एक फैसले ने बदला युग
   दिनांक 02-सितंबर-2019
तरुण विजय 
नरेंद्र मोदी और अमित शाह अनुच्छेद 370 को हटाकर भारतीय राष्ट्रीयता की गौरव विजय यात्रा के प्रतीक बन गए हैं
 
आजादी के बाद शायद ही एक मांग और फैसले ने सात दशक तक समाज के एक बहुत बड़े हिस्से को इतना आंदोलित किए रखा, जो अनुच्छेद 370 हटाने के बारे में था। मोदी-शाह वस्तुत: 370 को हटाकर भारतीय राष्ट्रीयता की गौरव विजय यात्रा के प्रतीक बन गए हैं। यह डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का व्यावहारिक रूप है। इस एक फैसले के लिए संघ, जनसंघ व भाजपा के कार्यकर्ता देश के कोने-कोने में हर सम्मेलन और हर चुनाव में प्रतिबद्धता व्यक्त करते रहे। जम्मू-कश्मीर के शेष भारत में संपूर्ण व निर्बाध विलय के लिए अनेक आंदोलन हुए, जिनमें डॉ़ मुखर्जी का 1953 का अभियान सिर्फ इसी फैसले के लिए बलिदान में परिणत हुआ। उसे प्रस्तुत करने का सौभाग्य विधि ने नरेंद्र मोदी व अमित शाह के लिए सुरक्षित रखा था। यह अद्भुत फैसला अप्रत्याशित रूप से कुछ इस तरह आया जिसे राज्यसभा में कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद ने एटम बम जैसा कहा।
 
वास्तव में जिन लोगों ने अभी तक पाकिस्तान समर्थक तत्वों के साथ हमजोलीपन निभाया, जिन्हें जम्मू-कश्मीर में भारत के तिरंगे के साथ अजीबोगरीब कश्मीरी झंडा लहराते हुए देखकर भी तकलीफ नहीं हुई, जिन्हें सिर्फ अनुच्छेद 370 के कारण सात दशकों से जम्मू-कश्मीर की महिलाओं के साथ हुए अमानुषिक व संवेदनहीन भेदभाव से कोई परेशानी नहीं हुई, उनके लिए भारतीय राष्ट्रीयता और तिरंगे की शान के लिए अमित शाह द्वारा लाया गया संशोधन एटम बम से कम था ही नहीं। उन्होंने अनुच्छेद 370 पर लोकसभा में हुई बहस में मौलाना हसरत मोहानी के इस कथन को भुला ही दिया था कि यह एक अस्थायी व्यवस्था है जो कालांतर में स्वयं खत्म हो जाएगी। सब दलों ने यह मान लिया था कि अनुच्छेद 370 तब तक रहेगा, जब तक सूरज-चांद रहेंगे। किसी दल के किसी व्यक्ति ने कभी नहीं सोचा कि अनुच्छेद 370 के कारण कश्मीर में जन्मते ही हर बच्चे को यह अहसास करा दिया जाता है कि वह भारतीय नहीं है। भारत से अलग है, इसीलिए भारत का संविधान उस पर लागू नहीं होता, इसीलिए जम्मू-कश्मीर का झंडा अलग है। इसीलिए जम्मू-कश्मीर की पाठ्यपुस्तकों में राष्ट्रीय झंडे, जन-गण-मन या वंदे-मातरम् का उल्लेख नहीं होता। केवल 370 के कारण ही जम्मू-कश्मीर में अनुसूचित जाति/जनजाति के लोगों को आरक्षण का प्रावधान नहीं है। पाखंड, राजनीतिक तुष्टीकरण और देश हित को रौंदते हुए अल्पसंख्यक चाटुकारिता का आलम यह था कि जम्मू-कश्मीर की लड़की को प्रदेश के बाहर किसी भी भारतीय से विवाह करने पर राज्य-नागरिकता से हाथ धोना पड़ता था। उसकी मर्मांतक चीखें भी वोटबैंक की निर्दयता के कारण किसी ने नहीं सुनीं। ऐसा कोई देश नहीं होगा जो अपने देश के एक हिस्से को विदेशी जैसा माने। जम्मू-कश्मीर के हिन्दू और मुसलमान एक ही जाति, नस्ल व पूर्वजों की साझी विरासत वाले लोग हैं। हिन्दुओं में रैना, कौल, भट्ट हैं तो मुसलमानों में भी हैं। लेकिन कश्मीरी हिन्दुओं को संभवत: दुनिया के इतिहास में सबसे ज्यादा प्रताड़ित और अमानुषिक अत्याचारों का शिकार बनाकर निकाला गया तथा उनके हाथों में शरणार्थी कार्ड व तंबुओं के अलॉटमेंट थमा दिए गए। वहीं, रैना, भट्ट और कौल जातियों का नाम इस्तेमाल करने वाले मुस्लिम समाज के एक वर्ग में एके-47, बम और बलात्कार की दरिंदगी अपना ली गई।
 
जिन नेताआें व दलों ने राज्यसभा में 370 हटाने पर दु:ख और क्षोभ व्यक्त किया, उन्होंने देश को अपने से खोया तथा देश का मन आहत किया। विपक्ष के पास 370 नहीं हटाने के लिए एक भी तर्क नहीं था। उन्होंने एक बार भी कश्मीरी हिन्दुओं के संत्रास व कश्मीरी महिलाओं के प्रति अमानवीय भेदभाव रोकने के लिए नहीं कहा। इन सबकी मानवीयता वोट जीतने या हारने की तुला पर तुलती है। यदि उन्हें लगता है कि जम्मू-कश्मीर में अमानवीय प्रावधानों का समर्थन करके उन्हें बंगाल, बिहार या अन्य प्रांतों में मुस्लिम वोट मिल जाएंगे तो वे गहरी आत्मवंचना का शिकार हैं। भारत के मुसलमान देशद्रोहियों का साथ देने पर किसी राजनीतिक दल का समर्थन करेंगे, यह सोचना भी उनका अपमान है। तीन तलाक पर भी एक काल बाह्य रूढ़ि का समर्थन कर सेकुलर दलों ने मुस्लिमों का अपमान किया है। जम्मू-कश्मीर देश का अकेला मुस्लिम बहुल प्रांत है। वहां हिन्दुओं के दुख पर चुप रहना तथा उसे बिना शर्त शेष भारत में मिलाने के मार्ग में बाधा, अनुच्छेद 370 को हटाने का विरोध करना मुसलमानों को खुश नहीं कर सकता। उन्हें विकास, सम्मान उतना ही चाहिए जितना भारत के किसी अन्य मतावलंबी को। नीतीश कुमार ने 2013 में नेपाल से लाए जाने पर इंडियन मुजाहिदीन के खूंखार आतंकी यासीन भटकल को गिरफ्तार करने से इसी तुष्टीकरण की नीति के कारण मना कर दिया था। तब एनआईए को कोलकाता में भटकल को गिरफ्तार करना पड़ा था। इससे जदयू के कितने मुस्लिम वोट बढ़े होंगे? मुसलमान देशभक्त हैं, यह मानकर राजनीति करना राष्ट्रहित में है या देश विरोधी टुकडेÞ-टुकड़े गैंग के साथ खड़े होकर सोचना कि अब मुसलमान खुश हो जाएंगे? (लेखक राज्यसभा के पूर्व सांसद हैं)