ऐसे आसान होगी भविष्य की राह
   दिनांक 20-सितंबर-2019
कश्मीर ऐतिहासिक तौर पर समृद्ध और उदार विचार की भूमि रहा है। इसे इसके मूल स्वभाव और पहचान से जोड़े बिना चीजें ठीक करना असंभव और सिर्फ औपचारिक होगा। गुज्जर, बक्करवाल, शिया, हिन्दू, सिख यह सब हैं तो कश्मीरियत है।
 
लाल चौक से कुछ मीटर दूर पटरी बाजार से खरीदारी करते लोग
 
 एक कश्मीरी कहावत है
सोन्तुॅ चायाव् वारि क्वकुर हर्दुॅ कोर् हस् हिश्।
यानी मुर्गा बाग में बसंत में घुसा, लेकिन उसे भगाने के लिए शोर सर्दियों में जाकर मचाया गया।
खुद कश्मीर की दुर्दशा और उसे राष्टÑधारा में अलग ही रखने की कहानी इस कहावत सरीखी है। किन्तु देर से ही सही, सही बागबां के आते ही भारतीय संसद द्वारा अनुच्छेद 370 की बेड़ी काट दी गई। सीमा के उस पार और उस आवाज में जब-तब सुर मिलाने वालों ने इस बार भी खूब हल्ला काटा। कश्मीर बेहाल है! लहूलुहान है! सिसक रहा है! लेकिन क्या वास्तव में ऐसा है? अगस्त के पहले सप्ताह में जन्मा सवालों का यह जिन्न जब लगातार आकार बढ़ाने लगा तो देश के एक प्रतिष्ठित पत्रकार संगठन की टोली खुद अपनी आंखों से घाटी का हाल जानने पहुंची। देश के प्रतिष्ठित पत्रकारों को इस दौरे में जो तथ्य मिले वह पूरे देश और दुनिया के लिए चौंकाने वाले हैं। (देखें आवरण कथा: कश्मीर का सच) बदले हालात में कश्मीर को, श्रीनगर को, इसकी तंग गलियों को देखने, अलग-अलग वर्गों के लोगों की व्यथा-कथाएं सुनने के बाद लगता है कि अब इस सूबे को, यहां के लोगों को न्याय मिलना ही चाहिए।
 
आतंकवाद के दौर तथा एक उन्मादी वर्ग के वर्चस्व ने आम कश्मीरियों की हसरतों को कुचलकर रख दिया है। लोग देश विरोधी नहीं हैं, लेकिन देश विरोधी ताकतों का हौआ उनके दिल पर बैठा है। वे दुकानें खोलते हैं मगर जरा सा खटका होते ही शटर गिराकर बाहर बैठ जाते हैं। वे मुस्कुराते हैं मगर कैमरा देखते ही बिदकने लगते हैं! एक पल को हंसते हैं मगर अगले ही पल वादी का विविधतापूर्ण माहौल तबाह हो जाने से पैदा दर्द उनकी आंखों से बहने लगता है। घाटी के दौरे में उन लोगों से बात करने के बाद (जिनकी बात पिछले कई दशकों में किसी ने नहीं सुनी) सिर्फ भय और आशंकाएं नहीं बल्कि कश्मीर के भविष्य की राह भी दिखाई देती है। इन लोगों से मिलकर मोटे तौर पर कश्मीर की स्थितियां फिर से सबके अनुकूल बनाने के कुछ सूत्र भी हाथ लगे।
 
पहला सूत्र : विविधता की वापसी और समृद्धि
कश्मीर ऐतिहासिक तौर पर समृद्ध और उदार विचार की भूमि रहा है। इसे इसके मूल स्वभाव और पहचान से जोड़े बिना चीजें ठीक करना असंभव और सिर्फ औपचारिक होगा। गुज्जर, बक्करवाल, शिया, हिन्दू, सिख यह सब हैं तो कश्मीरियत है। इन्हें निकाल दें तो कश्मीर-कश्मीर न रहकर उन्माद का अखाड़ा बन जाता है। दक्षिण कश्मीर में अनंतनाग तथा बारामूला के कई मुस्लिम परिवारों का भी मानना है कि कश्मीर में जिन क्षेत्रों में विविधता थी उसके मुकाबले एक सी मजहबी पहचान वाले इलाकों में मजहबी उन्माद ने तैजी से पांव पसारे। यह बात बाकी दुनिया ने भी देखी है और इसका दर्द भारत ने झेला है। इस दर्द के इलाज का यह सही समय है।
भय के कारण पलायन कर गए वर्गों की वापसी के साथ ही कश्मीर में अलग-अलग तरह के पर्यावरण अनुकूल उद्योग-धंधे जमाने की जरूरत है। पर्यटन और हस्तशिल्प के अलावा सूचना प्रौद्योगिकी के लिए यहां भारी संभावना दिखती है। इस दौरान यह भी ध्यान रखना होगा कि संपन्नता केवल श्रीनगर तक सिमटी न रह जाए। आर्थिक गतिविधियों का प्रसार राज्य के सुदूर क्षेत्रों तक होना चाहिए।
 
दूसरा सूत्र : पलायन की पहेली को सुलझाना
यह पहले सूत्र से जुड़ी वह अहम बात है जिसे ठीक किए बिना बाकी उपाय कारगर नहीं हो सकते। यह बात कश्मीर की जनसांख्यिकी से जुड़ी है। कश्मीरी सिख-हिन्दू जो घाटी से गए उनकी वापसी और पुनर्वास की बात तो उठती है लेकिन उनकी सही संख्या पर कभी चर्चा नहीं होती। कश्मीर में जनगणना के दौरान भी क्या कुछ गड़बड़ियां हुर्इं, इस पर भी कोई सवाल नहीं उठाता। एक तथ्य पर गौर कीजिए-2001 की जनगणना में बताया गया कि कश्मीर में केवल एक लाख हिन्दू हैं। इसमें 90 हजार पुरुष और केवल 10 हजार महिलाएं हैं। क्या ऐसा संभव है? कश्मीरी हिन्दुओं ने जब इस गंभीर असंतुलन पर आपत्ति उठाई तो उसका कोई संज्ञान नहीं लिया गया। जब कहा गया कि ऐसे असंभव समीकरणों वाले कोई दो गांव भी दिखा दिए जाएं तो अधिकारी चुप्पी मारकर बैठ गए। अभी भी जो प्रक्रिया चल रही है उसमें एक बड़ी खामी यह है कि इसमें केवल उन लोगों के नाम गिने जा रहे हैं जो राहत व पुनर्वास केंद्रों पर दर्ज हैं। इसमें भारी विसंगति है, क्योंकि यह आंकड़ा दो लाख से भी कम लोगों का पलायन दर्शाता है जबकि असल में यह संख्या पहाड़ जैसी हो सकती है। गौर करने की बात है कि 90 के दशक में घाटी से साढ़े तीन लाख से ज्यादा लोगों का पलायन हुआ। साथ ही 1947 के बाद से लगातार बढ़ती अव्यवस्था, अशांति और भय के चलते करीब इतने ही और लोग 1990 आते-आते कश्मीर से बोरिया-बिस्तर समेटने पर मजबूर हुए थे। 1991 के जनसांख्यिकीय आंकड़ों में इसका उल्लेख आया है। पूछने वाला सवाल यह है कि क्या यह सात लाख से ज्यादा लोग इतने वर्षों में इतने ही रहे! इस संख्या का संज्ञान न लेना, तथ्यों को खुर्द-बुर्द करना कश्मीरी विविधता को दफनाने वाला जुर्म होगा! अप्रवास या आव्रजन की अन्य राज्यों जैसी सहज गति कश्मीर में नहीं है। नौकरी के लिए जाना, जाना नहीं है, सदा के लिए इस जगह को छोड़ने वालों के लिए स्थानीय स्तर पर फैलता आतंकवाद इसकी वजह रहा है। यहां के लोगों ने यदि धरती की जन्नत को छोड़ा तो इस विस्थापन के लिए आतंकवाद 1948 से ही बड़ा कारण रहा है। इसलिए अप्रवासन आंकड़ों की गिनती करने से पहले आतंकवाद को यहां की सचाई और पलायन का बड़ा कारक मानना होगा। इस बात को पलायन की वजहों में ‘पैरामीटर’ के तौर पर जोड़ना होगा तभी उन लोगों की सही संख्या सामने आ सकेगी जो लंबे अंतराल में एक-एक कर जड़ों से दूर होते गए। पलायन का सही आंकड़ा किसी भी हालत में 10 लाख से कम तो हो ही नहीं सकता, यह स्थानीय लोगों का भी मानना है।
 
तीसरा सूत्र : नई राजधानी पर विचार
जम्मू-कश्मीर देश का इकलौता प्रांत है, जहां सर्दी-गर्मी में अलग अलग जगह से शासन-प्रशासन चलता है। सर्दी में ‘दरबार मूव’ जैसी अव्यावहारिक परंपरा पर पैसे उड़ाना सिरे से फिजूल बात है। इससे जुड़ी महत्वपूर्ण बात यह भी है कि ठेठ जम्मू या सिर्फ श्रीनगर को राजधानी बना देने से शासन-प्रशासन पूरे राज्य की जनता के लिए समान पहुंच में नहीं रहता। ऐसे में बनिहाल-काजीगुंड जैसी किसी जगह को राजधानी बनाकर प्रशासन को सहज और संवेदनशील रूप देकर राज्य के विकास को भी एक नया आयाम दिया जा सकता है।
 
चौथा सूत्र : एकता अखंडता की आवाजों का संरक्षण
90 के दशक के हिंसक दौर में घाटी से भारी संख्या में पलायन हुआ, यह एक बात थी किन्तु साथ ही देश और इसके साथ कश्मीरी अभिन्नता की बात करने वाले लोग, जमीनी स्तर पर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को थामे रखने वाले लोग भी यहां मौजूद थे। दुर्भाग्य से समय के थपेड़ों और केंद्र सरकार की उपेक्षा के चलते कश्मीर के ‘राष्टÑीय’ तत्व अलग-थलग पड़ते गए। आज की स्थितियों में ऐसे सभी व्यक्ति, मंच और संस्थाओं को सम्मान और संरक्षण देने की आवश्यकता है।
 
पांचवां सूत्र : प्रशासनिक तंत्र का पुनर्गठन
स्थानीय लोग जम्मू-कश्मीर की लस्त-पस्त हालत का सबसे बड़ा जिम्मेदार यहां के प्रशासन को ठहराते हैं। यह बात सही भी है। चाहे डल झील की सफाई के नाम पर अरबों के वारे-न्यारे की बात हो या केन्द्र से भारी-भरकम राशि लेने और ‘उपयोग प्रमाणपत्र’ के नाम पर ठेंगा दिखाने के किस्से, भ्रष्टाचार की जैसी कहानियां आपको यहां सुनने को मिल सकती हैं, वैसी और कहीं नहीं मिलेंगी। लोग चाहते हैं कि राज्य की नौकरशाही में आमूलचूल परिवर्तन होना चाहिए और इसी वर्ष आए आईएएस अधिकारियों के अलावा बाकी को यहां से बाहर भेजना और नए अधिकारियों को यहां लाना चाहिए। जिला प्रशासन के स्तर पर तो मानो पूरे राज्य में ही खेल चल रहा है। ‘रोटेशन’ के नाम पर दो अधिकारी, दो पद अदला-बदली का खेल यहां लंबे समय से चल रहा है। इसलिए लोग चाहते हैं कि जिला प्रशासन में (जहां कर्मचारी कम राजनैतिक कार्यकर्ता ज्यादा जमे बैठे हैं) कर्मियों को वर्तमान तैनाती से दूर और पहले जहां उनकी तैनाती नहीं हुई, ऐसे इलाकों में भेजा जाना चाहिए तथा उनकी कार्यक्षमता-कुशलता की कड़ी समीक्षा होनी चाहिए।
 
प्रशासनिक सख्ती में अवैध कब्जों की सफाई और विभागों से जुड़े निगमों का काम-काज की समीक्षा बहुत ही अहम बिन्दु है।
जम्मू के भटिंडी जैसे इलाकों में वन भूमि से लेकर, संरक्षित संपत्ति (कस्टोडियन प्रॉपर्टी), चराई की जमीन, राज्य संपत्ति और जल क्षेत्र के भीतर तथा इर्द-गिर्द अवैध कब्जों ने न केवल अव्यवस्थित दृश्य पैदा किया है बल्कि जनसांख्यिकीय असंतुलन और पर्यावरण से जुड़े खतरे भी बढ़ा दिए हैं। डल झील सिकुड़ गई है, नगीन झील पर किसी का ध्यान नहीं है और डल क्षेत्र के अवैध कब्जेदार सरकारी भूखंड मिल जाने के बाद भी फिर से वहीं आ डटे हैं। कुछ ऐसी ही दुर्दशा विभागों से जुड़े निगमों की है जिन्हें स्थानीय स्तर पर भ्रष्टाचार का अड्डा बताया जाता है। एक ही काम करने वाले विभाग ने वही कार्य करने के लिए निगम क्यों बनाया, रोजगार के नाम पर कितनी राशि इन निगमों पर लुटाई गई, यह पूछने वाला फिलहाल कोई नहीं है।
 
इन निगमों के काम और भूमिका को भी प्रशासनिक दक्षता-पारदर्शिता की कसौटी पर कसे जाने की जरूरत है।
पंचतत्व से जगत बना है, क्या इन पंच सूत्रों से जम्मू-कश्मीर की बिगड़ी तस्वीर फिर से बन सकेगी! शायद हां! राज्य के भविष्य की राह के ये भले कुछ सूत्र भर हैं, किन्तु इनके अतिरिक्त भी बदली स्थितियों में राज्य की विविधता का संरक्षण होगा और सभी वर्गों की बात सुनी जाएगी, अब इसकी आस सूबे के लोगों को बंधने लगी है।