जीवनदृष्टि के दिग्दर्शन होते हैं, वह अपने आप में अद्भुत है। हिन्दू दर्शन में देह-त्याग के बाद भी जीवात्मा के अस्तित्व, उसके विकास एवं परस्पर भावपूर्ण आदान-प्रदान की बात स्वीकारी गयी है। इसी का प्रखर प्रमाण है मरणोत्तर श्राद्ध-तर्पण। हमारे ऋषि अत्यन्त उच्च कोटि के वैज्ञानिक थे। उन्होंने इस तथ्य को प्रतिपादित किया था कि इस विश्व-ब्रह्माण्ड में कई तत्व ऐसे हैं जो हमें अपनी स्थूल आंखों से दिखाई नहीं देते फिर भी उनके अस्तित्व को नकारा नहीं जा सकता। इस बात को अब विज्ञान भी स्वीकार करने लगा है। "श्रीमद्भगवत गीता" में भगवान श्रीकृष्ण जिस तरह युद्ध विमुख विषादग्रस्त अर्जुन को आत्मा की अनश्वरता का बोध कराकर उसे कर्मपथ पर प्रेरित करते हैं, उसका मकसद भारतीय संस्कृति की इसी चिरन्तन जीवन दृष्टि को पुष्ट करना है।
बताते चलें कि इसी मान्यता के आधार पर वैदिक ऋषियों ने पितृ पूजन की परम्परा का बीजारोपण किया था और इसके लिए भाद्रपद मास की पूर्णिमा से लेकर अश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तक पूरे एक पखवारे की विशिष्ट अवधि को पितरों के प्रति श्रद्धा अर्पित करने के लिए दान-पूजन को निर्धारित की थी। इस बार यह अवधि 13 सितम्बर से 28 सितम्बर तक रहेगी।
ब्रह्मपुराण में कहा गया है कि पितृपक्ष के दौरान हमारे पितरों की आत्माएं मृत्यु लोक में आती हैं व अपने पुत्र-पौत्र व अन्य परिवारी जनों द्वारा किये गए पिण्ड-तर्पण से तृप्त होकर उन्हें आशीर्वाद देती हैं। इन मृतात्माओं को अपने नियत स्थान तक पहुंचने की शक्ति प्रदान करने के निमित्त पिंडदान और श्राद्ध की परम्परा का शुभारम्भ हमारे तत्वदर्शी ऋषियों ने किया था। इस कर्मकांड के पीछे यह भाव-प्रेरणा निहित है कि हम अपने महान पूर्वजों के आदर्शों एवं श्रेष्ठ मार्ग का अनुसरण कर वैसा ही उत्कृष्ट आचरण करने वाले बनें। मार्कडेय, विष्णु व गरुण पुराण में श्राद्ध कर्म की महिमा का बखान विस्तार से किया गया है। महाभारत में ऋषि जाबाल ने कहा है कि जो लोग आश्विन मास के पितृपक्ष में अपने मृत पितरों का श्राद्ध नहीं करते, वे अभागे होते हैं, उन्हें उनके कर्मों का उचित फल नहीं मिलता। अत: प्रत्येक भावनाशील मनुष्य को अपने पितरों की संतुष्टि एवं स्वयं के कल्याण के लिए श्राद्ध तर्पण जरूर करना चाहिए। वैसे तो हमारे देश में पितरों का श्राद्ध, पिंडदान व तर्पण के लिए अनेकों तीर्थ हैं, लेकिन इनमें श्राद्ध तीर्थ "गया" की विशिष्ट महत्ता है। मान्यता है कि यहां फल्गु नदी के तट पर पिंडदान करने से पूर्वजों को अक्षय तृप्ति होती है। इसलिए गया को श्राद्ध, पिंडदान व तर्पण के लिए सबसे फलदायी माना जाता है।
गयासुर के कारण श्राद्धतीर्थ बना "गया"
एक असुर के नाम पर बने इस मोक्ष धाम से जुड़ा पौराणिक कथानक अत्यंत प्रेरणादायी है। गयासुर को उसकी तपस्या के कारण यह वरदान मिला हुआ था कि जो भी उसे स्पर्श करेगा उसे यमलोक नहीं जाना पड़ेगा। इस वरदान के कारण गयासुर को छूकर लोग सीधे बैकुंठ लोक को जाने लगे और यमलोक में सन्नाटा हो गया एवं गया मोक्ष क्षेत्र बन गया। परेशान यमराज ने त्रिदेवों से समस्या सुलझाने की प्रार्थना की। त्रिदेवों ने
गयासुर से कहा कि तुम परम पवित्र हो इसलिए देवगण तुम्हारी पीठ पर यज्ञ करना चाहते हैं। इस सत्कार्य के लिए पुण्यात्मा गयासुर ने तत्काल अपनी देह उत्सर्ग कर दी।
तब भगवान विष्णु ने गयासुर को वरदान दिया कि यह मोक्षधाम अब से तुम्हारे नाम से जाना जाएगा तथा यहां पिंडदान और श्राद्ध करने वाले को सुख प्राप्त होगा। कहा जाता है कि गया में पहले विभिन्न नामों की 360 वेदियां थीं, जहां पिंडदान किया जाता था। इनमें से अब 48 ही बची हैं। हालांकि कई धार्मिक संस्थाएं उन पुरानी वेदियों की खोज की मांग कर रही हैं। वर्तमान समय में इन्हीं वेदियों पर लोग पितरों का तर्पण और पिंडदान करते हैं। पिंडदान के लिए प्रतिवर्ष गया में देश-विदेश से लाखों लोग आते हैं।
गयाधाम में सीता जी ने किया था राजा दशरथ का अनूठा पिण्डदान
"वाल्मीकि रामायण" में गया धाम में सीता जी द्वारा का अपने श्वसुर राजा दशरथ के पिण्डदान करने का अत्यन्त रोचक कथानक मिलता है। कहते हैं कि वनवास के दौरान भगवान राम, लक्ष्मण और सीता माता पितृ पक्ष के दौरान श्राद्ध के लिए यहां आए थे। श्राद्ध कर्म के लिए आवश्यक सामग्री जुटाने हेतु राम और लक्ष्मण नगर की ओर चल दिए। उधर पिंडदान का समय निकलता जा रहा था और सीता जी की व्यग्रता बढती जा रही थी। अपराह्न काल में राजा दशरथ की आत्मा पिंडदान की मांग कर बैठी तो कोई अन्य उपाय न देखकर सीता जी ने गया तीर्थ में फल्गु नदी के तट पर वटवृक्ष, केतकी के फूल और गाय को साक्षी मानकर बालू का पिंड बनाकर स्वर्गीय राजा दशरथ के निमित्त पिंडदान दे दिया। थोड़ी देर में श्रीराम और लक्ष्मण लौटे तो उन्होंने कहा कि समय निकल बीतने के कारण मैंने स्वयं पिंडदान कर दिया। बिना सामग्री के पिंडदान कैसे हो सकता है? इसके लिए श्रीराम ने प्रमाण मांगा। तब सीताजी ने कहा कि इस फल्गू नदी की रेत, केतकी के फूल, गाय और वट वृक्ष मेरे द्वारा किये गये श्राद्धकर्म की गवाही दे सकते हैं। पर फल्गू नदी, गाय और केतकी के फूल गवाही से मुकर गये। सिर्फ वट वृक्ष ने श्राद्धकर्म किये जाने की गवाही दी। इस पर भी जब राम का संशय पूरी तरह दूर न हुआ तो तब सीता ने राजा दशरथ का ध्यान कर उनसे गवाही देने की प्रार्थना की। तब राजा दशरथ की आत्मा ने आकाशवाणी कर सीता द्वारा किए गये तर्पण से तृप्त होने की बात कही। यह सुनकर श्रीराम तो संतुष्ट हो गये किंतु गवाही से मुकरने वालों को माता का कोपभाजन बनना पड़ा। माता सीता ने क्रोधित होकर फल्गू नदी को श्राप दिया कि वह सिर्फ नाम की नदी रहेगी उसमें पानी नहीं रहेगा। इस कारण गया धाम में आज भी फल्गू नदी सूखी रहती है। उन्होंने गाय को श्राप दिया कि तू पूज्य होकर भी लोगों का जूठा खाएगी और केतकी के फूल कभी पूजा में नहीं चढ़ाये जाएंगे। वहीं सीता माता ने वट वृक्ष को लंबी आयु का आशीर्वाद देते हुए कहा कि वह दूसरों को छाया प्रदान करेगा तथा पतिव्रता स्त्री उसका स्मरण कर अपने पति की दीर्घायु की कामना करेंगी। उनका यह आशीष आज भी फलित हो रहा है।