पुस्तक समीक्षा मिशनवादी पत्रकार थे गांधी जी
   दिनांक 02-सितंबर-2019
 
 
‘गांधी की पत्रकारिता’ में 15 विद्वानों के लेख समाहित हैं। इंग्लैंड में वकालत पढ़ने से पहले गांधी जी ने समाचार पत्र देखा तक नहीं था। वहीं एक सोसायटी द्वारा प्रकाशित ‘वेजीटेरियन’ नामक अंग्रेजी पत्रिका से उनका परिचय हुआ।
 
महात्मा गांधी की पत्रकारिता पर केंद्रित पुस्तक ‘गांधी की पत्रकारिता’ में 15 विद्वानों के लेख समाहित हैं। इंग्लैंड में वकालत पढ़ने से पहले गांधी जी ने समाचार पत्र देखा तक नहीं था। वहीं एक सोसायटी द्वारा प्रकाशित ‘वेजीटेरियन’ नामक अंग्रेजी पत्रिका से उनका परिचय हुआ। शाकाहार के संबंध में उन्होंने इसमें अनेक लेख लिखे। यहीं से पत्रकारिता का महत्व उनकी समझ में आया।
 
गांधी जी का लक्ष्य था अंग्रेजों की दमनकारी शासन व्यवस्था के प्रति जनजागरण करना। सत्य, अहिंसा एवं न्यायपूर्ण व्यवस्था का विश्वास जनसाधारण के मन तक पहुंचाना। पत्रकारिता को इसी लक्ष्य की पूर्ति के लिए उन्होंने साधन के रूप में अपनाया। पुस्तक में प्रकाशित 15 लेखों में इसी तथ्य को उजागर किया गया है। पुस्तक की भूमिका वरिष्ठ लेखक बनवारी ने लिखी है। भूमिका के अंत में उन्होंने लिखा है, ‘‘अपनी सभ्यता की स्मृति को बनाए रखने के लिए पत्रिकाएं प्रभावी हो सकती हैं। यह भ्रम है कि समाज में रंगीन और महंगी छपाई ही ग्राह्य है। सादगी का अपना आकर्षण होता है। पत्रिकाओं की सामग्री अवश्य ऐसी हो जिसमें समाज को आगे का मार्ग दिखता हो और उसकी अपनी मान्यताओं का उसमें दिग्दर्शन हो। विपरीत परिस्थितियों में गांधी खड़े हुए थे। उनकी पत्रकारिता भी। उनमें संकल्प था। वैसा संकल्प हो तो ऐसी पत्रकारिता की गुंजाइश सदा रहेगी। अगर आप पत्रकारिता को पूरे समाज के मंगल की भावना से जोड़ सकें तो वह गांधी जी जैसी पत्रकारिता ही होगी।’’
 
पुस्तक में पहला लेख है वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय का। वे गांधी जी के बारे में लिखते हैं, ‘‘उनकी पत्रकारिता मुनाफे के लिए नहीं, अपितु सद्भाव, संस्कार और समयानुकूल परिवर्तन के लिए थी। वे मन-गढ़ंत, द्वेषपूर्ण एवं चरित्र हनन की खबरों के घोर विरोधी थे।’’ प्रो. आनंद कुमार अपने लेख में लिखते हैं, ‘‘गांधी जी अपने विचार पाठकों पर लादते नहीं हैं, बल्कि वे पाठकों को अपना स्वामी मानते हैं। वे पाठकों को अपने दुर्गणों से भी अवगत कराते रहते थे। समाज की बुराइयों के बारे में बताने में भी वे जरा भी नहीं घबराते थे। छुआछूत, बालविवाह, महिलाओं को न पढ़ाना, कोढ़ियों की उपेक्षा आदि विषयों पर वे सदैव लिखते थे।’’
दीपांकर श्रीज्ञान ने अपने लेख ‘पत्रकार गांधी’ में लिखा है, ‘‘महात्मा गांधी से बड़ा कोई पत्रकार नहीं है। एक अकेला व्यक्ति, उसके द्वारा पांच-छह पत्रिकाओं का संपादन करना, रोज अखबारों में लिखना और अपनी लेखनी से पूरे देश को एक साथ करना इससे बड़ी पत्रकारिता मेरी दृष्टि में नहीं हो सकती है।’’ ‘महात्मा गांधी की सर्वकालिक पत्रकारिता’ में रामशरण जोशी लिखते हैं,‘‘गांधी जी की पत्रकारिता, मिशनवादी पत्रकारिता थी। लेकिन वर्तमान दौर में ऐसी पत्रकारिता लुप्त होती जा रही है, बल्कि लुप्त हो चुकी है। मिशनवादी पत्रकारिता के वाहक नाममात्र ही बचे हैं।’’
 का भी एक लेख ‘गांधी जी की पत्रकारिता मूल रूप से एक संवाद है’ शामिल है। इसमें वे लिखते हैं, ‘‘गांधी जी ने पत्रकारिता के लिए पत्रकारिता नहीं की या फिर उन्होंने ऐसा पत्रकारिता के लिए नहीं किया। गांधी द्वारा निर्मित परिपाटी के लिए हम यह कह सकते हैं कि ऐसा उन्होंने खुद अपने ऊपर एक अनुशासन लागू करने के लिए किया।’’ ‘महात्मा गांधी का पत्रकार जीवन’ लेख में ब्रजेश कुमार लिखते हैं,‘‘सत्य के विरुद्ध कोई कुछ कहे, यह बात उन्हें सहन नहीं थी। लॉर्ड कर्जन ने एक बार किसी प्रसंगवश सत्य के विरुद्ध कुछ आपत्तिजनक टिप्पणी की, तब गांधी जी सत्य की ढाल बनकर खड़े हो गए और उन्होंने ‘इंडियन ओपिनियन’ के माध्यम से सशक्त ढंग से लॉर्ड कर्जन के मत का खंडन किया था।’’
 
यह पुस्तक गांधी जी की पत्रकारिता को समाज के सामने लाने में सफल रही है। यह पुस्तक उन पाठकों को अवश्य पढ़नी चाहिए, जो गांधी जी कीे लेखनी से परिचित होना चाहते हैं।—मायाराम ‘पतंग’