बोफोर्स की दलाली और राफेल का सच
   दिनांक 23-सितंबर-2019
 
 
बोफोर्स घोटाले के चलते कांग्रेस को सत्ता से हटना पड़ा था। अत: कांग्रेस ने राफेल मुद्दों को जोर-शोर से प्रसारित करके यह आशा पाली थी कि यह मुद्दा मोदी सरकार को हटाने में निश्चित सफल होगा। 
  
 
अभी पिछले दिनों एक पुस्तक आई है-‘बोफोर्स नहीं, राफेल है’। इसमें यह बताने की कोशिश की गई है कि कांग्रेस ने राफेल को चुनावी लाभ के लिए मुद्दा बनाया था। पुस्तक स्पष्ट रूप से कहती है कि राफेल का मुद्दा कांग्रेस का जबरन उठाया गया फर्जी मुद्दा है। इस बात को सिद्ध करने के लिए लेखक ने अनेक तथ्यों को प्रस्तुत किया है।
 
उल्लेखनीय है कि बोफोर्स घोटाले के चलते कांग्रेस को सत्ता से हटना पड़ा था। अत: कांग्रेस ने राफेल मुद्दों को जोर-शोर से प्रसारित करके यह आशा पाली थी कि यह मुद्दा मोदी सरकार को हटाने में निश्चित सफल होगा। कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष राहुल गांधी के दो लक्ष्य थे-एक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भ्रष्ट साबित करना और दूसरा, सरकार की नीयत और नीति गरीबों के विरुद्ध तथा पूंजीपतियों के पक्ष में है, यह सिद्ध करना। इसीलिए राहुल गांधी ने सैकड़ों रैलियों तथा भाषणों में निरंतर एक ही वाक्य दोहराया,‘चौकीदार चोर है।’ इसके अलावा राहुल गांधी के पास और कोई मुद्दा नहीं था। लेखक ने स्पष्ट किया है कि हिन्दुस्तान एअरोनाटिक्स लि. (एच.ए.एल.) को राफेल की भागीदारी न दिए जाने के लिए स्वयं कांग्रेस जिम्मेदार है। तत्कालीन रक्षा मंत्री ए.के.एंटोनी राफेल निर्माता कंपनी दसाल्ट के अधिकारियों को स्वयं एच.ए.एल. (बेंगलुरु) लेकर गए थे। उसकी आर्थिक दशा और काम की गति देखकर दसाल्ट ने उन्हें हिस्सेदारी देने से मना कर दिया था। स्वयं एच.ए.एल. ने भी खुद समय पर कार्य पूरी करने में असमर्थता बताई थी। राफेल और रिलायंस के संबंध को लेकर पुस्तक में यह स्पष्ट किया गया है कि भारत सरकार ने रिलायंस कंपनी के लिए दासो पर जरा भी दबाव नहीं डाला, बल्कि सचाई यह है कि दसाल्ट ने स्वयं ही रिलायंस को हिस्सेदारी दी है। कलपुर्जों के भारत में निर्माण के लिए दसाल्ट ने 2012 में ही रिलायंस से समझौता कर लिया था, तब कांग्रेस के नेतृत्व में संप्रग सरकार थी।
 
राफेल सौदा 2007 में तय हो गया था, परंतु संप्रग सरकार इसे सात-आठ वर्ष तक सिरे नहीं चढ़ा पाई। सौदा 126 विमानों का था। इनमें फ्रांस से 18 ही विमान आने थे, बाकी भारत में बनाए जाने थे, लेकिन इसकी कंपनी गारंटी नहीं देना चाहती थी। एच.ए.एल. तय समय से ढ़ाई गुना ज्यादा समय भी लेना चाहती थी। मुख्य बात यह भी थी कि रॉबर्ट वाड्रा के मित्र संजय भंडारी भी दलाली लेना चाह रहे थे। अत: सौदा 2015 तक भी तय नहीं हो पाया। रक्षा मंत्रालय की तीव्र आवश्यकता को देखते हुए मोदी सरकार ने उसी कंपनी से 126 विमानों की बात छोड़कर 36 का सौदा तय कर लिया और सब विमानों की गांरटी फ्रांस सरकार से ली। भारत सरकार ने रिलायंस से न बात की, न कुछ लेन-देन किया। अत: राहुल गांधी का यह आरोप झूठ निकला जिसमें वे कहते थे, ‘‘मोदी ने 20,000 करोड़ रु. अंबानी की जेब में डाल दिए।’’ सच बात तो यह थी कि राहुल के इन आरोपों पर लोगों ने कोई ध्यान ही नहीं दिया।
 
उधर यह मामला सर्वोच्च न्यायालय में पहुंचा। सरकार ने उसे सारे दस्तावेज सौंप दिए। जांच के पश्चात् सर्वोच्च न्यायालय ने भी कहीं कोई घोटाला नहीं पाया। लेकिन जब राहुल गांधी ने सर्वोच्च न्यायालय की बात भी नहीं मानी, तभी लोगों ने सत्य को समझ ही लिया। पृष्ठ 42 पर देखें स्पष्ट लिखा है- ‘‘मौजूदा सरकार ने उसी नियम यानी रक्षा खरीद नीति 2013 की धारा 71 के तहत यह सौदा किया। यही धारा सरकार को तमाम बंधनों से मुक्त करती है और यह अधिकार देती है कि वह सीधा सौदा कर सके। ... इसके मुताबिक निर्माता ही अपना साझीदार चुनता है। वह इसके लिए स्वतंत्र होता है। कहने का मतलब यह है कि राफेल बनाने वाली कंपनी दसाल्ट भारत में अपना साझेदार किसे बनाएगी, यह निर्णय उसे करना है।’’
 
लेखक ने इसी के रक्षा घोटालों का इतिहास भी पाठकों के सामने रखा है। 1948 में जवाहरलाल नेहरू ने इंग्लैंड से 200 जीप खरीदने का जिम्मा कृष्णमेनन को सौंपा था। 200 जीप के लिए कीमत अदा की गई परंतु केवल 155 ही आर्इं। इसके अलावा भी पुस्तक में अनेक घोटालों की चर्चा है। यह पुस्तक उन पाठकों को अवश्य पढ़ना चाहिए, जो रक्षा सौदों में रुचि रखते हैं। खासकर, राफेल मामले को अच्छी तरह जानने के लिए इसे बहुत उपयोगी है। प्रूफ की कुछ अशुद्धियों को छोड़कर पुस्तक पठनीय है।
—मायाराम ‘पतंग’