कश्मीर में सुरक्षा के लिए पाबंदियां जरूरी
   दिनांक 18-सितंबर-2019
सुशील पंडित
आज जैसी व्यवस्था कश्मीर में है यदि इसकी एक चौथाई भी 1990 में वहां होती तो वहां का हिन्दू समाज सुरक्षित होता। राज्य में आज ऐसी ही व्यवस्था की, तैयारी की जरूरत है
 
कश्मीर में एक वक्त था जब सैकड़ों करोड़ रुपए हुर्रियत पर इसलिए खर्च किए जाते थे ‘उनके दिल जीतने हैं, उनके हाथ में तिरंगा थमाना हैं, उनसे भारत माता की जय बुलवानी है’, लेकिन हुआ कुछ नहीं। जम्मू—कश्मीर में आज जो बदलाव हुआ है यह एक नए युग का सूत्रपात है। यह राजनीतिक इच्छाशक्ति की एक पराकाष्ठा है जो इससे पहले इस देश में देखने को नहीं मिली।
आज भारत ही नहीं, पूरा विश्व भारत के राजनीतिक नेतृत्व का आकलन कर रहा है। 1998 के परमाणु परीक्षणों को लेकर पूरे विश्व में भारत को लेकर समीक्षा की गई थी, इन परीक्षणों के बाद भारत के प्रति पूरे विश्व का नजरिया बदला था। ठीक वैसे ही धारा 370 पर लिए गए इस निर्णय के बाद भी आज पूरा विश्व भारत का एक राजनीतिक शक्ति के रूप में पुन: आकलन कर रहा है कि ये और क्या—क्या कर सकता है? करना चाहते हैं तो कब करेंगे और कैसे करेंगे, इस पर सबकी निगाहें हैं। वहां से धारा 370 हटाए जाने के बाद जम्मू—कश्मीर में जैसी शांति है, मुझे नहीं लगता वहां दशकों से कभी इतनी शांति रही हो। कोई पथराव नहीं, कोई मुठभेड़ नहीं। कहीं कोई आगजनी नहीं, कोई बड़ी वारदात नहीं। इस पर कोेई कुछ नहीं सोच रहा, कोई कुछ नहीं बोल रहा, हां यह सवाल जरूर उठाया जा रहा है कि इंटरनेट कब खुलेगा, मोबाइल कब चलने शुरू होंगे। यह बात सही है कि आज के युग में कम्युनिकेशन बड़ी चीज हो गई है, लेकिन जीने—मरने से ज्यादा जरूरी कुछ भी नहीं। मैं एक बात कहता हूं आज जैसी व्यवस्था कश्मीर में है यदि इसकी एक चौथाई भी 1990 में हुई होती तो हम जैसे लोग सुरक्षित होते कश्मीर में। कश्मीर में ऐसी व्यवस्था की, इस तरह की तैयारी की जरूरत है। इसलिए सरकार है, इसलिए सुरक्षाबल हैं। जान न जाने देना, दंगे न होने देना, नरसंहार बचाना, नागरिकों की सुरक्षा करना यह सरकार का फर्ज है। अगर आपको लोगों की जान बचानी है, किसी भी तरह की अव्यवस्था होने से रोकना है तो उसके लिए कुछ पाबंदियां अनिवार्य हैं, इस तरह की पाबंदियां वहां रहनी बहुत जरूरी है। जितनी देर तक प्रशासन को यह लगता है कि पाबंदियां व्यवस्था बनाए रखने के लिए अनिवार्य हैं तो ऐसा होना ही चाहिए। जो लोग वहां इंटरनेट, मोबाइल फोन न चलने की बात कहकर लोगों की आवाज दबाने की बात कर रहे हैं, इन सब बातों का कोई अर्थ नहीं है। कम से कम वे देश इस पर आपत्ति नहीं कर सकते जो अपने देश के नागरिकों पर ही अपनी वायुसेना का इस्तेमाल करते हैं। वजीरिस्तान में पाकिस्तान हैलीकॉप्टर से फायरिंग कर रहा है, जिससे यहां आएदिन लोग ड्रोन से मारे जाते हैं, ऐसे देश हमारी इस जरूरी कार्रवाई पर आपत्ति नहीं कर सकते। कश्मीर में आज जान और माल सुरक्षित हैं। पिछले कुछ दिनों से कश्मीर जितना सुरक्षित है उतना पिछले कई दशकों से नहीं रहा। हमने संवैधानिक पेचीदगियों को बहुत अच्छे से समझ लिया और उसके अनुसार काम किया। हमने आने वाली परिस्थितियों को भांपकर तैनाती कर दी, सुरक्षाबल बढ़ा दिए, यह बधाई देने की बात है, लेकिन कश्मीर के बारे में सकारात्मक धारणा बनाने की तैयारी कहां है? दरअसल आज की दुनिया में जो मान लिया जाता है, वही सच है। पर जो सच है उसको मनवाने में फिर दशकों लग जाते हैं।
1990 में कश्मीरी पंडितों के साथ जो हुआ उसको मानते—मानते दो दशक से ज्यादा निकल गए, लोग यासीन मलिक को नेल्सन मंडेला का पर्याय समझने लगे, हमको लगभग उलटा लटककर दुनिया को यह बताना पड़ा कि गिलानी, यासीन मलिक, मीरवाइज-इनके हाथ खून से रंगे हुए हैं, ये पूरे के पूरे जातिसंहार के रक्त में सने हैं। ये समझाते—समझाते इतना समय निकल गया। इसलिए अब जो कश्मीर की स्थिति है वह पहले से कहीं बेहतर है, ऐसा किया जाना जरूरी था।
(लेखक कश्मीर मामलों के जानकार हैं)