जब बंगाल में मुसलमानों ने किया था हिंदुओं का कत्लेआम
   दिनांक 02-सितंबर-2019
सुमंतो घोष 
मुसलमानों की भारी भीड़ हैरिसन रोड से सियालदाह रेलवे स्टेशन की तरफ जा रही थी। सभी ने काले कपड़े पहने थे और हाथों में लाठी, बरछे थे और नंगी तलवारें लहरा रही थीं। मुसलमान चिल्ला रहे थे, ‘हमें पाकिस्तान चाहिए, डायरेक्ट एक्शन जिंदाबाद’ 

 
बंगाल प्रोविंस का तत्कालीन प्रधानमंत्री हुसैन शाहिद सोहरावर्दी जिन्ना का समर्थक था उसने मुसलमानों को खुल हिंदुओं का कत्ल करने की छूट दे दी थी
 हम हर वर्ष 15 अगस्त को बड़े धूमधाम स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं, लेकिन यह भूल जाते हैं कि इससे ठीक एक साल पहले 16 अगस्त, 1946 की ‘ग्रेट कोलकाता किलिंग’ हुई थी, जो भारत विभाजन होने का एक बहुत बड़ा कारण थी। सन‍् 1940 के शुरू में ही मोहम्मद अली जिन्ना की मुस्लिम लीग ने भारत को विखंडित कर सिर्फ मुसलमानों के लिए एक पाकिस्तान का सपना देखना आरंभ कर दिया था। जिन्ना का स्वास्थ्य निरंतर गिर रहा था। मुस्लिम लीग के कुछ नेता जिन्ना का विरोध भी कर रहेे थे। हैदराबाद के विख्यात मुस्लिम नेता डा. सईद अब्दुल लतीफ जिन्ना के भारत-पाक सिद्धांत का विरोध कर रहे थे। लेकिन जिन्ना अपनेे सिद्धांत को लागू करने के लिए व्यग्र थे। कैबिनेट मिशन के भारत-पाक विभाजन को कांग्रेस ने ठुकरा दिया था, इस कारण जिन्ना और भी जल्दी में थे। उन्होंने घोषणा की कि या तो मैं भारत को विखंडित कर दूंगा, अन्यथा देश में आग लगा दूंगा। जिन्ना ने 16 अगस्त, 1946 को ‘डायरेक्ट एक्शन’ की घोषणा कर दी।
बंगाल प्रोविंस का तत्कालीन प्रधानमंत्री हुसैन शाहिद सोहरावर्दी जिन्ना का कट्टर समर्थक था। वह हिंदू बहुसंख्यक कोलकाता को और कुछ आसपास के जिलों को इस्लामिक पाकिस्तान के साथ जोड़ना चाहता था। बंगाल में उस समय 42 प्रतिशत हिंदू और 33 प्रतिशत मुसलमानों की आबादी थी। उस समय भारत में केवल बंगाल में ही मुस्लिम लीग की सरकार थी। सोहरावर्दी का मानना था कि 16 अगस्त को दंगे करवाकर कोलकाता में हिंदुओं को विस्थापित कर मुसलमानों की आबादी को बढ़ाया जा सकता है। 16 अगस्त (शुक्रवार) को उन्होंने सभी मुल्लाओं को जुमे की नमाज के दिन मुसलमानों को डायरेक्ट एक्शन के बारे में समझाने तथा दंगे करवाकर हिंदुओं को पाकिस्तान बनाने के लिए मजबूर करने का आह‍्वान किया। उस दिन सुबह से ही कोलकाता के माहौल में जहर घुला हुआ था। हिंदू और मुसलमान एक-दूसरे को शक की नजर से देख रहे थे। दंगे की छिटपुट घटनाएं शुरू हो चुकी थीं। मुसलमानों की भारी भीड़ उस समय हैरिसन रोड से सियालदाह रेलवे स्टेशन की तरफ जा रही थी। लगभग सभी ने पूरे शरीर पर काले कपड़े पहने हुए थे और इनके हाथों में लाठी, बरछे थे और नंगी तलवारें लहरा रही थीं। हाथों में हरे रंग के झंडे भी थे। मुसलमान चिल्ला रहे थे, ‘हमें पाकिस्तान चाहिए, डायरेक्ट एक्शन जिंदाबाद’। हिन्दू डर के मारे अपनी छतों पर जाकर मुसलमानों की इस भारी भीड़ को देख रहे थे। इसी दौरान मुसलमानों की भीड़ ने देखा कि रिपन कॉलेज (वर्तमान में सुरेन्द्रनाथ कॉलेज) पर कांग्रेस का झंडा लहरा रहा था। भीड़ जबरन कॉलेज में घुसी और जो भी सामने आया उसे बेरहमी से पीटा। कॉलेज से कांग्रेस के झंडे को उतार कर उसके टुकड़े-टुकड़े कर दिए और उसकी जगह पर चांद और तारा अंकित हरे रंग का झंडा लगा दिया। जब कॉलेज के छात्रों को इस बात की सूचना मिली तो वह बाहर आ गये और दोनों के बीच जबरदस्त लड़ाई छिड़ गई। इस झगड़े के लिए दंगई पहले से तैयार होकर आये थे और उन्होंने कत्लेआम शुरू कर दिया। सियालदाह रेलवे स्टेशन से बाहर आ रहे यात्रियों को भी बेरहमी से मारना शुरू कर दिया। हिंदुओं ने आत्मरक्षा की कोशिश की लेकिन मुसलमान योजना के अनुसार हथियार लेकर पूरी तैयारी के साथ कत्लेआम करते रहे। 10.30 बजे तक पूरे हैरिसन रोड पर बड़े झगड़े शुरू हो गए।
कुछ देर बाद जब झगड़ा समाप्त हो गया और सभी अपने-अपने घरों को चले गये तो जहां-तहां लाशें बिछी हुई थीं। उन लाशों को उठाने की किसी में हिम्मत भी नहीं थी।
विख्यात इतिहासकार सर जदुनाथ सरकार के प्रपौत्र कर्नल संतोष सरकार ने बताया कि कोलकाता की 'कोलुतोला स्ट्रीट' में खून की नदियां बह रही थीं। उनके मोहल्ले के सभी पुरुष दंगाइयों से बचने के लिए हाथों में डंडे आदि लेकर पहरा देते थे। सर जदुनाथ सरकर के बेटे अबोनी नाथ सरकार की 27 मार्च, 1947 को कोलकाता की 'धर्मत्तला स्ट्रीट' में मस्जिद के सामने निर्ममतापूर्वक हत्या कर दी गयी। कर्नल संतोष सरकार की उस समय 14 साल उम्र थी और आज भी उस समय को याद कर उनके रौंगटे खड़े हो जाते हैं। उन दंगों में 6 से 8 हजार लोगों का कत्ल हुआ और 15 से 20 हज़ार जख्मी हुए। घर जला दिए गए और हजारों लोग बेघर हो गये। सुहरावर्दी के निर्देश पर सरकार इस दौरान निष्क्रिय रही और हत्या, लूटपाट का खुलकर नंगा नाच हुआ। कोलकाता के दंगों के बाद नौआखली तथा टिपरा जिलों (अब बंगलादेश में) 10 अक्तूबर, 1946 को भीषण दंगे शुरू हो गये। इन जिलों की आबादी में साढ़े चार लाख हिंदू और 18 लाख मुसलमान थे। दंगों के लिए यह जिले इसलिए चुने गये क्योंकि ये कोलकाता से काफी दूर थे और मीडिया की इन पर नजर भी नहीं थी। 10 अक्तूबर को लक्ष्मी पूजा का दिन था। हिंदू समाज त्योहार मना रहा था। इसी दौरान सुबह 8.30 बजे नौआखली के कोरपारा में मुसलमानों की भीड़ को संबोधित करते हुए मुस्लिम लीग के नेता गुलाम सरवर हुसैन ने नौआखली बार एसोसिएशन के अध्यक्ष राय साहब राजेन्द्र लाल चौधरी और भारत सेवा आश्रम संघ के संन्यासी त्र्यम्बकानंद का सिर काटकर लाने की अपील की। इसके बाद भीड़ ने 'कोरपारा' स्थित राजेन्द्र लाल चौधरी के घर को आग लगा दी। घर के सभी सदस्य बचने के लिए छत पर चले गये। भीड़ भी छत पर पहुंच गई और राजेन्द्र लाल चौधरी को उतार कर नीचे ले आई। भीड़ ने राजेन्द्र लाल चौधरी को आग लगा दी और उनका सिर काटकर नाचते हुए सरवर हुसैन के पास लेकर आये। उस दिन चौधरी के घर में 24 लोगों की हत्या की गई थी। उस दिन संन्यासी त्र्यम्बकानंद आश्रम में नहीं थे। कुछ दिन बाद जब वह आश्रम में आये तो चारों ओर लूटपाट, कत्लेआम को देखकर सहम गये। वह रात उन्होंने कहीं बाहर बिताई और किसी तरह कोलकाता आ गये। इस दौरान कत्ल, लूटपाट के अलावा हिन्दुओं का जबरन कन्वर्जन किया गया। फरीदगंज पुलिस स्टेशन के अंतर्गत गुप्ती, बछतौली तथा गोबिंदपुरा गांवों में सभी लोगों का कन्वर्जन कर दिया गया। फरीदगंज पुलिस स्टेशन के अंतर्गत गुप्ती, बछतौली तथा गोबिंदपुरा गांवों में सभी लोगों का कन्वर्जन कर दिया गया। सरकारी आंकड़ों के अनुसार केवल टिपरा जिला में 9895 हिन्दुओं का कन्वर्जन किया गया हालांकि यह संख्या और भी ज्यादा थी।
10 अक्तूबर, 1946 को नौआखली में दंगे शुरू होते ही तत्कालीन जिला मजिस्ट्रेट एनजी राय वहां से भाग गया। इसके बाद 18 अक्तूबर को नए जिला मजिस्ट्रेट ने पदभार संभाला। इस दौरान वहां पर सरकार नाम की कोई चीज नहीं थी और पूरे जिले में दंगइयों की बर्बरता का नंगा नाच चल रहा था। दंगों के बाद नौआखली गए राहत दल की सदस्य मिस मुरिल लिस्टर ने 6 नवंबर, 1946 को लिखा कि इन दंगों के दौरान सबसे बुरा हाल महिलाओं का हुआ। उनके सामने उनके पति और बच्चों का कत्ल कर दिया गया और महिलाओं का कन्वर्जन कर उन्हें उनके पतियों के हत्यारों को सौंप दिया गया। इन महिलाओं के जीवन में अब सिर्फ अंधकार था। महिलाओं को कन्वर्जन के लिए मजबूर कर जबरन गाय का मांस खिलाया जाता था। इन दंगों का वीवी नगरकर ने भी अपनी पुस्तक ‘जेनेसिस ऑफ पाकिस्तान’ में उल्लेख किया है।
नौआखली और टिपरा के बाद मुसलमान दंगइयों का आंतक पूरे पूर्वी बंगाल में फैल गया। दंगों के कारण उस समय पूर्वी बंगाल से करीब 10 लाख हिंदू भागकर पश्चिम बंगाल, असम तथा त्रिपुरा आदि राज्यों में आ गए। लेखक के पिता सौरिन्द्रो मोहन घोष ढाका जिला के नयानगर गांव से विस्थापित होकर परिवार के साथ कोलकाता आ गये। इस भरे-पूरे परिवार के पास कोलकाता में अब कुछ भी नहीं था। चिटगांव के तत्कालीन जज सोइबाल कुमार गुप्त की पत्नी अशोका गुप्ता ने अपनी पुस्तक ‘नौआखली दुर्जोगेर दिने’ में उस समय की त्रासदी का विस्तृत उल्लेख किया है। अशोका गुप्ता राहत दल की सदस्य थीं। 16 अगस्त, 1946 में बंगाल की तत्कालीन मुस्लिम लीग सरकार के प्रधानमंत्री सोहरावर्दी ने जब मुसलमानों को खुली छूट दे दी और दंगाइयों का हिंदुओं पर कहर टूटने लगा तो अखिल भारतीय हिंदू महासभा के अध्यक्ष श्यामा प्रसाद मुखर्जी लार्ड माउंटबेटन से मिले और उन्हें समझाया कि हिंदू बंगाली मुस्लिम पाकिस्तान में नहीं रह सकते। श्री मुखर्जी की बात का बंगाल के कांग्रेस नेताओं ने भी समर्थन किया। श्री मुखर्जी के तर्कों से प्रभािवत होकर लार्ड माउंटबेटन ने 3 जून, 1947 को बंगाल के विभाजन की घोषणा कर दी। इसके बाद 20 जून, 1947 को बंगाल असेंबली के हिंदू सदस्यों ने बंगाल विभाजन के पक्ष में प्रस्ताव पारित कर दिया। फलस्वरूप पश्चिमी बंगाल पाकिस्तान में जाने से बच गया और पूर्वी बंगाल पाकिस्तान का हिस्सा बना। अभी भी पश्चिम बंगाल में विस्थापित बंगालियों की कालोनियां हैं। इन्हें आज तक कोई राहत नहीं मिली है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जोकि खुद विस्थापित हैं उनकी तृणमूल कांग्रेस की सरकार भी वोट की राजनीति के कारण मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति पर चल रही है।