आतंकियों को पनाह देने वाले पाकिस्तान की हालत बुरी
   दिनांक 18-सितंबर-2019
प्रो. कपिल कुमार
दुनिया भर में पाकिस्तान के इस्लामिक ढकोसले की पोल खुल चुकी है। कुख्यात आतंकी ओसामा बिन लादेन को पनाह देने वाला पाकिस्तान वह देश है जो आतंकी पैदा करता है​ किसी भी मुस्लिम देश ने पाकिस्तान के तमाम प्रयासों और हाथ फैलाने के बावजूद कश्मीर पर उसका साथ नहीं दिया है

 
 
      आतंकियों को पालने और संरक्षण देने के कारण पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान को कहीं से समर्थन नहीं मिल रहा है
कुख्यात आतंकी ओसामा बिन लादेन को पनाह देने वाला पाकिस्तान वह देश है जो आतंकी पैदा करता है, उन्हें प्रशिक्षण देता है, पैसा उपलब्ध कराता है, हथियार मुहैया कराता है और दूसरे देशों में निर्यात करता है। यही नहीं, उस पाकिस्तान का प्रधानमंत्री जब बेशर्मी के साथ अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प के सामने वह यह कबूलता है कि उसके यहां ‘40,000 आतंकी तैयार बैठे हैं’ तो यह कोई हैरानी की बात नहीं, बल्कि आतंकवादी निर्लज्जता की पराकाष्ठा है। इससे पहले भी परवेज मुर्शरफ आतंकियों को अपना ‘मजहबी नायक’ बता चुके हैं। पाकिस्तान के जिहादी मुल्ला खुलेआम टी़वी़ चैनलों पर यह बताते फिर रहे हैं कि अपने प्रचार से आतंकी क्यों पैदा करते हैं। एक ने तो यह तक कह डाला कि ‘मेरा काम लड़ना नहीं है क्योंकि मैं अब एक मौलवी हूं, मेरा काम तो इन्हें तैयार कर अल्लाह से यह दुआ मांगना है कि इन्हें फतह मिले।’ इसी तरह अन्य कट्टरपंथी पाकिस्तानी चैनलों पर अक्सर इस्लाम की आड़ में गजवा-ए-हिन्द की बात करते दिखाई देते हैं। इससे हास्यापद कोई और बात नहीं हो सकती कि जिस देश की सेना ने 1970-71 में लाखों बंगाली मुसलमानों का कत्ल किया हो, जो हर दिन बलूच मुसलमानों का कत्ल करती है, अफगानिस्तान के मुसलमानों का कत्ल करती है, वह देश इस्लाम के नाम पर मुसलमानों का ठेकेदार बनकर गजवा-ए-हिन्द की बात करता है।
यहां पर हमें इमरान खान के वक्तव्य के साथ-साथ दो और वक्तव्यों पर ध्यान देकर सम्पूर्ण मसले का विश्लेषण करना चाहिए। इमरान खान यह जानते हुए कि अमेरिका अपने सैनिकों को अफगानिस्तान से निकालना चाहता है, उसके सामने एक लॉलीपॉप रख रहे थे पिछले महीने अमेरिका और ईरान के संबंध भी इतने खराब थे कि युद्ध की स्थिति बन गई थी। इमरान खान यह चाहते थे कि अमेरिका यदि पाकिस्तान की कश्मीर नीति का समर्थन कर दे तो वह इन कबाइली आतंकवादियों को अफगानिस्तान की सीमा से हटाकर भारत और ईरान की तरफ भेज देगा। इसके पीछे का इरादा 1947 से चली आ रही कबाइलियों के प्रति पाकिस्तान की नीति को दोहराना था।
1947 में ब्रिटिश भारत की अफगानिस्तान के साथ जो सीमाएं थीं, वे अब पाकिस्तान और अफगानिस्तान की सीमाएं बन गई थीं। इस समय इन इलाकों में पख्तूनिस्तान, पठानिस्तान और बलूचिस्तान की मांग उठ चुकी थी, जिसे अफगानिस्तान का समर्थन प्राप्त था। पाकिस्तान घबरा उठा था कि इन इलाकों में यदि विद्रोह होता है और अफगानिस्तान तथा भारत इनकी मदद करते हैं तो पाकिस्तान कहीं का नहीं रहेगा। इसलिए इन इलाकों में यह दुहाई दी गई कि कश्मीर में इस्लाम खतरे में है, यह प्रचार किया गया कि कश्मीर का राजा हिन्दू है इसलिए वहां मुसलमानों पर अत्याचार हो रहे हैं। यही नहीं, यह भी कहा गया कि पटियाला का राजा सिख है और वह मुसलमानों का कत्लेआम करा रहा है, इसलिए हमें कश्मीर जीतते हुए पटियाला को भी जीतना है। इस प्रकार लगभग 1 लाख कबाइलियों को कश्मीर पर हमला करने के लिए लाया गया। यही दुहाई पाकिस्तान ने तालिबान बनाते समय दी थी कि अफगानिस्तान में इस्लाम खतरे में है, यही दुहाई वह लगातार कश्मीर को लेकर देता रहा है और आज फिर से उसे पूरे जोर-शोर के साथ उठाने की कोशिश कर रहा है।
तालिबान ने कश्मीर को लेकर एक महत्वपूर्ण बयान दिया जिस पर हमारे विश्लेषणकर्ताओं ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया। 1947-48 में अफगानिस्तान ने यह घोषणा की थी कि जो कबाइली भारत के विरुद्ध लड़ने जाएंगे उन्हें अफगानिस्तान में वापस नहीं लिया जाएगा और ठीक ऐसी ही घोषणा इस समय तालिबान ने की है कि पाकिस्तान कश्मीर के मुद्दे को उनसे नहीं जोड़े। शायद तालिबान भी इमरान खान की चाल को समझ गया है कि अमेरिका को खुश करने के लिए जो मुजाहिद्दीन पाक सेना के समर्थन से तालिबान के साथ मिलकर लड़ रहे हैं, वह उन्हें भारत की तरफ भेजना चाहता है और पिछले एक महीने के घटनाक्रम ने यह साबित भी कर दिया है कि पाकिस्तान कबाइली आतंकियों को भारत की सीमाओं पर इकट्ठा कर कश्मीर भेजने का प्रयास कर रहा है।
तीसरी तरफ ट्रम्प ने कुछ दिन पहले यह अपील की थी कि अफगानिस्तान की सुरक्षा के लिए भारत भी अपनी सेनाएं भेजे। यहां यह भी बताना जरूरी है कि 1947-48 में अमेरिका ने पाकिस्तान का समर्थन नहीं किया था जबकि अंग्रेजी हुकूमत पूरी तरह पाकिस्तान के साथ खड़ी थी। आज पाकिस्तान के इस्लामिक ढकोसले की पोल खुल चुकी है और एक भी इस्लामिक देश ने पाकिस्तान के रोने-पीटने और भीख मांगने के बावजूद कश्मीर पर उसका साथ नहीं दिया है।
राष्टÑभावी भारतीय मुसलमानों ने भी पाकिस्तान को चेतावनी दी है कि वह भारत के मुसलमानों का ठेकेदार बनने की कोशिश न करे। कश्मीर के मुस्लिम युवक भारतीय सेना में शामिल होकर औरंगजेब जैसे भारतीय वीर सैनिक और उसके भाइयों का अनुसरण कर रहे हैं। यह पाकिस्तान के मुंह पर एक और जोरदार तमाचा है।
भारतीय सीमा पर विशेष तौर से कश्मीर में पाकिस्तान सीधा युद्ध तो लड़ नहीं सकता है क्योंकि उसकी सेना जानती है कि उसे मुंह की खानी पड़ेगी। ऐसी स्थिति में सीमा पर रोज गोलाबारी करना और आतंकियों को भारत भेजने की कोशिश करना ही उसके पास एकमात्र चारा है।
हालांकि वह सर्जिकल स्ट्राइक और बालाकोट में हुई एयर स्ट्राइक से घबराया हुआ भी है, परन्तु आई़एस़आई़ और पाकिस्तानी सेना के सामने वहां की जनता पर अपना वर्चस्व बनाए रखने और मुंह दिखाने के लिए उसके पास और कोई रास्ता नहीं है।
इन परिस्थितियों में भारत को 1948 की भूल को दोबारा नहीं दोहराना चाहिए। कबाइलियों का हमला होते ही सरदार पटेल ने मंत्रिमण्डल की बैठक में यह प्रस्ताव रखा था कि तुरंत इनके ठिकानों पर बमबारी कर उन्हें ध्वस्त कर देना चाहिए परन्तु तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू ने यह बात नहीं मानी थी। सौभाग्यवश आज की भारत सरकार ने इस संदर्भ में भारतीय सेना को स्थिति अनुसार कार्यवाई करने की खुली छूट दे दी है और सेना सीमाओं पर मुंह तोड़ जवाब दे भी रही है। इन परिस्थितियों में यह आवश्यक है कि जब तक कश्मीर में आतंकवादियों, पृथकतावादियों और उनके समर्थकों को दरकिनार नहीं कर दिया जाता तब तक कश्मीर में यथास्थिति आवश्यक है। इसके साथ-साथ यह भी आवश्यक है कि वहां की आम जनता को सभी आवश्यक सुविधाएं जैसे- चिकित्सा और दवाखाने और रोजमर्रा के इस्तेमाल की वस्तुएं आदि मुहैया कराई जाएं और विकास की गति को तीव्र किया जाए, जिससे पाकिस्तान के खोखले दावे और ध्वस्त हो जाएं।˘
(लेखक ‘इग्नू’ में स्वतंत्रता संघर्ष और प्रवासी अध्ययन केंद्र के निदेशक और इतिहास विभागाध्यक्ष हैं)