चौथा स्तम्भ / नारद झूठी खबरों से माहौल बिगाड़ने की कोशिश
   दिनांक 23-सितंबर-2019
 
दागियों की पैरवी में भी ‘सबसे तेज’ मीडिया का एक वर्ग
 
पहले फर्जी खबर छापो और फिर पकड़े जाने पर उसी का ‘फैक्ट चेक’ कर पापों से मुक्त हो जाओ। यह मुख्यधारा मीडिया का नया तरीका है। लगभग हर मीडिया संस्थान में इन दिनों यह चलन जोरों पर है।
 
बीते हफ्ते रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन के नाम से एक बयान एबीपी न्यूज, इकोनॉमिक टाइम्स, आउटलुक व द क्विंट जैसे ढेरों संस्थानों में प्रमुखता से प्रकाशित हुआ। दावा किया गया कि उन्होंने वर्तमान आर्थिक नीतियों की आलोचना की है। जब लोगों ने ध्यान से देखा तो पता चला कि जिस ट्वीट के आधार पर यह खबर पैदा की गई थी वो फर्जी था। जब लोगों ने झूठ पकड़ लिया तो इसे छापने वाले कुछ मीडिया संस्थानों ने ‘फैक्ट चेक’ के नाम पर बताया कि यह खबर गलत है। सवाल यह कि झूठी खबर छापने से पहले ही तथ्यों की जांच क्यों नहीं की? क्या एक बड़े अर्थशास्त्री के नाम से इस तरह से झूठे बयान छापना मामूली बात है?
 
मीडिया में एक तंत्र झूठी खबरें और गलत माहौल बनाने के लिए काम कर रहा है। इस तंत्र में बड़े अखबार, चैनल व तथाकथित वरिष्ठ पत्रकार शामिल हैं। वामपंथी अंग्रेजी अखबार ‘द हिंदू’ में उसके चेयरमैन एन. राम के नाम से एक लेख छपा। इसमें कहा गया कि पी. चिदंबरम निर्दोष हैं और उनके खिलाफ कोई सबूत नहीं है। ऊपर से देखें तो यह एक संपादकीय लेख लगता है जिसमें उनके विचार बताए गए हैं। पूरी खबर पढ़ें तो पता चलता है कि यह तमिलनाडु कांग्रेस का एक कार्यक्रम था, जिसमें एन. राम ने यह बयान दिया। एक संपादक एक राजनीतिक दल के कार्यक्रम में शामिल होकर एक प्रभावशाली आर्थिक अपराधी को क्लीन चिट दे तो इसे क्या कहेंगे? इससे पहले राफेल मामले में भी एन. राम ने फर्जी खबरों की झड़ी लगा दी थी।
 
हिंदी दिवस पर गृह मंत्री अमित शाह के बयान को ‘विवादित’ बना देने के पीछे मीडिया के इसी संगठित गिरोह का बड़ा योगदान रहा। अमित शाह ने कहीं भी हिंदी को थोपने जैसी को कोई बात नहीं कही, लेकिन अधिकतर हिंदी अखबारों और चैनलों ने इसे ऐसे प्रस्तुत किया मानो वे बाकी भारतीय भाषाओं को हटाकर हिंदी लागू करने की बात कह रहे हों। मीडिया में बैठे वामपंथी गिरोह को अच्छी तरह से पता है कि भाषा एक ऐसा भावनात्मक मुद्दा है, जिससे जुड़ी अफवाहें फैलाकर समाज में कटुता पैदा की जा सकती है। एक निजी चैनल के कार्यक्रम में अमित शाह से मीडिया पर अंकुश से जुड़ा एक सवाल पूछा गया, जवाब में उन्होंने कहा कि ‘‘अफवाहों और फेक न्यूज पर व्यापक बहस की जरूरत है, क्योंकि यह मामला प्रेस और अभिव्यक्ति की आजादी से जुड़ा हुआ है।’’ गृहमंत्री का यह बयान बेहद महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे ज्यादा तरजीह नहीं दी गई। कहीं इसलिए तो नहीं कि मुख्यधारा मीडिया खुद नहीं चाहता कि फेक न्यूज और अफवाहों का उनका कारोबार बंद हो?
 
उधर, आजम खां के समर्थन में आजतक चैनल खुलकर सामने आ चुका है। यह चैनल तब इतना आंदोलित नहीं हुआ, जब रामपुर के किसानों ने उन पर जमीन हड़पने का आरोप लगाया। अब जबकि आजम के खिलाफ सारे पुराने मामले सामने आ रहे हैं तो चैनल बता रहा है कि उन्हें ‘राजनीतिक कारणों’ से फंसाया जा रहा है। जब ‘राजनीतिक कारणों’ से आजम को बचाया जा रहा था तब आजतक चैनल को कोई समस्या नहीं थी। यही चैनल पी. चिदंबरम की भी वकालत करने में जुटा है। तथ्यों को रिपोर्ट करने के बजाय चैनल की खबरों में इस बात पर ज्यादा जोर होता है कि यह मामला ‘राजनीतिक’ है।
 
मंदी एक गंभीर आर्थिक विषय है, जिस पर रिपोर्टिं भी जिम्मेदारी के साथ होनी चाहिए। लेकिन अपने ‘राजनीतिक आकाओं’ को खुश करने के लिए कुछ मीडिया संस्थान मंदी की झूठी खबरें गढ़ने में में जुटे हैं। मिंट जैसे आर्थिक मामलों के अखबार ने समाचार छापा कि बिस्कुट बनाने वाली कंपनी पार्ले मंदी से इतनी परेशान हो गई है कि वो 10 हजार कर्मचारियों को नौकरी से निकालने पर विचार कर रही है। फिर पता चला कि कंपनी ने कुछ दिन पहले ही दाम बढ़ाए थे और आम तौर पर देखा जाता है कि किसी उत्पाद का दाम बढ़ें तो कुछ दिन तक बिक्री पर असर पड़ता है। यह जानकारी भी सामने आई कि कंपनी ने नई भर्तियों का विज्ञापन भी निकाल रखा है। लेकिन यह सच जब तक बाहर आया, झूठ देशभर में फैलाया जा चुका था।
 
मंदी अपनी जगह है, लेकिन इस तरह की झूठी खबरों से माहौल को और भी खराब करने का खेल खेला जा रहा है। ल्ल