मुसलमानों ने कश्मीर में राजा जयसिंह से रहने के लिए जगह की भीख मांगी थी फिर कर लिया कब्जा
   दिनांक 18-सितंबर-2019
सतीश पेडणेकर
राजा जयसिंह के समय (1128 से 1150 ईस्वीं) कुछ मुसलमान कश्मीर पहुंचे और वहां रहने के लिए उनसे जगह की भीख मांगी। उन्होंने उन्हें जगह दे दी। इसके बाद तो वहां मुसलमानों की ऐसी बाढ़ आई कि कुछ ही बरसों में वह इलाका मुस्लिम-बहुल हो गया

 
रानी दिद्दा के दो पराक्रमी रूप जिन्होंने बरसों तक कश्मीर में मुसलमान शासकों के आक्रमण का सामना किया।
 कश्मीर में शुरुआती दौर में बौद्ध और शैव मत खूब फले-फूले। बाद में तस्वीर बदल गई। अब वह मुस्लिम-बहुल हो गया है। कभी शैव विचारधारा की पवित्र भूमि रहे कश्मीर को षड्यंत्र के तहत मुस्लिम बहुल बनाया गया। कश्मीर के इस्लामीकरण में मुस्लिम सुल्तानों के अलावा सूफी संतों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। आज कश्मीर घाटी में मुस्लिम अच्छी-खासी संख्या में है।
 
वसुगुप्त ने नौवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में कश्मीरी में शैव मत की नींव रखी। इससे पहले यहां बौद्ध और नाथ संप्रदाय ही प्रभावी था। शैव मत के प्रचार-प्रसार में शैवाचार्य अभिनवगुप्त का बड़ा योगदान रहा है, जिन्होंने तंत्रलोक और प्रत्यभिज्ञ दर्शन की रचना की। उस दौर में (10वीं सदी) प्रचलित शंकराचार्य का अद्वैतवाद कहता था कि ब्रह्म सत्य है और जगत मिथ्या। प्रत्यभिज्ञ दर्शन में कहा गया कि अगर ब्रह्म सत्य है तो जगत भी सत्य है।
हिंदू शासकों की कड़ी को तोड़ने का पहला प्रयास इस्लाम की स्थापना के लगभग 300 वर्ष बाद किया गया। यह प्रयास आक्रमण करने वाले गजनी के महमूद ने किया। महमूद गजनवी ने दो बार हमला किया मगर कश्मीर की वादियों से उसको खाली हाथ लौटना पड़ा। गजनवी ने 1015 में पहली बार कश्मीर पर हमला किया था। बताया जाता है कि 1021 में कश्मीर पर दोबारा आक्रमण कर जीतने की इच्छा से आए गजनवी को भागना ही उचित लगा। इसके बाद हिंदू कश्मीर को जीतने का इरादा उसने हमेशा के लिए त्याग दिया।
एक रानी जिसने गजनवी जैसे लुटेरे को एक बार नहीं, बल्कि दो-दो बार देश से खदेड़ दिया, ऐसी वीरांगना थी कश्मीर की रानी दिद्दा। वह इतनी तीक्ष्णबुद्धि थी कि चंद मिनटों में बाजी पलट दिया करती थी। गुरिल्ला वार इसी रानी की देन है। कहा जाता है कि वह 35,000 सेना की टुकड़ी के सामने 500 सैनिकों के साथ पहुंची और 45 मिनट में युद्ध जीत लिया। यह वही महान नायिका है जिसके पति ने अपने नाम के आगे पत्नी दिद्दा का नाम लगाया और दिद्दक सेनगुप्ता के नाम से जाना गया।
1128 से 1150 ईस्वीं तक शूरवीर राजा जयसिंह का कश्मीर पर राज था। उनके काल में मुस्लिम कश्मीर में घुसे और उन्होंने युद्ध नहीं किया, अपितु भीख में रहने की जगह मांगी थी। तबसे कश्मीर में मस्जिदें बनने लगीं और मुस्लिम अधिक तेजी से जनसंख्या बढ़ाने लगे। महमूद के सैनिक हार गए, लेकिन इस्लाम ने हार नहीं मानी। इस्लाम आम जनमानस में धीरे-धीरे घुलने लगा था, लेकिन बिना सत्ता हासिल किए कुछ भी हासिल नहीं होता, सो इंतजार करना और सही मौके को ताकना ही एक मात्र विकल्प था। इस्लाम के रहनुमाओं ने यह धैर्य दिखाया। बुलबुल शाह के समय में ही श्रीनगर में पहली मस्जिद बनी, इसे ही आज बुलबुल लंगर के नाम से जाना जाता है।

13वीं सदी में कश्मीर के राजा सहदेव के समय मंगोल आक्रमणकारी दुलचा ने कश्मीर पर आक्रमण किया। इस अवसर का फायदा उठा कर तिब्बत से आए एक बौद्ध भिक्षु ने इस्लाम कबूल कर अपने मित्र तथा सहदेव के सेनापति रामचंद्र की बेटी कोटारानी के सहयोग से कश्मीर की गद्दी पर अधिकार कर लिया। इस तरह वह कश्मीर (जम्मू या लद्दाख नहीं) का पहला मुस्लिम शासक बना। कालांतर में शाह मीर ने कश्मीर की गद्दी पर कब्जा कर लिया और इस तरह उसके वंशजों ने लंबे काल तक कश्मीर पर राज किया। आरंभ में ये सुल्तान सहिष्णु रहे लेकिन, शाह हमादान के समय में शुरू हुआ इस्लामीकरण सुल्तान सिकंदर के समय चरम पर पहुंच गया। इस काल में हिंदुओं को इस्लाम कबूल करना पड़ा जिसमें जम्मू के भी कुछ हिस्से थे। शाह हमादान के बेटे मीर हमदानी के नेतृत्व में मंदिरों को तोड़ने और तलवार के दम पर इस्लामीकरण का दौर सिकंदर के बेटे अलीशाह तक चला।
कश्मीर में इस्लामीकरण की शुरुआत 1379 में कुतुबुद्दीन के शासनकाल में फारसी आलिम सैयद अली हमदानी के अपने शिष्यों के साथ कश्मीर आगमन से मानी जाती है। सुल्तान ने उसका स्वागत किया। श्रीनगर में उसे अपनी खानकाह बनाने के लिए जमीन दी गई और इस तरह खानकाह-ए-मौला के नाम से कश्मीर में पहली खानकाह (सूफी दरगाह) का निर्माण हुआ। हमदानी ने अपने शार्गिदों को पूरे कश्मीर में मजहब के प्रचार के लिए भेजा। साथ ही उसने सुल्तान को शरिया की शिक्षा दी। कश्मीर के इस्लामीकरण में बड़ा नाम मीर सैयद अली हमदानी का आता है। हमदानी कहने को सूफी संत था मगर उसे कश्मीर में कट्टर इस्लाम का पहला प्रचारक कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।
श्रीनगर में हमदानी का खानकाह-ए -मौला के नाम से स्मारक बना हुआ है। पुराने कश्मीरी इतिहासकारों के अनुसार यह काली देवी का मंदिर था। इस पर कब्जा कर इसे इस्लामिक खानकाह में जबरन परिवर्तित किया गया था। यह मीर सैयद अली हमदानी ही था जिसने कश्मीर के सुल्तान को हिंदुओं के संबंध में राजाज्ञा लागू करने का परामर्श दिया था। इस परामर्श में शामिल था कि हिंदुओं के साथ कैसा बर्ताव करें, जैसे-हिंदुओं को नए मंदिर बनाने की कोई इजाजत न हो। पुराने मंदिर की मरम्मत की कोई इजाजत न हो। मुसलमान यात्रियों को हिंदू मंदिरों में रुकने की इजाजत हो। मुसलमान यात्रियों को हिंदू अपने घर में कम से कम तीन दिन रुकवा कर उनकी सेवा करें। हिंदुओं को जासूसी करने और जासूसों को अपने घर में रुकवाने का कोई अधिकार न हो। कोई हिंदू इस्लाम ग्रहण करना चाहे तो उसे कोई रोकटोक न हो, आदि।
लेकिन सुल्तान सिकंदर का समय आते-आते परिस्थितियां बदल गईं। 1393 में सैयद अली हमदानी के साहबजादे मीर सैयद मुहम्मद हमदानी की सरपरस्ती में सूफी संतों और उलेमाओं की दूसरी खेप कश्मीर आई। अपने पिता के विपरीत मीर हमदानी इस्लाम की स्थापना के लिए हर तरह की जोर-जबरदस्ती का हामी था।
इतिहासकार हसन ने अपनी पुस्तक ‘हिस्ट्री आॅफ कश्मीर’ में कन्वर्जन का जिक्र इस प्रकार किया है, ‘‘सुल्तान सिकंदर ने 1393 में शहरों में घोषणा करा दी थी कि जो हिंदू मुसलमान नहीं बनेगा वह या तो देश छोड़ दे या फिर मार डाला जाए। इस तरह सुल्तान सिकंदर ने लगभग सात मन जनेऊ हिंदू धर्म परिवर्तन करने वालों से जमा किए और जला दिए। धार्मिक ग्रंथों को जलाया दिया गया, मंदिरों को ध्वस्त कर वहां अनेक मस्जिदें बनवाई गर्इं।’’ हिंदू कश्मीर को इस्लामी राष्ट्र में बदलने के खतरनाक इरादों को इतिहासकार एम. डी. सूफी ने ‘कश्मीर’ पुस्तक में विस्तार से लिखा है।
इस तरह से जो कश्मीर कभी हिंदुओं का स्वर्ग होता था, वह धीरे-धीरे हिंदुओं का कब्रिस्तान बना दिया गया। आजादी के बाद हिंदुओं के साथ जो हुआ, वह तो बस कश्मीर से हिंदुओं का अंत ही था। सिकंदर बुतशिकन के बारे में ‘राजतरंगिणी’ बताती है, सुल्तान अपने कर्तव्यों को भुलकर दिन-रात देव मूर्तियां तोड़ने का आनंद उठाता रहता था। उसने मार्तंड, विष्णु, ईशन चक्रवर्ती और त्रिपुरेश्वरी की मूर्तियां तोड़ डालीं। इतिहासकार हसन के अनुसार कश्मीर के विश्व प्रसिद्ध मंदिर मार्तंड सूर्य मंदिर को तोड़ देने का निर्णय किया। लेकिन इसे तोड़ने में एक वर्ष का समय लगा और बाद में इसमें लकड़ियां भरकर आग लगा दी गई थी।
हमदानी के प्रभाव में सबसे पहले जो लोग आए, उनमें सुल्तान का ताकतवर मंत्री सुहा भट्ट था। हमदानी ने उसका कन्वर्जन कर मलिक सैफुद्दीन का नाम दिया और उसकी बेटी से विवाह किया। सुहा भट्ट ने कालांतर में अपनी क्रूरता से सबको पीछे छोड़ दिया और सिकंदर के नेतृत्व में कश्मीर में मंदिरों के ध्वंस और कन्वर्जन का संचालक बना। इस दौर को कश्मीर में ताकत के जोर से इस्लामीकरण का दौर कहा जा सकता है। सुहा भट्ट के प्रभाव में हिंदुओं पर जजिया लगा दिया गया और माथे पर तिलक लगाना प्रतिबंधित कर दिया गया, सोने और चांदी की सभी मूर्तियों को पिघला कर सिक्कों में तब्दील कर दिया गया और सभी हिंदुओं को मुसलमान बन जाने के आदेश दिए गए।
सूफीवाद को इस्लाम का सहिष्णु और उदार रूप माना जाता है। मगर यह दिखावटी ही ज्यादा है। असल में सूफीवाद इस्लामी साम्राज्यवाद और विस्तारवाद की भुजा है। कई सूफी दरवेशों ने काफिरों के खिलाफ युद्ध लड़े। ‘हिंदू व्यू आफ क्रिश्चियनिटी एंड इस्लाम’ में लेखक रामस्वरूप लिखते हैं, ‘‘रूमी जैसे महान सूफी कवियों को देखकर इस्लामी सूफी मत के बारे में आम धारणा बनाना गलत है। वे तो उनके दिखावटी ‘शो पीस’ बनकर रह गए। वे इस्लामी सूफी मत के प्रतिनिधि व्यक्तित्व कभी नहीं बन पाए। सूफी मत की मुख्यधारा तो उनके सिलसिलों के रूप में सामने आई। नक्शबंदी सिलसिला, कादिरिया सिलसिला, चिश्तिया सिलसिला, दरवेश मुबारात, रिबात आदि सिलसिले। इनमें से किसी का अपना कोई दर्शन नहीं था। वे पैगंबरी इस्लाम की मनीषा की हमेशा सेवा करते रहे, बल्कि वे बाखुशी इस्लाम के प्रवक्ता बने। उन्होंने इस्लामी मतवाद की अंध-आस्थाओं पर कभी सवाल नहीं उठाए। यहां तक कि काफिर, जिहाद, जिम्मी, दारुल हर्ब जैसे बर्बर विचार प्रत्ययों के बारे में कोई सवाल खड़े नहीं किए। इस्लामी युद्धों और दमन चक्रों के खिलाफ कुछ बोले हों, इसका कोई साक्ष्य और संकेत नहीं है। इसके विपरीत उनका इतिहास यह है कि वे मुस्लिम साम्राज्यवाद के अभिन्न अंग रहे हैं। उसके हरावल दस्ते और सफरमैना रहे हैं तथा उससे लाभ भी उठाते रहे हैं। भारत में भी इस्लामी साम्राज्यवाद के विस्तार में सूफियों ने उनके सहायक अंग की भूमिका निभाई है। आध्यात्मिकता तो गौण पक्ष है उनके लिए।’’

कश्मीर के इस्लामीकरण में सूफियों की भी अहम भूमिका रही। इसमें विदेशी ही नहीं वरन् देशी सूफियों का भी बड़ा हाथ रहा। इनमें नंद ऋषि प्रमुख थे, जिनका असली नाम नुरुद्दीन था। हमदानी के मंदिर ध्वस्त करो अभियान से कश्मीरी हिंदू समाज में रोष व्याप्त हो गया था। शेख नुरुद्दीन ने कश्मीर के इस्लामीकरण का दूसरा मार्ग पकड़ा। इस्लाम के कन्वर्जन कार्यक्रम पर हिंदू धर्म का रंग चढ़ाकर प्रचार प्रारंभ किया। कभी कश्मीर में एक शिव उपासक योगिनी लालदेवी (14वीं शताब्दी ) का बहुत नाम था। इन्हें कश्मीरी भाषा-साहित्य की विधात्री माना जाता है। ललेश्वरी, लल, लला, ललारिफा, ललदेवी आदि नामों से विख्यात इस कवयित्री को कश्मीरी साहित्य में वही स्थान प्राप्त है जो हिंदी में कबीर को है। इनकी कविता का छंद ‘वाख’ कहलाता है, जिसमें उन्होंने अनुभवसिद्ध ज्ञान के आलोक में आत्मशुद्धता, सदाचार और मानव-बंधुत्व का ऐसा पाठ पढ़ाया जिससे कश्मीरी जनमानस आज तक देदीप्यमान है। लाल देद की कविताएं घर-घर गाई जाती थीं। कश्मीरी जनता में उनका अपूर्व सम्मान था। शीघ्र लाल देवी के भक्त भी नुरूद्दीन को भी उसी दृष्टि से देखने लगे। फिर चालू हुआ कन्वर्जन का सिलसिला जो हर सूफी का वास्तविक मकसद होता है। उन्होंने भी अनेक हिंदुओं का कन्वर्जन कर उन्हें शिष्य बनाकर कन्वर्जन के काम में लगा दिया। नुरूद्दीन के शिष्य खुद को सेकुलर दिखाने के लिए सूफी के स्थान पर अपने को ऋषि कहने लगे।
गौरतलब है कि किसी हिंदू संत ने, चाहे वे गुरुनानक हों या लाल देवी, अपने किसी मुस्लिम भक्त का कन्वर्जन नहीं किया, जबकि इस्लामी सूफियों ने अपने हिंदू भक्तों को मुसलमान बनाया।
अली शाह को अपदस्थ कर उसका छोटा भाई शाही खान जैनुल आब्दीन के नाम से गद्दी पर बैठा और उसने अपने पिता तथा भाई की सांप्रदायिक नीतियों को पूरी तरह से बदल दिया। लेकिन उसकी मृत्यु के बाद शाह मीर वंश का पतन शुरू हो गया और 1540 में हुमायूं के एक सिपहसालार मिर्जा हैदर दुगलत ने सत्ता पर कब्जा कर लिया। उसका शासनकाल 1561 में समाप्त हुआ जब स्थानीय लोगों के एक विद्रोह में उसकी हत्या कर दी गई और अगले 27 साल तक कश्मीर में लूट, षड्यंत्र और अत्याचार का बोलबाला इस कदर हुआ कि कश्मीर के कुलीनों के एक धड़े ने अकबर से हस्तक्षेप की अपील की। अकबर की सेना ने 1589 में कश्मीर पर कब्जा कर लिया और इस तरह कश्मीर मुगल शासन के अधीन आ गया।
इसके बाद 361 साल तक घाटी पर गैर-कश्मीरियों का शासन रहा, जिसमें मुगल, अफगान, सिख, डोगरे आदि रहे। मुगल शासक औरंगजेब और उसके बाद के शासकों ने हिंदुओं के साथ-साथ यहां शिया मुसलमानों पर दमनकारी नीति अपनाई जिसके चलते हजारों लोग मारे गए।
मुगल वंश के पतन के बाद 1752-53 में अहमद शाह अब्दाली के नेतृत्व में अफगानों ने कश्मीर (जम्मू और लद्दाख नहीं) पर कब्जा कर लिया। अफगानी मुसलमानों ने कश्मीर की जनता (मुस्लिम, हिंदू आदि सभी) पर भयंकर अत्याचार किए। धन लूटा और उनकी स्त्रियों का अपमान किया 67 साल तक पठानों ने कश्मीर घाटी पर शासन किया।
पिछली कुछ सदियों के दौरान कश्मीरी हिंदुओं के कई बार बड़े पलायन हुए। पहला पलायन हुआ सुल्तान सिकंदर बुतशिकन के समय। उस वक्त कश्मीर में हिंदुओं के सिर्फ 11 परिवार रह गए थे। दूसरा बड़ा पलायन 17वीं सदी में औरंगजेब के समय हुआ। औरंगजेब ने हिंदुओं को जबरन इस्लाम कबूल कराने का आदेश दिया। उस समय हिंदुओं के प्रतिनिधि थे कृपाराम। वे सिखों के गुरु तेग बहादुर के आनंदपुर साहिब स्थित दरबार में पहुंचे और उन्हें अपनी व्यथा बताई। गुरुजी अपने साथ 5 साथियों को लेकर दिल्ली के लिए रवाना हुए। दिल्ली आने पर जब गुरुजी ने मुगल सम्राट औरंगजेब के आदेश पर इस्लाम स्वीकार करने से इनकार कर दिया तो 11 नवंबर, 1675 को उन्हें मौत की सजा दी गई। 1947 में भी कश्मीर घाटी से हिंदुओं ने पलायन किया। फिर सबसे बड़ा पलायन हुआ जनवरी, 1990 में हुआ।
मुगल सल्तनत के बाद कश्मीर सिख महाराजा रणजीत सिंह के राज्य में शामिल हो गया। कुछ समय बाद जम्मू के हिंदू डोगरा राजा गुलाब सिंह ने ब्रिटिश के साथ संधि करके जम्मू के साथ-साथ कश्मीर पर भी अधिकार कर लिया। डोगरा वंश भारत की आजादी तक कायम रहा। 1839 में रणजीत सिंह की मौत के साथ लाहौर का सिख साम्राज्य बिखरने लगा। अंग्रेजों के लिए यह अफगानिस्तान की खतरनाक सीमा पर नियंत्रण का मौका था तो जम्मू के राजा गुलाब सिंह के लिए खुद को स्वतंत्र घोषित करने का। 1947 में जम्मू और कश्मीर पर डोगरा शासकों का शासन था। राज भले ही हिंदू राजाओं का आ गया था मगर कश्मीर घाटी की ज्यादातर प्रजा मुसलमान हो चुकी थी। हर सुल्तान ने अपने समय में कन्वर्जन का दौर चलाया। इस तरह कश्मीर घाटी का इस्लामीकरण हुआ। यही कारण है कि आज भी वहां अलगाववाद के बीज मौजूद हैं।