श्रद्धाजंलि: दामोदर गणेश बापट नि:स्वार्थ सेवा को समर्पित जीवन
   दिनांक 02-सितंबर-2019
 
डॉ़ प्रकाश सी बरतूनिया
 

 
श्री दामोदर गणेश बापट को पद्मश्री से सम्म्मानित करते राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद (फाइल चित्र)
 
छत्तीसगढ़ के चांपा जिले के दूर-दराज इलाकों में पिछले 47 वषों से प्रचार, प्रसिद्धि और लोकप्रियता से कोसों दूर रहकर कुष्ठ रोगियों की सेवा में दामोदर गणेश बापट ने अपना जीवन होम कर दिया
गत 17 अगस्त को एक ऐसे महात्मा का देहावसान हुआ, जिन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन कुष्ठ रोगियों की सेवा-सुश्रूषा में होम कर दिया। छत्तीसगढ़ के चांपा जिले के दूर-दराज इलाकों में पिछले लगभग 47 वषों से कुष्ठ रोगियों की सच्ची निष्ठा के साथ सेवा करने वाले इस महात्मा का नाम है—श्री दामोदर गणेश बापट। प्रचार, प्रसिद्धि और लोकप्रियता पाने के मोह से कोसों दूर रहकर कुष्ठ रोगियों के साथ स्थायी रूप से निवास करना, उनके हाथ का पकाया भोजन करना, अपने हाथों से उनकी मरहम-पट्टी करना, उन्हें स्वावलंबी और स्वाभिमानी बनाने के लिए हर जतन करना ही 84 वर्षीय बापट की दिनचर्या थी। खादी का कुर्ता और सामान्य सी धोती पहने साधारण दिखने वाले बापट जी द्वारा कुष्ठ रोगियों की सेवा के लिए उन्हें 5 फरवरी, 1995 को कोलकाता में ‘विवेकानंद सेवा पुरस्कार’ एवं भारत सरकार द्वारा 2017 में पद्मश्री से भी विभूषित किया गया।
कुष्ठ रोग एवं कुष्ठ रोगियों के विषय में सुनते ही मन में अजीब से भाव आने लगते हैं। यद्यपि यह रोग पूरी तरह साध्य है किन्तु आज भी समाज में इस रोग के प्रति अनेक प्रकार की भ्रांतियां एवं असत्य धारणाएं व्याप्त हैं। ऐसे में रोगी के माता-पिता, भाई-बहन, पुत्र-पुत्री एवं अन्य रिश्तेदार भी उससे कतराते हैं। अपने सगे-संबंधियों से उपेक्षित एवं तिरस्कृत तथा समाज की दृष्टि में अछूत माने जाने वाले ऐसे कुष्ठ रोगियों और पीड़ितों की समर्पित भाव से सेवा करना ही महात्मा बापट के जीवन का एकमात्र लक्ष्य था। वह ऐसे कर्मयोगी थे जिन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन कुष्ठ रोगियों की सेवा-साधना में अर्पित कर दिया।
21 अप्रैल, 1935 को महाराष्ट्र के अमरावती जिले के एक छोटे-से गांव पथरोट में जन्मे बापट जी के ह्दय में सेवा के संस्कार उनके पिता स्व़ गणेश विनायक बापट ने बचपन में ही कूट-कूट कर भर दिए थे। बाल्यावस्था से ही वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सम्पर्क में आ गए। नागपुर से बी़ कॉम. की डिग्री लेने के बाद उन्होंने समाजशास्त्र में बी़ ए़ किया। 1967 में पिताजी की मृत्यु के उपरांत वे स्वामी विवेकानंद साहित्य से प्रेरित होकर मानव सेवा के क्षेत्र में कूद पड़े और छत्तीसगढ़ के चांपा में एक कुष्ठ रोगी महापुरुष स्व़ श्री सदाशिव गोविंद कात्रे द्वारा स्थापित ‘भारतीय कुष्ठ निवारक संघ’ में सेवा कार्य करने लगे। 1977 में श्री कात्रे के निधन के पश्चात श्री दामोदर गणेश बापट ने भारतीय कुष्ठ निवारक संघ, चांपा के सचिव के रूप में कार्य आरंभ किया। इन 47 वर्षों में महात्मा बापट ने स्व. कात्रे जी द्वारा रोपे गये इस अंकुर को वृक्ष का आकार दे दिया।
आज भारतीय कुष्ठ निवारक संघ आश्रम में लगभग 115 कुष्ठ रोगी हैं, जिनमें पुरुष, महिलाएं एवं बालक सम्मिलित हैं। आश्रम इन कुष्ठ रोगियों के 26 स्वस्थ बालक-बालिकाओं का परिपालन, चिकित्सा और शिक्षा संस्कार देने का काम हो रहा है। इनके अतिरिक्त 400 अन्य बाहर के कुष्ठ रोगी भी चिकित्सा सेवा का लाभ ले रहे हैं। कुष्ठ रोग विशेषज्ञों के मार्गदर्शन में इस आश्रम में बहुऔषधीय चिकित्सा कार्य संचालित किए जाते हैं, जिससे अनेक रोगी लाभान्वित हो रहे हैं। यहां आयुर्वेद तथा होम्योपैथी की औषधियों से भी चिकित्सा की जाती है। कुष्ठ रोगियों के बच्चों के लालन-पालन एवं समुचित विकास के लिए एक ‘सुशील बालक गृह’ है। इसी प्रकार एक सुशील विद्या मंदिर है, जिसमें 126 बालक-बालिकाएं अध्ययनरत हैं। आश्रम के छात्रावास एवं आसपास के दो-तीन गांवों के बच्चे भी इस विद्यालय में पढ़ते हैं। इसके अतिरिक्त यहां कम्प्यूटर प्रशिक्षण केन्द्र, सिलाई प्रशिक्षण केन्द्र तथा ड्राईविंग प्रशिक्षण केन्द्र भी नव-निर्मित भवन में चलाए जा रहे हैं। कुष्ठ रोगी माता-पिता के शिशुओं को अपने माता-पिता के सम्पर्क में रखने के उद्देश्य से एक झूलाघर है, जिसमें 6 माह से 5 वर्ष की आयु के 20 बच्चे रहते हैं। महिला शिक्षिकाओं द्वारा इन बालकों में संस्कार शिक्षा में रुचि निर्माण करने के कार्य के साथ बालकों को पौष्टिक भोजन भी दिया जाता है।
इस कुष्ठ आश्रम की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यहां के कुष्ठ रोगी समाज की दया तथा दूसरोें की मदद पर आश्रित नहीं हैं। वे स्वयं अपने परिश्रम और उद्यम से अपने को एवं अपने आश्रम को आत्मनिर्भर बनाने में जुटे रहते हैं। आश्रम के कुष्ठ रोगी अपनी 3 एकड़ भूमि में बागवानी द्वारा सब्जी, मिर्ची, प्याज, संतरा, हल्दी की फसलें तथा फलदार वृक्षों से केला, संतरा, आम, बिही, पपीता, सीताफल, नींबू आदि का उत्पादन कर रहे हैं। आश्रम की गोशाला में अच्छी नस्ल की 175 गाएं हैं, जिनका दूध कुष्ठ रोगियों को दिया जाता है। बापट जी ने आश्रम का और विस्तार करते हुए कुष्ठ रोगियों के लिए अन्य अतिरिक्त व्यवसायों जैसे-दरी बुनाई, चाक बनाना, रस्सी बनाना, वेल्डिंग उद्योग आदि भी शुरु कराए। उन्होंने आश्रम में 20 शैया वाले चिकित्सालय, शाला भवन, भगवान श्री गणेश मंदिर, एक वृद्धा आश्रम तथा कार्यकर्ताओं के लिए निवास गृह बनवाए।
‘नर सेवा ही नारायण सेवा’ के मंत्र का पालन करने वाले बापट जी की अनथक मेहनत और सेवा का परिणाम है कि आज आश्रम के कुष्ठ रोगी अपने श्रम और स्वावलंबन के कारण आत्म विश्वास से भरे हुए हैं। उनकी इस भावना और खुशहाली से उन्हें उनके रोग पर काबू पाने में मानसिक बल मिलता है। बापट जी कुष्ठ रोगियों के अंधेरे जीवन में आशा की किरण थे। भारतीय कुष्ठ निवारक संघ का यह पौधा एक विशाल वृक्ष का आकार लेकर कुष्ठ रोग के बारे में फैली भ्रांतियों, भय और घृणा का निवारण करते हुए समाज और देश को हमेशा शीतल छाया एवं फल देता रहेगा। बापट जी का कार्यक्षेत्र या सेवा क्षेत्र सीमित हो सकता है किन्तु आज के प्रदर्शन, प्रसिद्धि, ख्याति और चकाचौंध भरे युग में सूदर वनवासी क्षेत्र में उन्होंने समाजहित में शांत भाव से कुष्ठ रोगियों की जो सेवा की, वह अद्भुत थी। कह सकते हैं कि वे एक सच्चे मानव सेवी महात्मा थे।
(लेखक बाबासाहेब भीमराव अांबेडकर केन्द्रीय विश्वविद्यालय, लखनऊ के कुलाधिपति हैं)