दूधमुंहे बच्चों पर पाकिस्तानी सेना का जुल्म
   दिनांक 19-सितंबर-2019
कलात से इफ्तिखार शहवानी
पाकिस्तान की फौज बलूचों के साथ जैसा अत्याचार कर रही है, उसे शब्दों में बताना आसान नहीं है। दुधमुंहे बच्चों की हत्या उनके मां-बाप के सामने की जा रही है, उनकी कोई नहीं सुन रहा

 
 
पाकिस्तानी फौज ने बस रुकवाकर इन मासूम बच्चों और उनके मां-बाप को अपने कब्जे में ले लिया। बाद में इन सभी की हत्या कर दी गई।
जंग में दुश्मन की महिलाओं के साथ बदसलूकी कितनी भी गैर-इंसानी सुलूक क्यों न लगे, यह होता रहा है। लेकिन अगर कोई कब्जागीर फौज दहशतगर्दी की बिसात पर दूध पीते बच्चों को भी मोहरा बनाने लगे तो मान लेना चाहिए कि वह मायूसी और बेचारगी के जबर्दस्त दौर से गुजर रही है। पाकिस्तान के साथ ऐसा ही हो रहा है। हुकूमती दहशतगर्दी के कसते शिकंजे के साथ जैसे-जैसे पाकिस्तान माली तौर पर मुश्किल हालात में फंसता जा रहा है, उसकी बौखलाहट बढ़ती जा रही है। हाल-फिलहाल में बलूचिस्तान में जो कुछ हो रहा है, वह पाकिस्तानी हुकूमत की इसी सोच का नतीजा है।
क्वेटा से करीब 145 किलोमीटर दूर है कलात। वही कलात, जिसे अंग्रेजों ने पाकिस्तान के वजूद में आने से पहले ही एक मुकक्मल देश के तौर पर तैयार किया था। वही कलात, जिस पर 1948 में पाकिस्तानी फौज ने जबरन कब्जा कर लिया और कलात के खान ने इसका जबर्दस्त विरोध किया। वही कलात, जो पाकिस्तानी जोर-जबर के खिलाफ बलूचिस्तान की आवाज बना। इसी कलात के एक छोर पर है इबातदगाह 'शाह दरबार'। लोग दूर-दूर से यहां जियारत करने आते हैं। मस्तूंग के इस्प्लिंजी इलाके में रहने वाला एक परिवार भी हाल ही में यहां जियारत करने आया। जब ये लोग लौट रहे थे तो रास्ते में पाकिस्तानी फौज ने बस रोककर उसमें से इस परिवार को उतार लिया। फिर ये लोग 36 घंटे से भी ज्यादा समय तक फौज के कब्जे में रहे। इन्हें दिमागी और जिस्मानी तौर पर हिंसा से दो-चार होना पड़ा। अब जरा इस परिवार के लोगों पर गौर कीजिए। हाजी रहीम बंगुलजई के साहबजादे अब्दुल अजीज, 35 साल की सलीमा बंगुलजई और उनके तीन बच्चे-10 साल की फरीदा, पांच साल की जन्नत और एक साल का जुबैर अहमद। फौज ने जिस तरह से बस के और लोगों को छोड़कर सीधे इसी परिवार पर हाथ डाला, उससे अंदाजा लगता है कि उन्हें पता था कि किसे उठाना है। सवाल यह है कि यही परिवार क्यों? इसका जवाब देते हैं हामिद बंगुलजई। मस्तूंग के ही रहने वाले हामिद कहते हैं, ''इस परिवार का ताल्लुक रहमतुल्ला शहीन, अब्दुल रसूल कवाई जैसे लोगों से है। इन्हें पाकिस्तानी फौज ने अगवा किया और तरह-तरह के जुल्म के बाद इनकी लाशें फेंक दी गईं। इसी परिवार के एक और शख्स हैं अब्दुल खता बंगुलजई, जो आज तक लापता हैं। यह अपने आप में सोचने की बात है कि पांच लोगों के परिवार में बस एक ही तो पुरुष था! बाकी तो एक महिला और तीन छोटे-छोटे बच्चे थे। अगर किसी के दिल में इंसानियत का एक कतरा भी मौजूद होगा, तो वह भला इन पर जुल्म कैसे कर सकता है?'' वैसे तो बलूचिस्तान के ज्यादातर इलाकों में फौजी जबर के खिलाफ गुस्सा है और वे अपनी बेहतरी पाकिस्तान से आजाद होने में मानते हैं, लेकिन बलूचिस्तान के जो चंद इलाके आजादी की इस मुहिम में आगे रहे हैं, उनमें मस्तूंग शामिल है।
कौमी आजादी के हामी लोगों पर फौजी जुल्म कोई नई बात नहीं है। हां, नई बात है कब्जागीरों में बौखलाहट का ऐसा आलम कि वे छोटे-छोटे बच्चों पर भी अपना गुस्सा उतारने लगें। कलात के रहने वाले रहमत मेंगल कहते हैं, ''इनसानी हकूक को फौजी जूतों के नीचे रखने वाले लोगों से भला और क्या उम्मीद की जा सकती है? वे किसी भी हद तक जा सकते हैं और जाते रहे हैं। क्या हमने अपने लोगों को गायब होते और बेजुबान लाशों में तब्दील होते नहीं देखा? क्या हमने अपनी महिलाओं की अस्मत लुटते नहीं देखी? हमने उन सब को जिया है, जिनका जिक्र करना तक खौफनाक होता है। वे बलूचों का हौसला तोड़ना चाहते हैं। यह अहसास दिलाना चाहते हैं कि आप सुरक्षित नहीं, आपकी महिलाएं सुरक्षित नहीं, आपके बच्चे सुरक्षित नहीं, आपकी इबादतगाह सुरक्षित नहीं।'' कहना न होगा कि पांच लोगों के इस परिवार को फौजी जबरदस्ती और आतंक का सामना इसलिए करना पड़ा, क्योंकि इस जमीन से कौमी आजादी की उठने वाली आवाज जरा तेज होती है। हामिद बंगुलजई आज के हालात को दूसरे तरीके से भी देखते हैं। उन्हें लगता है कि यह बलूचिस्तान की अलग पहचान को मिटाने की कोशिश है। वे कहते हैं, ''अफसोस की बात है कि वजूद में आने के बाद पाकिस्तान की सियासत में कमोबेश मतलबी और मौकापरस्त पंजाबी सोच का बोलबाला रहा। हैरत की बात है कि एक ही पंजाब के दो टुकड़े, समझ में इतने अलग कैसे हो गए? बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा और फाटा के इलाकों में जो मसले हैं, उसकी वजह पंजाबी रहे हैं। शायद यह उनकी तंगखयाली का ही नतीजा है कि उन्हें हमारे तौर-तरीके, हमारी तज्जलीखेज (रोशनी फैलाने वाली) रवायत से ऐतराज है। वे हमें हमारी तारीख से जुदा करना चाहते हैं।'' इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि बलूचिस्तान की सरजमीं की तारीख काफी पुरानी है, इस्लाम के वजूद में आने से भी पुरानी। उस दौर में भी तमाम कबीले अपने अलग-अलग तौर-तरीकों के साथ अमन से रह रहे थे और इसमें दूसरे मजहबों के लिए भी गुंजाइश थी। इसकी बानगी है कलात में खान के टीले से ठीक नीचे का काली मंदिर। कम ही लोगों को पता होगा कि यह मंदिर 1,500 साल से भी पुराना है। इसकी मूर्ति संगमरमर की है और यहां आज भी पूरे पाकिस्तान और पाकिस्तान के बाहर से भी हिंदू आते हैं। बलूचों की यही मजबूती थी जो पाकिस्तान को रास नहीं आई। कलात के सरकारी डिग्री कॉलेज में प्रोफेसर मस्तूंग के वाकये को कुछ अलग नजरिए से देखते हैं। वे कहते हैं, ''हर जगह की एक तबीयत होती है, उसका एक मिजाज होता है। हमें इस नजरिए से भी इस इलाके में आज हो रहे वाकयों को देखना चाहिए। पुराने समय में मस्तूंग का इलाका कलात में आता था और कलात के इस हिस्से में ज्यादा आबादी कलात के खान की फौज की थी। कलात के खान के फौजियों की नस्लें आज भी इसी इलाके में रह रही हैं। इस वजह से यहां की मिट्टी में वतन के लिए जान देने का जज्बा आज भी कुछ ज्यादा ही है। यहां के ज्यादातर लोगों में पाकिस्तान के गैरवाजिब कब्जे से बाहर निकलने की बेचैनी है, वे पाकिस्तान के जुल्मों के खिलाफ आवाज बुलंद करते हैं और इसीलिए इस जमीन से मीर अब्दुल बंगुलजई और हमीद शाहीन जैसे लोगों के पैदा होने का एक लंबा सिलसिला है।'
दरअसल, बलूचिस्तान में पाकिस्तानी दहशतगर्दी का दौर पाकिस्तान के बनने के बाद से ही चलता रहा है। एक अंतर जरूर है। पहले ये दौर तूफान की तरह आता था और पीछे छोड़ जाता था तबाही। लेकिन सीपीईसी ने यहां के हालात बदल दिए। इस पर तामीर शुरू होने के साथ ही दहशतगर्दी का जो दौर शुरू हुआ, वह खत्म नहीं हो रहा। मस्तूंग के वाकये को प्रोफेसर एक और तरीके से देखते हैं। वे कहते हैं, 'फौज छोटे-छोटे बच्चों, औरतों को इसलिए निशाना बना रही है कि वह लोगों में दहशत फैलाना चाहती है। उसे पता है कि अगर बलूचों की कौमी आजादी की जद्दोजहद को नहीं रोका गया तो यह बढ़ती ही जाएगी। दूसरे लफ्जों में कह सकते हैं कि बच्चों और औरतों पर जुल्म उनके खौफजदा होने का सबूत है।' अगर पाकिस्तानी फौज खौफ में है और इसी वजह से वह बलूचिस्तान में औरतों-बच्चों को भी नहीं बख्श रही, और उसे लगता है कि इससे बलूच कौमी आजादी की राह से जुदा हो जाएंगे, तो वह भूल कर रही है। इस तरह की हरकतों से पाकिस्तान से आजाद होने का बलूचों का जज्बा और मजबूत होगा। *